संपादकीय

मुफ्तखोरी के चुनाव…

भाजपा का दिल्ली संकल्प-पत्र भी मुफ्त की रेवडिय़ों का संकलन लगता है। इसी के साथ सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने मुफ्तखोरी के पिटारे खोल दिए हैं। यह मुफ्तखोरी का दौर है। यदि औसत आदमी को बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य मुफ्त में ही मिल जाएं। ‘आयुष्मान भारत’ योजना के साथ 5 लाख रुपए तक का इलाज (यानी 10 लाख रुपए तक मुफ्त) भी ‘फ्री’ में उपलब्ध हो जाए। यदि 2100 रुपए से 2500 रुपए तक माहवार मुफ्त में ही महिलाओं को मिलते रहें, यदि बुजुर्गों की पेंशन भी 2500-3000 रुपए तय कर दी जाए, तीर्थ-यात्रा भी मुफ्त में कराई जाए, बस-यात्रा और मेट्रो-यात्रा भी मुफ्त या आधी हो जाए, देश भर में 81 करोड़ से ज्यादा गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने के अतिरिक्त 5 रुपए में भरपेट खाने की योजना भी मिल जाए, तो बेहद अहम सवाल है कि काम कौन और क्यों करेगा? यदि देश में कमेरों की संख्या लगातार कम होती जाएगी, तो देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का क्या होगा? औसत व्यक्ति की मांग, उपभोग ही कम होते जाएं, तो उत्पादन और बाजार के हालात कैसे होंगे? जिस देश में अधिकतर आबादी मुफ्तखोरी पर जिंदा हो, तो उसकी अर्थव्यवस्था ‘विकसित’ कैसे हो सकती है? पहले किसी भी चुनाव में, रात के अंधेरों में, शराब के साथ नोट भी बांटे जाते थे, लेकिन अब खुल्लमखुल्ला पैसा ही नहीं, साड़ी, कंबल, चादर, जूते-चप्पल और सोने की चेन (जैसी चर्चा है) तक बांटी जा रही हैं। आचार-संहिता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सब खामोश और मूकदर्शक बने हैं। यह जनादेश का चुनाव है या एक-एक वोट खरीदा जा रहा है अथवा लोकतंत्र ही बेचा जा रहा है। मुफ्तखोरी की इस राजनीति ने आम आदमी को ‘भिखारी’ ही बना दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के दो बयान गौरतलब हैं, लेकिन विरोधाभासी भी हैं। प्रधानमंत्री ने करीब दो साल पहले, किसी चुनाव में ही, कहा था कि रेवडिय़ों की संस्कृति से देश का बंटाधार हो जाएगा। देश की अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत खतरनाक है। दूसरा बयान था-‘रेवड़ी कल्चर जनता को मूर्ख बनाने की कोशिश है।’ विरोधाभास यह है कि प्रधानमंत्री की पार्टी भाजपा ही सबसे अधिक, व्यापक स्तर पर, रेवडिय़ां बांट रही है। आम आदमी पार्टी (आप) की राजनीति तो दिल्ली, पंजाब तक सीमित है।

कांग्रेस की तीन राज्यों में ही सरकारें हैं। भाजपा-एनडीए की सरकारें 20 से अधिक राज्यों में हैं। सवाल है कि देश प्रधानमंत्री के बयान पर भरोसा करे अथवा चुपचाप ‘मुफ्तखोरी का माल’ ग्रहण करता रहे? ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने तो रेवडिय़ों को ‘भगवान का प्रसाद’ माना है। ‘आप’ की दलीलें हैं कि उद्योगपतियों के 15-16 लाख करोड़ रुपए माफ किए जा सकते हैं, तो आम आदमी को कुछ सुविधाएं देना भी कल्याणकारी सरकारों का दायित्व है। दिल्ली चुनाव में मुफ्तखोरी की तो बहार है, लेकिन किसी भी दल ने नौकरी, रोजगार मुहैया कराने की चरणबद्ध योजना की घोषणा नहीं की है। यह प्रवृत्ति फिलहाल तो दिल्ली चुनाव में ही देखी जा रही है, अलबत्ता अन्य राज्यों के चुनावों में भी ऐसा लगता है मानो खुलेआम रिश्वत बांटी जा रही है! दिल्ली में भाजपा को यह घोषणा भी करनी पड़ी है कि यदि उनकी सरकार आई, तो ‘आप’ सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को भी जारी रखा जाएगा। उन्हें अधिक कारगर और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जा सकता है। यदि भाजपा ‘आप’ सरकार की योजनाओं को भी जारी रखना चाहती है, तो सवाल है कि फिर भाजपा को ही जनादेश क्यों दिया जाए? बहरहाल अभी देश पर करीब 200 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। यह कर्ज क्यों लेना पड़ा, देश के सामने स्थिति साफ नहीं है, लेकिन जीडीपी का मोटा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। राज्यों पर भी 3 लाख करोड़ से लेकर 7.5 लाख करोड़ रुपए तक के कर्ज हैं। दिल्ली अद्र्धराज्य में भी 15,881 करोड़ रुपए का वित्तीय घाटा दिखाया गया है। ऐसे देश में मुफ्तखोरी की राजनीति करना, रेवडिय़ों की बढ़-चढ़ कर घोषणाएं करना क्या देशहित में है? स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि देश की राजनीति इस समय मुफ्तखोर जनता को पैदा कर रही है। कई देशों में इस तरह की राजनीति के भयंकर परिणाम सामने आ चुके हैं। अब समय आ गया है कि मुफ्तखोरी की राजनीति को रोकने के लिए सभी दलों को देशहित में सोचना होगा। काम से दूर करना और मुफ्तखोरी की आदत डालने से भारत विकसित देश नहीं बन पाएगा। देश के हर नागरिक को डटकर काम करना होगा, आर्थिकी में सहयोग करना होगा, तभी विकसित भारत का सपना साकार होगा। मुफ्त की सुविधाएं बांटने के बजाय दलों को सभी युवाओं को रोजगार उपलब्ध करवाने होंगे।

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