स्वास्थ्य
पेट से शुरू होती है हर बीमारी, गट को कमजोरी से बचाने के लिए ऐसे रखें ख्याल

गट हेल्थ यानी मुंह से लेकर पेट, छोटी आंत, बड़ी आंत तक पूरा पाचन तंत्र दुरुस्त नहीं है तो कुछ भी खा लें, शरीर को न्यूट्रिशन नहीं मिलेगा। 35-40 साल की उम्र के बाद दिक्कतें उभरने लगती हैं। प्रीमेनोपॉज के दौर में जहां महिलाओं का वज़न बढ़ने लगता है, पुरुषों के पाचन पर भी असर होता है। इन दिनों गट हेल्थ के लिए या वज़न घटाने के लिए कुछ कंपनियां ऐसी दवाएं बेचने का दावा करती हैं, मानो वे जादू की पुड़िया बेच रही हों। एक खुराक में ही सब दुरुस्त! क्या है इन दावों का सच और गट हेल्थ सुधारने के क्या हैं आसान उपाय?
- गट क्या होता है?
- उम्र बढ़ने पर होने वाली दिक्कतें
- प्रीमेनोपॉज की शुरुआत
- टीनएज में गट हेल्थ
- उम्र का हर पड़ाव चुनौतीपूर्ण होता है। उन चुनौतियों से निपटाना भी ज़रूरी है। बात चाहे 15 साल के टीनएजर की हो या फिर 35-40 बरस पार कर चुकी महिलाओं की या फिर बात किसी भी उम्र में फिट ऐंड हेल्दी रहने की। जरा-सी लापरवाही, स्वाद के पीछे भागने और एक्सरसाइज़ न करने की फितरत ही मुश्किल खड़ी कर देती है। यहां सबसे मुश्किल है अपनी गट हेल्थ को ठीक बनाए रखना। पहले जहां 40 की उम्र के बाद दिक्कतें आती थीं, तो अब टीनएज में ही गलत खानपान की वजह से युवा बीमार हो रहे हैं।
- उम्र के चौथे दशक की ओर बढ़ते ही महिलाओं के लिए यह चुनौती शारीरिक भी होती है और मानसिक भी। दरअसल, यह प्रीमेनोपॉज वाला फेज होता है। शरीर में तेज़ी से हो रहे बदलाव को कुछ महिलाएं समझ ही नहीं पातीं और वज़न बढ़ने से परेशान हो जाती हैं। पुरुषों को भी उम्र के इस पड़ाव पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उनकी भी पाचन शक्ति कमजोर होने लगती है और वज़न बढ़ जाना सबसे आम है। पाचन कमज़ोर होने से शरीर की ज़ज्ब करने की क्षमता घट जाती है। इसलिए गट हेल्थ पर ध्यान देना ज़रूरी है।
- जब हम गट हेल्थ की बात करते हैं तो इसमें मुंह, पेट, छोटी आंत (यह सबसे लंबी होती है) और बड़ी आंत सभी आते हैं। मुंह में खाना पहुंचने के बाद दांतों का काम है चबाना और खाने को टुकड़ों में तोड़ना, लिक्विड तो मुंह में टिकता नहीं, वह सीधे आहार नली से स्टमक में पहुंचता है और फिर आगे निकल जाता है। स्टमक में एसिड और कुछ एंजाइम भोजन को न सिर्फ तोड़ते हैं बल्कि भोजन के साथ आए हुए ज्यादातर हानिकारक जीवाणुओं को मार देते हैं। इसके बाद खाना छोटी आंत में पहुंचता है।
- यहां लिवर से बाइल जूस आकर फैट पर काम करता है। इस समय तक भोजन इस स्थिति में पहुंच जाता है कि उससे पोषक तत्व अवशोषित किए जा सकें। छोटी आंत में ज्यादा मात्रा में पोषक तत्व को अवशोषित होते हैं। वहीं बड़ी आंत में कुछ बचे हुए विटामिनों का अवशोषण होता है और वहां मौजूद बैक्टीरिया की मदद से कुछ विटामिन (B1, B9, B12) आदि बनते हैं। यहीं पर खाना स्टूल के रूप में बदल जाता है और रेक्टम में जमा होता है। इसके बाद शरीर से बाहर निकल जाता है।
- गुड बैक्टीरिया को फर्मेंटेड फूड (दही, छाछ, कांजी, योगर्ट आदि) बहुत पसंद आता है।
- ऐंटिबायोटिक जहां हानिकारक बैक्टीरिया को मारता है, वहीं इसका शिकार गुड बैक्टीरिया भी हो जाता है। इसलिए उन दिनों में पाचन कमज़ोर हो जाता है। उसे दुरुस्त करने के लिए प्रोबायोटिक लेने के लिए कहा जाता है।
- उम्र के साथ आती हैं कैसी चुनौतियां?
