संपादकीय

सियासी बयानों पर FIR

सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के खिलाफ मानहानि के एक मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर सोमवार को स्टे लगा दिया। दिलचस्प है कि इससे पहले शनिवार को ही उनके खिलाफ असम पुलिस ने गुवाहाटी में एक FIR दर्ज की। दरअसल, देश में राजनीतिक बयानों पर कोर्ट में केस करने या FIR दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति कई सवाल खड़े करती है।

राजनीतिक बयान : ऊपर जिन दो मामलों का जिक्र किया गया है, उनमें राहुल के बयान राजनीतिक प्रकृति के हैं। मानहानि के केस में राहुल गांधी के उन बयानों पर आपत्ति जताई गई है, जिनमें उन्होंने कथित तौर पर BJP सदस्यों को झूठा और सत्ता के नशे में डूबा बताया है। गुवाहाटी में दर्ज FIR का वास्ता उनके उस बयान से है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर भारत राज्य से संघर्ष की बात कही थी।

हावी होता सरकारी तंत्र : बात राहुल गांधी की हो या किसी अन्य नेता की, उनके बयानों से सहमत होना जरूरी नहीं है। यह दलील भी नहीं दी जा सकती कि बड़े राजनीतिक दलों के नेता देश के कानून से ऊपर हैं। अगर वे किसी कानून का उल्लंघन करते हैं तो कानूनी प्रक्रियाओं का सामना करने के लिए उन्हें तैयार भी रहना चाहिए। लेकिन जब किसी लोकतंत्र में राजनीतिक बयानों को कानून व्यवस्था के सरकारी तंत्र के जरिए नियंत्रित करने का प्रयास होने लगे तो उसे अच्छा नहीं माना जा सकता।

राज्य सरकारें भी पीछे नहीं : 
दिक्कत यह भी है कि ऐसा अगर किसी एक पार्टी की सरकार में होने लग जाए तो दूसरे दल भी जहां उनकी सरकारें हैं, वहां पीछे नहीं रहते। पश्चिम बंगाल से लेकर कर्नाटक तक ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जब सत्तारूढ़ दल या नेता के खिलाफ की गई टिप्पणियों पर FIR दर्ज की गई।

बड़े नेताओं से उम्मीद : हालांकि यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे तमाम मामलों में सरकार और पार्टी के बड़े नेताओं की सहमति शामिल होती है। लेकिन ये बड़े नेता चाहें तो इस प्रवृत्ति पर रोक जरूर लगा सकते हैं। याद रखना चाहिए जिन पड़ोसी देशों में लोकतंत्र का मजाक बनता हुआ हम देखते हैं, उन सबमें विरोधी राजनीति को कानून की बलि चढ़ाकर ही सत्तातंत्र वहां तक पहुंच पाता है।

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