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हर चुनाव ‘स्वतंत्र’ है


यह
 मानना गलत और अद्र्धसत्य है कि एक राज्य के चुनाव नतीजे दूसरे राज्य के जनादेश को तय करते हैं। कुछ संयोग और अपवाद जरूर हो सकते हैं। अलबत्ता प्रत्येक चुनाव ‘स्वतंत्र’ होता है। हरियाणा में कांग्रेस को ‘विजयी’ आंका जा रहा था, लेकिन अंतिम जनादेश भाजपा के पक्ष में रहा। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन जीता है, हालांकि उसमें कांग्रेस का योगदान लेशमात्र है। भाजपा वहां दूसरी सबसे ताकतवर पार्टी बनकर उभरी है। अब सवाल यह है कि क्या कश्मीर-हरियाणा के औसत मतदाता की मानसिकता और राजनीतिक सोच वही है, जो महाराष्ट्र और झारखंड के दूरदराज इलाकों में मौजूद मतदाता की है? क्या दोनों क्षेत्रों की समस्याएं और उनके सरोकार भी समान हैं? क्या हरियाणा-कश्मीर के जनादेश अब महाराष्ट्र और झारखंड के चुनावी परिदृश्य को प्रभावित करेंगे और वहां कांग्रेस समेत ‘इंडिया’ गठबंधन पराजित हो सकते हैं? हमारे सामने लोकसभा चुनाव का भी उदाहरण है। लोकसभा चुनाव अप्रैल-मई, 2024 में हुए, लेकिन उनसे पहले मप्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना आदि राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए। उनमें तेलंगाना को छोड़ कर शेष सभी राज्यों में जनादेश भाजपा के पक्ष में रहा। तेलंगाना में कांग्रेस जीती। इस अनुपात में लोकसभा चुनाव के नतीजे नहीं रहे। आम चुनाव को विधानसभा चुनावों का सारांश माना जाता है। यह धारणा भी भ्रामक है। इसका कोई निश्चित मानदंड नहीं है। हर राज्य अपने-अपने मुद्दों और राजनीतिक लहर के आधार पर जनादेश देता है। मसलन-किसानों का आंदोलन और मांग भी ‘राष्ट्रीय’ नहीं है। दिल्ली में जो किसान आंदोलन देखा गया, उसमें पंजाब और हरियाणा के किसानों का ही जमावड़ा था। किसान महाराष्ट्र में भी एक सांगठिन ताकत हैं, लेकिन वे एमएसपी की मांग नहीं कर रहे, बल्कि वे आंदोलित भी नहीं हैं। सवाल है कि किसान ‘राष्ट्रीय’ मुद्दा कैसे हो सकते हैं? चूंकि कांग्रेस ने हरियाणा में ‘जीती बाजी’ हारी है, लिहाजा उसके सहयोगी दल भी मानने लगे हैं कि कांग्रेस महाराष्ट्र और झारखंड में भी ‘पराजय की परिधि’ में है, लिहाजा ‘इंडिया’ गठबंधन के छोटे साथी भी नसीहतों का प्रलाप कर रहे हैं। कांग्रेस को ‘अहंकारी’, ‘एकाधिकारवादी’, ‘स्वार्थी’ आदि तक करार दिया जा रहा है।

उद्धव ठाकरे की शिवसेना, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, हेमंत सोरेन के झामुमो आदि का हरियाणा-कश्मीर में ‘शून्य’ जनाधार है, लेकिन वे गठबंधन-धर्म को नकारने के मद्देनजर कांग्रेस को कोस रहे हैं। लालू यादव के राजद की उपस्थिति भी इन राज्यों में नदारद है, फिर भी वह कांग्रेस को ‘गठबंधन-धर्म’ का पाठ पढ़ा रहे हैं। वह कांग्रेस को गठबंधन राजनीति के प्रति ‘अनुदार’ भी मान रहे हैं। फिर ये सभी दल ‘इंडिया’ के तहत लामबंद क्यों हैं? क्या इस तरह भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है? बेशक हरियाणा चुनाव में ‘आप’ और समाजवादी पार्टी की प्रासंगिकता जरूर थी। कांग्रेस अपनी ऐंठ में रही और गठबंधन की बानगी के तौर पर कुछ सीटें इन दलों को नहीं दी। ‘आप’ को हरियाणा में 1.79 फीसदी वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस मात्र 0.85 फीसदी वोट के अंतर से हारी है। यकीनन कांग्रेस को आत्ममंथन जरूर करना चाहिए, क्योंकि अति आत्मविश्वास भी घातक होता है। कांग्रेस की पराजय का एक बड़ा कारण यह भी है। ‘इंडिया’ शुरू से ही, बुनियादी तौर पर, छिन्न-भिन्न रहा है। कांग्रेस और ‘आप’ में कभी गठबंधन हो जाता है, तो कभी अलग-थलग होकर चुनाव में उतरते हैं और एक-दूसरे को गरियाते हैं। कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस गठबंधन में पीडीपी को शामिल नहीं किया गया, जबकि वह ‘इंडिया’ का घटक दल है। अब उप्र में सपा-कांग्रेस का गठबंधन खटाई में पड़ता दिख रहा है। वहां 10 विधानसभा उपचुनाव होने हैं, लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने, कांग्रेस के परामर्श के बिना ही, 6 सीटों पर सपा उम्मीदवार घोषित भी कर दिए।

अब कांग्रेस क्या करेगी? गठबंधन में दरारें इसी तरह शुरू होती हैं। दरअसल विपक्ष भाजपा को तभी चुनौती दे सकता है, जब दिखावटी तौर पर और भीतर से भी ‘इंडिया’ गठबंधन एकजुट, एकसूत्र में बंधा हो। संभव है कि अब महाराष्ट्र और झारखंड में, सीटों के संदर्भ में, कांग्रेस का मोलभाव कम हो, लेकिन उससे विपक्षी गठबंधन मजबूत थोड़ी होगा। कांग्रेस को अपनी रणनीति में आमूल-चूल बदलाव की जरूरत है। महाराष्ट्र व झारखंड जैसे राज्यों में विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे प्रखरता के साथ उठेंगे। कांग्रेस को युवाओं के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के बेहतर कार्यक्रम के साथ आगे आना होगा। उसे यह भी विश्वास दिलाना होगा कि सत्ता मिलने की स्थिति में दोनों राज्यों में विकास के लिए धन की कमी आड़े नहीं आएगी। विकास के लिए पैसा कहां से आएगा, यह विश्वास मतदाता को दिलाना होगा।

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