- 30-35 साल तक हम (महिला और पुरुष) अमूमन दौड़ते-भागते रहते हैं। सारे हार्मोन, एंजाइम ऐक्टिव रहते हैं। कुछ ज्यादा खा लें या भारी-मसालेवाला भी खा लिया तो भी पचा लेते हैं यानी गट हेल्थ दुरुस्त रहती है।
- लेकिन इस उम्र के बाद ऐक्टिविटी कम होने लगती है। हार्मोन, एंजाइम धीमे पड़ जाते हैं। अगर हमने अपनी डाइट या लाइफस्टाइल को दुरुस्त नहीं किया तो समस्याएं बनने लगती हैं।
- पहले ज्यादा और भारी भोजन करने से ज्यादा कैलरी बनती थी। उसका उपयोग हो जाता था, लेकिन 35 साल के बाद उतनी ही कैलरी को बर्न करना मुश्किल हो जाता है। वह फैट के रूप में जमा होने लगती है।
- वज़न बढ़ने लगता है। यह महिलाओं में ज्यादा होता है क्योंकि 38-40 के बाद प्रीमेनोपॉज वाली स्टेज में आने लगती है। उनमें हार्मोनल बदलाव ज्यादा होने लगते हैं।
- जब वज़न बढ़ने लगे तो इसका सीधा-सा मतलब है कि डाइट सही नहीं है, फिजिकल और मेंटल ऐक्टिविटी भी कम हो रही है, हार्मोनल बदलाव ज्यादा हावी हो रहा है।
- अमूमन महिलाएं इस उम्र तक प्रेग्नेंसी कंसीव कर लेती हैं। इसकी वजह से भी उनकी फिजिकल ऐक्टिविटी कम, डाइट ज्यादा हो जाती है, इससे भी वज़न बढ़ता है।
- इससे गट हेल्थ की क्षमता कम होती जाती है। एंजाइम निकालने की, फैट को तोड़ने की क्षमता धीमी पड़ती है। पेट में गुड फ्लोरा यानी गुड बैक्टीरिया की संख्या भी घट जाती है।
- अगर इस दौरान गट हेल्थ पर ध्यान न दिया जाए तो कई परेशानियां पैदा हो जाती हैं। महिलाओं में पीरियड्स (माहवारी) ठीक से नहीं होती। खून की कमी ज्यादा होने लगती है।
- ऐसे पहचानें प्रीमेनोपॉज की हो गई शुरुआत
- आमतौर पर 38-40 साल की उम्र से महिलाओं में कई बदलाव होने लगते हैं जो उम्र के साथ बढ़ते जाते हैं। इसमें कुछ साल लगते हैं। यहां बताए कुछ या सभी लक्षण उभर सकते हैं:
- इस दौरान एग बनने कम हो जाते हैं यानी महिलाओं के पास मां बनने के मौके कम होने लगते हैं। पीरियड्स बहुत कम या ज्यादा हो जाते हैं।
- अचानक तेज गर्मी महसूस होना: इसे हॉट फ्लैशेज कहते हैं। अचानक गर्मी लगती है और पसीना आता है। यह एड्रिनेलिन हार्मोन के असंतुलित होने और एस्ट्रोजन के बढ़ने से होता है।
- शरीर के ऊपरी भाग में ज्यादा पसीना आना। खासकर, चेहरे, गर्दन, कान, छाती और दूसरे भागों में ज्यादा गर्मी लगना।
- हाथ और पैरों की उंगलियों में झनझनाहट महसूस होना।
- पल्पटेशन (हार्ट बीट अचानक सामान्य 60-80 प्रति मिनट से बढ़कर 100 प्रति मिनट तक) होना।
- पल्पटेशन अगर दिनभर में 2 से 3 बार हो तो सामान्य है। इससे ज्यादा होने पर डॉक्टर से मिलें। डॉक्टर लाइफस्टाइल बदलने के लिए कह सकते हैं या जरूरत पड़ने पर दवा दे सकते हैं।
- जोड़ों में ज्यादा दर्द: इस उम्र में हड्डियों से जुड़ी समस्याएं उभरने लगती हैं।
- क्या टीनएज में भी गट हेल्थ की परेशानी हो सकती है?
