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भूकंप की आशंकाओं संग जीने का तरीका तलाशें…

भूकंप की चर्चा अक्सर तब होती है, जब वह किसी इलाके में आ जाता है। इसकी पुनरावृत्ति और इससे बचाव की तैयारियों की चर्चाएं कुछ दिन तक चलने के बाद खामोश हो जाती हैं। दुनिया अपनी पहली सी चाल में व्यस्त हो जाती है और भूकंप अदालत में चल रहे किसी मामले की तरह एक अगली तारीख के लिए मुल्तवी हो जाता है। जैसे, सोमवार की सुबह देश का राजधानी दिल्ली परिक्षेत्र एक जलजले की आहट से चौंक उठा। रिक्टर स्केल पर चार की तीव्रता वाला भूकंप दहलाकर चला गया, लेकिन महीना भर पहले ही पड़ोस में तिब्बत के भूकंप ने एक बड़ी चेतावनी हमें दी थी।

हिमालय और इससे सटे हुए इलाकों में भूकंप का आना एक बड़ी चेतावनी माना जाता है, पर हफ्ता बीतते-बीतते भूकंप की खबर और चिंता हवा हो जाती हैं। शायद यही वजह है कि कुछ ही समय पहले भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के 150 साल पूरे होने और मिशन मौसम की शुरुआत के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैज्ञानिकों से भूकंप का सटीक पूर्वानुमान लगाने और चेतावनी देने वाली प्रणाली विकसित करने का आह्वान किया था। उद्देश्य है कि पूर्वानुमानों से भूकंप की त्रासदी को सीमित किया जा सके।

यह सुखद है कि तमाम दावों के बावजूद मोटे तौर पर 2015 के बाद से उत्तर भारत में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। हालांकि, बार-बार चेताया गया है कि पर्वतीय राज्यों- खास तौर से उत्तराखंड से लेकर हमारे देश की राजधानी दिल्ली-एनसीआर की जमीन के भीतर बहुत अधिक खिंचाव की स्थिति बन गई है और यहां कभी भी ज्यादा ताकत वाला भूकंप आ सकता है। देहरादून स्थित वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि हिमालय क्षेत्र में एक बड़ा भूकंप कभी भी आ सकता है। इसलिए जान-माल का नुकसान न्यूनतम करने के लिए पहले से बेहतर तैयारी जरूरी है। वहीं इस चेतावनी का समर्थन कुछ मौकों पर आईआईटी कानपुर के पृथ्वी विज्ञान विभाग के प्रोफेसरों ने भी किया है। इन वैज्ञानिकों ने कहा है कि धरती के नीचे भारतीय प्लेट व यूरेशियन प्लेट के बीच टकराव बढ़ रहा है। इससे वहां बड़े पैमाने पर ऊर्जा जमा हो गई है और वह कभी भी बड़े विस्फोट के साथ बाहर निकल सकती है। जो बड़े भूकंप का कारण बनेगी। वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने हिंदुकुश पर्वत से पूर्वोत्तर भारत तक के हिमालयी क्षेत्र को भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील बताते हुए कहा है कि खतरों से निपटने के लिए संबंधित राज्यों में कारगर नीतियां नहीं हैं।

नि:संदेह, धरती के अंदर चल रही भूगर्भीय हलचलों के कारण ज्वालामुखी विस्फोटों से लेकर भूकंपों तक का खतरा लगातार बना हुआ है। हाल यह है कि धरती पर करीब 10 करोड़ भूकंप हर साल आते हैं, लेकिन उनमें से नुकसान पहुंचाने वाले भूकंपों की संख्या बेहद कम है। दशकों से भूगर्भ वैज्ञानिक लगातार कह रहे हैं कि भले ही बड़े भूकंप की कोई निश्चित तारीख नहीं बताई जा सकती। लेकिन सवाल उठता है कि क्या भूकंपों की पूर्व सूचना देने का तंत्र विकसित नहीं हो सकता। निस्संदेह, वैज्ञानिक तरक्की के बावजूद इंसान आज भी धरती के अंदर की हलचलें पहले से पढ़ पाने में नाकाम ही है।

चार साल पहले ऐसी एक पहल उत्तराखंड में की गई थी। वहां साल 2021 में आपदा प्रबंधन विभाग और आईआईटी रुड़की ने मिलकर उत्तराखंड भूकंप अलर्ट एेप तैयार किया था। दावा किया गया था कि भूकंप की पूर्व सूचना देने वाले एप को लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य है। कहा गया कि जिन लोगों के पास सामान्य स्मार्टफोन नहीं हैं, उन्हें भी उनके फीचर फोन पर भूकंप की पूर्व चेतावनी मिल सकेगी। लोग समय रहते उससे बचाव का प्रबंध कर सकेंगे। यह देखते हुए कि पिछले 10-15 वर्षों में उत्तराखंड भूकंप के करीब 700 झटके झेल चुका है, इस ऐप को एक बड़ी उम्मीद माना गया था। लेकिन हकीकत में इस ऐप से उत्तराखंड निवासियों को कोई मदद नहीं मिल सकी।

दरअसल, हिमालय क्षेत्र की जो भौगोलिक स्थिति है और वहां धरती के भीतर जिस तरह की हलचल मची हुई है, उसमें भूकंप आने का खतरा हमेशा बना रहता है। निस्संदेह, भारत में अभी भूकंप की चेतावनी का कोई विश्वसनीय सिस्टम बना नहीं है और हमारी सरकार तक यह कह चुकी है कि दुनिया में ही इसका कोई कारगर सिस्टम नहीं है। निश्चय ही कोई भी देश, संगठन या वैज्ञानिक अभी दावे के साथ यह कहने की स्थिति में नहीं हैं कि वे भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट और सुनामी का एकदम सही पूर्वानुमान पेश कर सकते हैं। इस चिंता ने लोगों को और ज्यादा सतर्कता बरतने को विवश कर रखा है।

एक घटना इटली में भूकंप के पूर्वानुमान से जुड़ी है जिसने दुनिया भर के वैज्ञानिक समुदाय को ही बेचैन कर दिया था। असल में डेढ़ दशक पहले (वर्ष 2011 में) वहां छह साइंटिस्टों और एक सरकारी अधिकारी के खिलाफ इसलिए हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया था क्योंकि वे छह अप्रैल, 2009 को इटली के ला-अकिला में आए भूकंप की सही भविष्यवाणी करने में नाकाम रहे थे। ये सभी इटली में प्राकृतिक आपदाओं के खतरे पर नजर रखने वाली समिति के सदस्य थे। इन्हें ला-अकिला में भूकंप से ठीक एक दिन पहले यह जांच करने बुलाया गया था कि क्या वहां बड़े भूकंप का कोई खतरा तो नहीं है। उस इलाके में निकल रही रेडॉन गैस की मात्रा के आधार पर इन साइंटिस्टों ने आश्वस्त किया था कि फिलहाल खतरा ऐसा नहीं है कि पूरे इलाके को खाली कराया जाए। पर अगले दिन वहां 6.3 की ताकत वाला बड़ा भूकंप आ गया, जिसमें 300 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई।

दुनिया के हजारों साइंटिस्टों ने साझा बयान में इस मुकदमे का विरोध किया था। उनका कहना था कि साइंटिस्टों को बलि का बकरा बनाने के बजाय भूकंप से सुरक्षा के उपायों पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि भूकंप की पक्की भविष्यवाणी करने की कोई विधि अभी तक विकसित नहीं हो सकी है। जहां तक रेडॉन गैस की बात है तो वह भूकंप की भविष्यवाणी करने की विवादास्पद प्रणाली है, कई बार गलत भी साबित हुई है।

बहरहाल, पक्के तौर पर नहीं कह सकता कि कब, किस जगह पर कितना बड़ा भूकंप आएगा। असल में भूगर्भीय प्लेटों के परस्पर जुड़ने, धराखंड से अलग होने और टूटन-चटकने के कारण भूमिगत ताप, दाब संवेग और रासायनिक क्रियाओं और इस कारण पैदा हुई ऊर्जा तरंगों का एक विकृत रूप हमें भूकंप की शक्ल में जब-तब देखने को मिलता है। हालांकि भूकंपों से अगर हम कोई सबक लेना चाहें, तो वह हमें इस आपदा से काफी हद तक सुरक्षित कर सकता है। दिल्ली और एनसीआर का बड़ा हिस्सा भूकंप की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है। साथ ही, उत्तराखंड, उ.प्र. और पूरा बिहार खिसकती हुई हिमालयी प्लेट के हिस्से हैं। भूकंप से बचाव का सबसे अच्छा तरीका है सतर्कता और बचाव के इंतजाम करना। कई देशों के उदाहरण इस संदर्भ में दिए जा सकते हैं। जैसे, अल्जीरिया में ज्यादातर स्कूलों और रिहाइशी इलाकों की इमारतें सीस्मिक बिल्डिंग कोड के तहत बनाई गई हैं। इसी तरह कनाडा का अपना राष्ट्रीय बिल्डिंग कोड है और वहां अस्पताल, स्कूल व अन्य सरकारी-रिहाइशी इमारतें इसी के तहत बनाई जाती हैं। मध्य अमेरिका में सेंट्रल अमेरिका स्कूल रेट्रोफिटिंग प्रोग्राम के तहत स्कूलों की बिल्डिंग्स को खतरे से बचाने के लिए खास इंतजाम किए गए हैं। चिली के स्कूलों में बच्चों को साल में तीन बार भूकंप से बचने की ट्रेनिंग दी जाती है। चिली के 2010 के 8.8 तीव्रता के भूकंप में स्कूलों को सबसे कम नुकसान इसीलिए हुआ था क्योंकि इमारतें बिल्डिंग कोड का पालन करती थीं।-डॉ. संजय वर्मा

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