राष्ट्रीय

आतंकी घटना, जिम्मेदारी से बचने फारूक ने छोड़ा शगूफा

जम्मू -कश्मीर में सत्तारूढ़ नैशनल कांफ्रैंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला ने बडग़ाम, बांदीपोरा और श्रीनगर में आतंकी घटनाओं को लेकर कहा है कि इसमें उन्हें साजिश की बू आती है। उन्होंने कहा कि क्या कोई एजैंसियां तो नहीं हैं इन हमलों के पीछे, जो उमर अब्दुल्ला सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही हैं। एक ऐसा शख्स, जिसने पूरा जीवन राजनीति के दांवपेच में बिताया और वोट बैंक के भय से खुल कर कभी भी आतंकियों और पाकिस्तान की ङ्क्षनदा नहीं की, वह सवाल उठा रहा है कि आतंकी घटनाओं की जांच हो कि इसमें कोई एजैंसियां तो शामिल नहीं हैं। इतने अनुभवी राजनीतिज्ञ से ऐसे बचकाना बयान की उम्मीद नहीं की जा सकती।

क्या अब्दुल्ला को पता नहीं कि ये हमले कौन और क्यों करवा रहा है? इससे पहले इन्हीं अब्दुल्ला ने हमलों के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाया था और यहां तक कहा था कि जम्मू-कश्मीर कभी भी पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनेगा। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि सीनियर अब्दुल्ला को अब इन हमलों में पाकिस्तान के अलावा किसी और पर शक होने लगा है। दरअसल उमर अब्दुल्ला ने जब सत्ता संभाली, तभी पिता-पुत्र को इस बात का बखूबी अंदाजा था कि जम्मू-कश्मीर में आतंकी घटनाओं को रोकना आसान काम नहीं है। 

सत्ता में आने से पहले दोनों ने ऐसी वारदातों का ठीकरा केंद्र के सिर फोडऩे में कसर बाकी नहीं रखी। हालांकि केंद्र और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने इन्हें रोकने के लिए पूरी ताकत लगा रखी है। इस प्रयास में आम नागरिकों के अलावा सैंकड़ों सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। तब अब्दुल्ला पिता-पुत्र ने यह सवाल नहीं उठाया? इसके विपरीत इन आतंकी घटनाओं को नैशनल कांफ्रैंस की सरकार को अस्थिर करने के चश्मे से देखा जा रहा है। 

गौरतलब है कि इन्हीं पिता-पुत्र ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद बड़ा हो-हल्ला मचाया था। यहां तक कि हाल ही में हुए जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव में नैशनल कांफ्रैंस के चुनावी घोषणा पत्र में इसे वापस लाने का वादा किया गया था। पाकिस्तान भी धारा 370 की बहाली की मांग करता आ रहा है। अब्दुल्ला ने यह मांग दोहरा कर एक तरह से पाकिस्तान की मांग का ही समर्थन किया है। जबकि यह सर्वविदित है कि इस धारा के हटने के बाद से जम्मू-कश्मीर में विकास के कामों में जबरदस्त तेजी आई है। इस पर अब्दुल्ला पिता-पुत्र एक बार भी नहीं बोले। 

कारण साफ है, उस वक्त जम्मू-कश्मीर में केंद्र का शासन था। अब जब उनकी पार्टी सत्ता में है तो उन्हें आतंकी घटनाओं के पीछे साजिश नजर आ रही है। अब्दुल्ला ने कहा कि आतंकियों को मारने की बजाय जीवित पकडऩा चाहिए, ताकि पता लगाया जा सके कि वे किसके लिए काम करते हैं। फारूक को यह भी बताना चाहिए कि घातक हथियारों से लैस आतंकियों को कौन जीवित पकड़ेगा? अब जम्मू-कश्मीर के लोग इन आतंकी घटनाओं के लिए उमर अब्दुल्ला सरकार पर वही सवाल उठा रहे हैं, जो पूर्व में ये केंद्र सरकार से करते रहे हैं। ऐसे में इनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं।

सर्वविदित है कि पाकिस्तान की बदनाम खुफिया एजैंसी आई.एस.आई. ये हमले करवा रही है। यह बात फारूक अब्दुल्ला और उनके मुख्यमंत्री पुत्र भी अच्छी तरह से जानते हैं। जम्मू-कश्मीर पर सीमा पार पाकिस्तान में आतंकी कैम्प मौजूद हैं। फारूक अब्दुल्ला भारत की विदेश नीति के मामले में हमेशा से हस्तक्षेप करते रहे हैं। उन्होंने कई बार कहा है कि आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को लेकर भारत को पाकिस्तान से वार्ता करनी चाहिए। ऐसे बयानों ने पाकिस्तान के हौसले ही बढ़ाए हैं, जो कई बार भारत से हुई बातचीत के बावजूद सीमा पार से आतंकी भेजने की हरकतों से बाज नहीं आ रहा।

पाकिस्तान दबे-छिपे तरीके से कई बार भारत से संबंध बहाल करने का प्रयास कर चुका है, किन्तु भारत की तरफ से उसे हर बार एक ही जवाब मिला है कि आतंक और व्यापार एक साथ नहीं चल सकते। फारूक अब्दुल्ला के इस शगूफे के दूसरे निहितार्थ भी हो सकते हैं। अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग कई बार कर चुके हैं, जिससे उमर अब्दुल्ला सरकार को पुलिस प्रशासन की कमान मिल जाएगी। इसके अलावा भी दूसरे अधिकार मिल जाएंगे। सवाल यही है कि जम्मू-कश्मीर में पुलिस और सेना मिलकर भी आतंकवाद पर पूरी तरह काबू नहीं कर पा रहे, तब फारूक सरकार कानून-व्यवस्था कैसे संभाल पाएगी। 

इसके विपरीत संभावना इस बात की ज्यादा है कि पुलिस का अधिकार मिलने के बाद सिफारिश और सरकारी हस्तक्षेप से भेदभाव की घटनाएं होंगी। यहां तक कि आतंकियों के समर्थकों पर कार्रवाई नहीं हो सकेगी। ऐसे में जरूरी है कि केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से पहले इस बात की अच्छी तरह ताकीद कर ले कि ऐसा करना कहीं आतंकियों के लिए फायदे का सौदा साबित न हो। –योगेन्द्र योगी

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