- गट हेल्थ की परेशानी हर उम्र की महिलाओं या पुरुषों को हो सकता है। लेकिन टीनएज में पहुंचने वाली लड़कियां फिजिकली काफी ऐक्टिव हो चुकी होती हैं। कई लड़कियां अपने लुक को लेकर ज्यादा जागरूक होती हैं। वे डाइट को लेकर भी साफ राय रखती हैं कि ऐसी चीज़ें कम खाएं जिनसे वज़न बढ़े। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि आजकल भारत में ओबेसिटी यानी मोटापा एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ चुकी है। खासकर उनके लिए जिनकी डाइट में जंक फूड, पैक्ड फूड आदि का बड़ा हिस्सा होता है। टीनएजर्स मोमोज, चाऊमीन, बर्गर, पिज्जा आदि को हर दूसरे दिन खाते हैं।
- इनके अलावा कोल्ड ड्रिंक आदि भी खूब लेते हैं। इन सब की वजह से स्टमक से लेकर छोटी और बड़ी, दोनों आंतों को इन सभी को पचाने और जज्ब करने में बहुत मुश्किल आती है। लिवर, पैनक्रिआस (जहां से इंसुलिन निकलता है) पर बहुत दबाव पड़ता है। भोजन पचाने में मदद करने वाले बैक्टीरिया की संख्या कम होने लगती है। इससे गैस, ब्लोटिंग के साथ वज़न बढ़ जाना बेहद आम है। लड़के हों या लड़कियां, जो टीनएजर ऐक्टिव नहीं होते, उनका वज़न ज्यादा बढ़ता है। वज़न बढ़ने पर लड़कियों में पीरियड्स आदि से जुड़ी परेशानी भी शुरू हो सकती है। जहां तक लड़कों की बात है तो वे आमतौर पर खेलकूद में शामिल होते हैं तो वज़न ठीक रहता है। इसलिए ओबेसिटी की स्थिति ही इसलिए बनती है क्योंकि हम अपने गट हेल्थ को कमज़ोर करते चले जाते हैं।
- पुरुषों की गट हेल्थ पर 40 साल के बाद क्या होता है असर?
- बढ़ती उम्र के साथ पुरुषों की गट हेल्थ पर भी असर होता है। इसलिए उम्र के हिसाब से रहन-सहन और खानपान पर जोर दिया जाता है। पुरुषों में इस उम्र तक बाकी हार्मोन एंजाइम के साथ टेस्टोस्टेरोन हार्मोन की मात्रा कम होने लगती है। इससे मांसपेशियां कमज़ोर होने लगती हैं। सच तो यह है कि मांसपेशियों को ‘दूसरा लिवर’ भी कहते हैं क्योंकि जिस तरह लिवर शरीर में बनने वाले ग्लूकोज़ का उपयोग कर शरीर को चलाने में मदद करता है, उसी तरह मजबूत मांसपेशियां भी मदद करती हैं। ऐसे में जब टेस्टोस्टेरोन हार्मोन कम होने लगता है तो कमज़ोर मांसपेशियां सही तरीके से लिवर की मदद नहीं कर पातीं।
- ग्लूकोज़ शरीर में फैट के रूप में पहले लिवर पर जमा होता है और फिर शरीर के दूसरे हिस्सों में। नतीजा उनका भी वज़न बढ़ने लगता है। पहले फैटी लिवर, फिर कलेस्ट्रॉल बढ़ना, शुगर और बीपी की परेशानी। इसलिए डाइट में करेक्शन ज़रूरी है ताकि गट हेल्थ भी सही रहे। हकीकत यह है कि जब हम वॉक करते हैं, एक्सरसाइज करते हैं, मांसपेशियों को मजबूत करते हैं, फाइबर आदि खाते हैं, जंक फूड नहीं या कम खाते हैं तो ये सभी कवायद एक तरह से गट हेल्थ को दुरुस्त करने के लिए होती है। गट हेल्थ सही होने के बाद ही हम जो भी खाते हैं, शरीर उसका सही पाचन कर, उनमें से पोषक तत्वों को ज़ज्ब कर पाता है। हमारी इम्यूनिटी मजबूत होती है। हम एनर्जेटिक रहते हैं। हम वज़न बढ़ने नहीं देते। हमारे शरीर में एंजाइम और हार्मोन का स्तर भी सामान्य बना रहता है।
- गट हेल्थ को मजबूत करने के ये हैं तरीके
- 1. लाइफस्टाइल को दुरुस्त करके:



