राष्ट्रीय

स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को भारत के राष्ट्रवाद का पितामाह कहा जाता है परंतु अंग्रेज उन्हें अशांति का पितामाह कहते थे।

स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे हर हाल में लेकर रहेंगे। भारत के लासानी स्वतंत्रता सेनानी, प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ, विधिवेता और समाज सुधारक लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने शेर की तरह दहाड़ते हुए अपने उक्त शब्दों से सदियों से गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए, विशाल संस्कृति एवं शूरवीरता को भुलाकर चादर तानकर सोए हुए भारतीयों में नए खून का संचार कर दिया। हकीकत में यह अंग्रेज हुकूमत के लिए एक चेतावनी ही नहीं बल्कि एक चुनौती भी थी। उनको कुछ अन्य केसों के साथ 6 वर्ष की कारावास में भेज दिया गया। उनके मुकद्दमे की पैरवी उस समय के प्रतिष्ठित बैरिस्टर मोहम्मद अली जिन्ना ने की थी। तिलक 

जिस दिन महाराजा अशोक ने तलवार कमर से उतारकर जमीन पर रख दी, उसके परिणामस्वरूप ही देश विदेशी आक्रमणकारियों के लिए खुल गया। हूण, शक, यूनानी, ईरानीस  दोरानी, मंगोल, तुर्क, पठान, अफगान, अंग्रेज, डच, फ्रांसीसी और पुर्तगालियों ने भी भारत के कुछ इलाकों पर कब्जा कर लिया। ईस्ट इंडिया कम्पनी के मुट्ठी भर अंग्रेज व्यापार करने के लिए भारत आए। परंतु  हमारी कमियों और कमजोरियों को देखते हुए वह भारत के ही शासक बन बैठे। अंग्रेजों ने समूचे देश में एक ही प्रशासनिक व्यवस्था, एक ही न्यायिक व्यवस्था, एक तरह के कानून, एक तरह की करंसी और एक ही तरह की सरकारी सेवाओं का भी प्रबंध कर दिया था। पश्चिमी शिक्षा प्रणाली ने  भारत में राष्ट्रवाद को स्थापित करने में बड़ी सहायता की। 
अंग्रेजों ने भारत के अंदर कई स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटियां स्थापित कर दी थीं। इस पश्चिमी शिक्षा से भारतीयों को पश्चिम के चिंतकों, दानिशमंदों, दार्शनिकों और साहित्यकारों की पुस्तकें पढऩे का भी मौका मिला और इसी शिक्षा प्रणाली से प्रजातंत्र, स्वतंत्रता, समानता,  भाईचारा, समाजवाद, साम्यवाद और बहुत सारी अन्य सूचनाएं उनको मिलने लगीं। 

अंग्रेजी भाषा सारे देश की लिंगउवा फरेंका बोलचाल की भाषा बन गई। जबकि पहले कई भाषाएं और उप-भाषाएं होने के कारण एक-दूसरे के विचारों को समझना मुश्किल होता था। वास्तव में अंग्रेजी भाषा ने ही सबसे पहले एक मंच पर लोगों को एकत्रित होने का मौका दिया और भारत में भविष्य की स्वतंत्रता की नींव रखी गई। अंग्रेजों ने भारत के अंदर रेलवे का जाल बिछा दिया। कृषि क्षेत्र को प्रफुल्लित करने के लिए नहरें निकालीं। पोस्टल और टैलीग्राफ सिस्टम प्रणाली की भी स्थापना की। इस तरह लोगों का आपस में मेल-जोल आसानी से होने लगा। स्वतंत्रता प्रैस की स्थापना से लोगों के विचार समाचारपत्र में पढऩे को मिलने लगे। राष्ट्रवाद के इस आंदोलन में अमृत बाजार पत्रिका, द बंगाली, दी ट्रिब्यून, द इंडियन मिरर, द हिन्दू, द पायोनियर, द मेड्रास मेल, द  मराठा और केसरी समाचार पत्रों ने भारतीयों को अपने अधिकारों के प्रति खुलकर जागरूक करवाया। 


19वीं शताब्दी हकीकत में एक बड़े उथल-पुथल का युग था। इसमें राजनीतिक, सामाजिक, आॢथक, धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर बहुत परिवर्तन होने लगे। राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ  आवाज बुलंद की। स्वामी दयानंद ने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ  आंदोलन चलाया। स्वामी विवेकानंद ने भारत की प्राचीन संस्कृति का विश्व में प्रचार करके इसके गौरव को बढ़ाया और भारतीयों में जागृति पैदा की। देश में कूका आंदोलन ने जोर पकड़ा, सिंह सभा आंदोलन शुरू हुए और 1885 में लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का भी जन्म हुआ। 1885 से 1905 तक उदारवादी नेताओं का बोलबाला रहा जिनमें दादा भाई नारोजी, सुरिंदर नाथ बनर्जी, फिरोज शाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले और अन्य नेताओं ने भारतीयों की समस्याओं को अंग्रेजों के सामने समय-समय पर रखा। 

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