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जल्द नहीं थमेगी सोने की कीमत

पांचवां सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण टैरिफ युद्ध है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दुनिया भर पर टैरिफ थोपने के कारण विदेशी व्यापार क्षेत्र में असमंजस बना हुआ है। यह असमंजस भी सोने की मांग-कीमतों को बढ़ा रहा है…

नौ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 3673.95 डॉलर पर पहुंच गईं और इस साल अब तक सोने की कीमतों में 38 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। मजबूत निवेश मांग के चलते ऑस्ट्रेलियाई ऋणदाता एएनजेड समूह ने सोने की कीमत का अनुमान बढ़ाकर इस वर्ष के अंत तक 3800 डॉलर प्रति औंस कर दिया है। एएनजेड ने उम्मीद जताई है कि अगले जून तक कीमतें 4000 डॉलर के करीब पहुंच जाएंगी। कमजोर डॉलर, मजबूत केंद्रीय बैंक खरीददारी, नरम मौद्रिक रुख और बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता ने सोने की बढ़ती कीमतों को बल दिया है। केंद्रीय बैंक की सोने की खरीद 2025 में 900 मीट्रिक टन से 950 मीट्रिक टन के बीच रहने का अनुमान है, जिसका अर्थ है कि वर्ष की दूसरी छमाही में 485 टन से 500 टन तक की खरीद होने की उम्मीद है। चीन के केंद्रीय बैंक ने अगस्त में अपने सोने के भंडार में काफी वृद्धि की जिससे लगातार सर्राफा की खरीद जारी रही। श्रम बाजार के लिए बढ़ते जोखिम के कारण अमेरिकी फेडरल रिजर्व मार्च 2026 तक अपना नरम रुख जारी रख सकता है। इस वजह से अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड पर दबाव बढ़ेगा, जो सोने की खरीद को प्रेरित कर सकता है। एएनजेड ने सोने की तेजी और मजबूत ईटीएफ प्रवाह का हवाला देते हुए, वर्ष के अंत में चांदी की कीमत का लक्ष्य भी बढ़ाकर 44.7 डॉलर प्रति औंस कर दिया है।

सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी : 1988 में सोने की कीमत 430 डॉलर प्रति औंस थी, जो सितंबर 2018 तक बढक़र 1195 डॉलर प्रति औंस हो गई, यानी 30 वर्षों में 3.43 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि। लेकिन पिछले 7 वर्षों में सोने की कीमत लगभग 17.5 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढक़र अब 3654 डॉलर तक पहुंच गई है। दुनिया भर के आर्थिक विश्लेषक सोने की कीमतों में उछाल के पीछे वैश्विक मौद्रिक और वित्तीय स्थितियों में महत्वपूर्ण बदलावों की ओर इशारा कर रहे हैं। भारत में सोने के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव है, जो शायद कई देशों में नहीं पाया जाता, और यही बात लोगों को यह जानने के लिए उत्सुक बनाती है कि सोने की कीमतों में अचानक इतनी तेजी क्यों आई है। लोग, खासकर हमारी महिलाएं, अपनी बचत को सोने के रूप में रखने में गर्व महसूस करती हैं। अनुमान है कि दुनिया में कुल ज्ञात सोने में से, जो 187000 टन है, लगभग 25000 टन भारत में पाया जाता है, जो भारतीय घरों में ऐतिहासिक रूप से रखे गए सोने और समय के साथ दुनिया के बाकी हिस्सों से सोने की खरीद का परिणाम है। भारत के केंद्रीय बैंक, यानी भारतीय रिजर्व बैंक के पास 31 दिसंबर 2024 तक 876 टन सोना है, जो अब दुनिया में 8वां सबसे बड़ा भंडार है। उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2023 में भारत का स्वर्ण भंडार दुनिया में 9वां सबसे बड़ा था। लेकिन दिसंबर 2023 और दिसंबर 2024 के बीच 73 टन सोने की खरीद के साथ, भारत का स्वर्ण भंडार अब दुनिया में 8वां सबसे बड़ा है।

डॉलर से विमुखता, यानी सोने के प्रति प्रेम : दुनिया के देशों, खासकर विकासशील देशों को, पिछले कुछ दशकों में डॉलर के लगातार मजबूत होने के कारण भारी नुकसान हुआ है। इस मामले में भारत भी कोई अपवाद नहीं है। हाल ही में भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय भुगतानों में रुपए की भूमिका बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए हैं। इस संबंध में, लगभग 20 देशों के साथ रुपए में अंतरराष्ट्रीय भुगतान निपटान के लिए व्यवस्था की गई है। दूसरी ओर, उथल-पुथल और खासकर अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में कठिनाई के कारण, स्थानीय मुद्राओं में भुगतान करने के प्रयासों में उल्लेखनीय तेजी आई है। इन सभी को दुनिया में समग्र रूप से डॉलर-विमुक्ति का एक अभिन्न अंग माना जा रहा है। देशों की सरकारों और केंद्रीय बैंकों की डॉलर के प्रति विमुखता ने सोने की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि की है।

भविष्य की संभावनाएं : हालांकि सोने की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, लेकिन भविष्य में भी यह वृद्धि जारी रह सकती है या इसकी गति में और तेजी आ सकती है। सोने की कीमतों में इस वृद्धि के कई कारण बताए जा रहे हैं। सर्वप्रथम, अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की उदार नीति इसका सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। अमरीका का फेडरल रिजर्व आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने हेतु पिछले कुछ समय से ब्याज दर को घटाने का रुख अपनाए हुए है, जिससे अमरीकी ट्रेजरी में यील्ड कम रहेगी, जिसके चलते सोने में ज्यादा लाभ रहने की संभावना है। इसके अलावा कम ब्याज दरें सोने की अवसर लागत को कम करती हैं। जब ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो निवेशक बॉन्ड या जमा को प्राथमिकता देते हैं क्योंकि इनसे सुरक्षित रिटर्न मिलता है। लेकिन जब दरें कम होती हैं, तो सोना रखने की अवसर लागत कम हो जाती है, जिससे यह अधिक आकर्षक हो जाता है। साथ ही आसान मौद्रिक नीति अक्सर अमेरिकी डॉलर के मूल्य में गिरावट का कारण बनती है, क्योंकि अधिक डॉलर प्रचलन में होते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सोने की कीमत डॉलर में तय होती है। कमजोर डॉलर विदेशी खरीददारों के लिए सोने को सस्ता बनाता है, जिससे मांग बढ़ती है। आसान मौद्रिक नीति मुद्रा आपूर्ति को बढ़ाती है और समय के साथ मुद्रास्फीति को बढ़ावा दे सकती है। सोने को मूल्य के भंडार और मुद्रास्फीति के विरुद्ध बचाव के रूप में देखा जाता है। निवेशक अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए इसे खरीदते हैं। दूसरे, बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते सोने को सर्वाधिक सुरक्षित निवेश माना जा रहा है। इतिहास में देखा गया है कि जब-जब युद्ध और संघर्ष की स्थिति आती है तमाम देश और लोग सोने में ही सर्वाधिक निवेश करने की प्रवृत्ति रखते हैं। यहां और रूस व यूक्रेन का युद्ध यथावत जारी है। साथ ही साथ इसराइल का इस्लामिक देशों के साथ ही संघर्ष रुकने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में सोना ही सर्वाधिक सुरक्षित संपत्ति मानी जा रही है। तीसरे, दुनिया में अभी तक डॉलर को ही रिजर्व करेंसी के नाते सर्वाधिक मान्यता प्राप्त थी।

पिछले कुछ वर्षों में रिजर्व में डॉलर का महत्व कम होना शुरू हो गया है। इस बीच यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा जब रूस के विदेशी मुद्रा भंडार को लगभग जब्त कर लिया गया तो उसके बाद से अमेरिका पर देशों का विश्वास टूटना शुरू हो गया है। शायद यही कारण है कि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक अब डॉलरों की बजाय ज्यादा से ज्यादा सोना रखना चाहते हैं। इसलिए उनके द्वारा सोने की खरीद में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, और यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अनुसार, वैश्विक भंडार के रूप में डॉलर का हिस्सा 2010 में 62 प्रतिशत, 2020 में 59 प्रतिशत और 2025 में 57.74 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। चौथे, मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन भी सोने की अधिक मांग का कारण बन रहे हैं। जब मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो कागजी मुद्रा का वास्तविक मूल्य गिर जाता है। सोना, सीमित आपूर्ति वाली एक मूर्त संपत्ति होने के कारण, धन की रक्षा करने में सहयोग करता है। पांचवां सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण टैरिफ युद्ध है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दुनिया भर पर टैरिफ थोपने के कारण विदेशी व्यापार क्षेत्र में असमंजस बना हुआ है। यह असमंजस भी सोने की मांग और कीमतों को बढ़ाने का काम कर रहा है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पद ग्रहण करने के बाद में सोने की कीमत 2696 डॉलर प्रति आउंस से बढ़ कर 3673 डॉलर प्रति आउंस (यानी 36.2 प्रतिशत) तक बढ़ गई है। समझा जा सकता है कि भू-राजनीतिक तनावों, विदेशी व्यापार युद्धों और आर्थिक उथल-पुथल तथा डॉलर की ताकत लगातार घटने के कारण सोने की मांग थमने वाली नहीं है।-डा. अश्वनी महाजन

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