संपादकीय

फिजूल का विवाद

आतंकवाद के खिलाफ भारत की जीरो टॉलरेंस पॉलिसी और ऑपरेशन सिंदूर के बारे में दुनिया को बताने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजने का सरकार का फैसला जितना सराहनीय है, उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण है इसका विवादों में घिर जाना। देश की सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े विषय पर राजनीति किसी के हित में नहीं है।

पाक को घेरने की नीति: पहलगाम में आतंकियों की नृशंसता के बावजूद जवाब देते हुए भारत ने जिस तरह संयम बरता, उसकी तारीफ सभी कर रहे हैं। पाकिस्तान की तरफ से उकसावे वाले कदमों के बाद भी भारत की प्रतिक्रिया सधी, सटीक और नियंत्रित रही। हिंदुस्तान ने पाकिस्तान को जवाब ही नहीं दिया, उसकी असलियत भी दुनिया के सामने ला दी है। इस्लामाबाद के बचे हुए सपोर्ट सिस्टम को खत्म करने और भारत की चिंता और स्टैंड से दुनिया को वाकिफ कराने के लिए सरकार की ओर से सात सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल विभिन्न देशों में भेजे जाएंगे।

मकसद पर सवाल: ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सभी दलों ने सरकार और सेना के प्रति समर्थन जताया था। सरकार ने भी उसी भावना का सम्मान करते हुए सभी दलों से सांसदों को प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया है। लेकिन कांग्रेस के सदस्यों, खासकर सांसद शशि थरूर को लेकर हो रहा विवाद बिल्कुल अनचाहा है। इससे एक अच्छा मकसद नकारात्मक खबरों में घिर गया है।

कहां गई एकजुटता: कांग्रेस ने थरूर का नाम नहीं भेजा था, सरकार ने उन्हें अपनी तरफ से शामिल कर लिया। जिनके नाम कांग्रेस ने दिए थे, उनमें से सिर्फ आनंद शर्मा चुने गए। कांग्रेस का आरोप है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले पर BJP ओछी राजनीति कर रही है। वहीं, BJP ने कांग्रेस के भेजे नामों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह तस्वीर उससे बिल्कुल अलग है, जब सारे दल आतंकवाद के खिलाफ जंग में एकजुट नजर आ रहे थे।

विवाद नहीं, संवाद चाहिए: थरूर पहले संयुक्त राष्ट्र में काम कर चुके हैं, विदेश राज्य मंत्री रह चुके हैं। उनके अनुभव का फायदा निश्चित रूप से डेलिगेशन को मिलेगा। हालांकि कांग्रेस को लगता है कि उसके सांसद को चुनने से पहले उससे पूछा जाना चाहिए था। इस अपेक्षा को गलत नहीं कहा जा सकता। मगर इसे विवाद का मुद्दा बनाने से बचा जा सकता था। अच्छा होता कि सत्ता पक्ष और विपक्ष सार्वजनिक आरोप-प्रत्यारोप के बजाय सीधे आपस में बात करते।

राजनीति से ऊपर: शशि थरूर और कांग्रेस के रिश्ते पिछले कुछ समय से ठीक नहीं रहे हैं। लेकिन यह एक सांसद और उसकी पार्टी के बीच का मसला है। यहां जो मुद्दा सामने है, वह देश से जुड़ा है। इसमें सभी को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना चाहिए।

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