संपादकीय

लोकतंत्र की हत्या का चुनाव


चंडीगढ़
 मेयर चुनाव में धांधलेबाजी पर देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की टिप्पणी सामने आई है कि यह लोकतंत्र के साथ भद्दा मजाक है। यह लोकतंत्र की हत्या है। निर्वाचन अधिकारी पर मुकदमा चलाकर सजा दी जानी चाहिए। यह साफ देखा जा सकता है कि निर्वाचन अधिकारी मतपत्रों को ‘विकृत’ कर रहे हैं। कोई ऐसा कैसे कर सकता है? हम यह देखकर हैरान हैं।’ जस्टिस चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी पराकाष्ठा की है। अलबत्ता वह बेहद संयम के साथ अपनी प्रतिक्रिया देते रहे हैं। इस प्रकरण में सवाल और संदेह तत्कालीन राज्यपाल एवं चंडीगढ़ के प्रशासक बनवारी लाल पुरोहित, पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय और चुनाव आयोग की भूमिकाओं पर भी हैं। पुरोहित ने राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर इस कलंक से बचने का प्रयास किया है। उच्च न्यायालय इस मामले में ‘अंतरिम आदेश’ दे सकता था। उसमें वह असफल रहा। यह टिप्पणी भी प्रधान न्यायाधीश की है। चुनाव आयोग की बुनियादी जिम्मेदारी ही देश भर में निष्पक्ष चुनाव कराने की है। उसकी क्षमताओं और चुनाव प्रबंधन का डंका विश्व भर में बजता रहा है। कई देश हमारे चुनाव आयोग को चुनाव कराने के लिए आमंत्रित भी करते रहे हैं, लेकिन एक मेयर के चुनाव में ऐसी कलंकित धांधलेबाजी सामने आई है। खुद चुनाव आयोग ने त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं की? आखिर सर्वोच्च अदालत तक याचिका देने की नौबत ही क्यों आई? बहरहाल अब मामला सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है, तो संभव है कि चंडीगढ़ नगर निगम के मेयर का चुनाव दोबारा कराया जाए।

प्रधान न्यायाधीश ने उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार के पास मेयर चुनाव से जुड़े तमाम दस्तावेज जमा कराने के आदेश दिए हैं। मतपत्र-वीडियोग्राफी सुरक्षित रखने का आदेश देते हुए कहा है कि चुनाव की पूरी प्रक्रिया का वीडियो पेश किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 12 फरवरी को होगी। गौरतलब है कि चंडीगढ़ नगर निगम में ‘आप’ और कांग्रेस के 20 पार्षद हैं और भाजपा के 16 पार्षद हैं। हमने दो टीवी चैनलों पर उस मौलिक, असंपादित फुटेज का प्रसारण देखा है, जिसमें निर्वाचन अधिकारी अनिल मसीह मतपत्रों पर हस्ताक्षर भी कर रहे हैं, लेकिन कुछ मतपत्रों पर दाहिनी तरफ पेन से कुछ निशान भी बना रहे हैं। उन आठ मतपत्रों को ही बाद में ‘अवैध’ करार दिया गया, नतीजतन भाजपा का मेयर बहुमत न होने के बावजूद ‘विजेता’ घोषित कर दिया गया। ‘आप’-कांग्रेस के 40 फीसदी वोट एकसाथ ही अवैध करार दिए गए, यह अभूतपूर्व, आश्चर्यजनक निर्वाचन रहा। वैसे 2016 में हरियाणा में राज्यसभा चुनाव थे। उसमें विपक्ष के 12 वोट अवैध करार दिए गए, क्योंकि उन पर अलग पेन और स्याही का इस्तेमाल किया गया था। यह लोकतंत्र की बदकिस्मती है कि अब भी ऐसी बेशर्म धांधलियां की जा रही हैं। बहरहाल चैनलों पर दिखाए गए फुटेज में निर्वाचन अधिकारी बार-बार सीसीटीवी कैमरे की ओर देख रहे हैं। अदालत ने भी संशय व्यक्त किया है कि निर्वाचन अधिकारी कैमरे की ओर बार-बार क्यों देख रहे हैं? वह भगोड़े की तरह क्यों भाग रहे हैं? अब उन पर सुप्रीम अदालत की निगाह है। दरअसल चुनाव में यह धांधली एक पूरा षड्यंत्र लगता है, क्योंकि सदन में कुछ ऐसे चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं, जो कैमरे की दिशा बदलने के संकेत कर रहे हैं। कुछ गालियां भी दे रहे हैं। अनिल मसीह चंडीगढ़ भाजपा के एक प्रकोष्ठ में महासचिव रहे हैं। सवाल तो यही है कि उन्हें यह दायित्व क्यों सौंपा गया?

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