संपादकीय

‘लाल आतंकवाद’ से मुक्ति!

भारत लगभग नक्सल-मुक्त हो गया। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में यह दावानुमा घोषणा की। नक्सल-मुक्त स्थिति के लिए 31 मार्च, 2026 आखिरी तारीख तय की गई थी, लेकिन संसद में नक्सलवाद पर बहस हुई, जिसके जवाब में गृहमंत्री ने घोषणा की और नक्सलवाद के विस्तार की स्थितियों और कारकों का भी खुलासा किया। गृहमंत्री ने उल्लास और उत्साह में यह भी घोषणा की कि देश में ‘लाल कॉरिडोर’ का खात्मा कर दिया गया है। जो 2-4 नक्सली नेता फरार हैं, वे या तो आत्मसमर्पण कर देंगे अथवा उन्हें ढेर कर दिया जाएगा। विपक्ष इन्हें भी अन्यायपूर्ण हत्याएं करार दे रहा है। आश्चर्य है…! बहरहाल अब ‘नक्सलवाद’ शब्द इतिहास में दर्ज होकर रह जाएगा। देश से ‘वामपंथी, माओवादी आतंकवाद’ के खात्मे में करीब 59 लंबे साल लग गए। सरकार ने 706 माह का वक्त माना है। जो आंदोलन वामपंथी नेता चारु मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में 1967 में पश्चिम बंगाल से शुरू किया गया था, वह वैचारिक कम और हथियारबंद, हिंसक अधिक था। बेशक आंदोलन को किसान, मजदूर, भूमिहीन, आदिवासी की लड़ाई का आवरण दिया गया। आर्थिक असमानता, शोषण, अन्याय, पूंजीवाद, भूमि का असमान वितरण या भूमिहीनता, सर्वहारा, बुर्जुआ आदि शब्दों को नारों के तौर पर इस्तेमाल किया गया, लेकिन 2026 तक भी वे नारे खोखले, आडंबर साबित हुए, क्योंकि असमान स्थितियां आज भी देश में हैं। नक्सली देश की संसदीय व्यवस्था के खिलाफ थे और देश में ‘सशस्त्र क्रांति’ लाने के पक्षधर थे। जो आंदोलन या उग्रवाद देश के करीब 150 जिलों तक फैला था और जिसे ‘रेड कॉरिडोर’ नामकरण दिया गया था, वाकई वे इलाके रक्त-रंजित थे।

नक्सलियों ने समानता और न्याय की अपनी सोच गढ़ते हुए 7532 मासूम, बेगुनाह लोगों को मारा। करीब 5000 सुरक्षा-जांबाजों को ‘शहीद’ किया। देश के करीब 17 फीसदी हिस्से पर जिनका ‘रेड कॉरिडोर’ था, देश की 12 करोड़ से अधिक आबादी ‘लाल उग्रवाद’ से प्रभावित और दमित थी, वह कैसा सामाजिक आंदोलन था? जिन्होंने करीब 20,000 युवाओं की हत्या की। क्यों की…? करीब 92 फीसदी अत्याधुनिक हथियार पुलिस और सुरक्षा बलों से छीन लिए, यह समानता और गरीबी-उन्मूलन का कैसा आंदोलन था? ‘लाल आतंकवाद’ के खिलाफ लड़ाई और उसे खत्म करने की मुहिम पर सरकार को 2000 करोड़ रुपए सालाना खर्च करने पड़ रहे थे। देश को नक्सल-मुक्त करने के अभियानों, संघर्षों, मुठभेड़ों के दौरान 706 नक्सली मार दिए गए, 2208 को गिरफ्तार कर जेलों में भेज दिया गया और 4839 ने आत्मसमर्पण किया। ये तमाम खुलासे गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में किए हैं और सुरक्षा बलों, पुलिस के जवानों को ‘सैल्यूट’ किया है। मुक्ति-अभियान के बावजूद एक तबका ऐसा है, जिसने जेएनयू में जश्न मनाया था, जब नक्सलियों ने हमला कर सीआरपीएफ के 76 जवानों को एक साथ ‘शहीद’ किया था। यही तबका ‘अरबन नक्सल’ है, जिसमें बौद्धिक, डॉक्टर, पत्रकार, सांसद, सम्मानित लेखक आदि शामिल हैं। वे आज भी नक्सलियों के पैरोकार हैं और उनके पक्ष में आलेख लिखते रहे हैं। एक हिंसक आंदोलन की पैरोकारी भी ‘अपराध’ है। नक्सलवाद की स्थापना और सक्रियता के बाद, एक ही साल में, 3620 हिंसक घटनाएं की गई थीं। 2002 में ‘राजधानी एक्सप्रेस’ रेलगाड़ी पर हमला बोल कर 130 बेगुनाह यात्रियों को मार दिया गया था। बहरहाल, बेशक ‘लाल आतंकवाद’ का लगभग खात्मा हो जाए, लेकिन आपराधिक, हत्यारी मानसिकता के अवशेष जिंदा रहते हैं। उन्हें भी कुचलना चाहिए।

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