संपादकीय

कूड़े-नाले का चुनाव दिल्ली…

उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरह दिल्ली में कूड़े और यमुना नाले को चुनावी मुद्दा बनाया है, प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने भी उतनी शिद्दत से ये मुद्दे नहीं उठाए थे। वे ‘शीशमहल’ तक सीमित रहे अथवा कुछ घोटालों के नाम लिए और ‘आप’ सरकार को ‘आप-दा’ करार दे दिया। ये मुद्दे जनता को उतना नहीं छूते। यमुना तो दिल्ली का सांस्कृतिक पर्याय है। देश की राजधानी दिल्ली में जानलेवा प्रदूषण अब जिंदगी-मौत का सवाल बन गया है। यहां औसत शिशु 20 सिगरेट के धुएं बराबर प्रदूषण में जन्म लेता है और औसत नागरिक की उम्र 10-12 साल घट गई है। आदित्यनाथ ने केजरीवाल और ‘आप’ सरकार पर प्रहार करते हुए कहा कि दिल्ली को ‘कूड़ाघर’ बना दिया गया है। यहां हालात ‘नरक से बदतर’ हैं। सडक़ों पर गहरे गड्ढे हैं या गड्ढों में सडक़ें हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता। पहले दिल्ली अन्य शहरों और राज्यों के लिए ‘आदर्श’ होती थी, लेकिन अब दिल्ली आने में आदमी डरता है। दिल्ली में ‘कूड़ाघर’ ही नहीं, बल्कि ‘कूड़े के पहाड़’ भी हैं, जिनकी बदबू और प्रदूषण दिल्लीवालों को बीमार कर रहे हैं। केजरीवाल आखिर किस दिल्ली पर वोट मांग रहे हैं? ‘आप’ सरकार ने ओखला जैसे औद्योगिक क्षेत्र में उद्योग लगाने के बजाय बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या जैसे दंगाइयों को बसा दिया है। योगी जी के ये आरोप खोखले या फर्जी नहीं हैं। यही दिल्ली का आज का यथार्थ है। आदित्यनाथ ने केजरीवाल और ‘आप’ सरकार के मंत्रियों को चुनौती दी है कि जिस तरह उप्र के मुख्यमंत्री और 54 मंत्रियों ने ‘महाकुंभ’ में जाकर त्रिवेणी संगम में पवित्र स्नान किया है, क्या दिल्ली के मुख्यमंत्री और मंत्री यमुना जी में डुबकी लगा सकते हैं? योगी की चुनौती बेहद गंभीर और असंभव है, क्योंकि दिल्ली में यमुना नदी एक ‘नाले’ में तबदील हो गई है। बेशक योगी भी भाजपा की सियासत खेल रहे थे, लेकिन उनके मुद्दे बिल्कुल सटीक थे। आज यमुना की सतह पर जहरीला, सफेद झाग है, क्योंकि 32 गंदे नाले यमुना में ही गिरते हैं। दिल्ली का 58 फीसदी कचरा यमुना में ही डाला जाता है।

एक साल में 10 गुना रसायन बढ़ चुका है। दिल्ली का अधिकतर अपशिष्ट यमुना में ही जाता है। आज यमुना दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में एक है। ठीक है, दिल्ली में ‘आप’ सरकार ने, 12 साल के कार्यकाल के बावजूद, यमुना नाले की सफाई पर कोई काम नहीं किया। केजरीवाल ने तो पिछले चुनाव में जनता का आह्वान करते हुए भरोसा दिलाया था कि यदि यमुना साफ न हो जाए और उसमें नौका-विहार शुरू न हो जाए, तो आप मुझे वोट मत दीजिए। केजरीवाल आज वोट मांगते दर-ब-दर क्यों घूम रहे हैं? यह भी यथार्थ है कि दिल्ली में भारत सरकार भी है। प्रधानमंत्री मोदी, उनकी कैबिनेट और संसद भी है। उनके पास देश का खजाना है, पर्याप्त कार्य-बल है, नदी से जुड़े असंख्य वैज्ञानिक और इंजीनियर भी हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘नमामि गंगे’ परियोजना पर करीब 20,000 करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं। क्या यमुना नदी उनके लिए पवित्र, ऐतिहासिक और मां-तुल्य नहीं थी? गंगा मैया ने तो बुलाया था, लेकिन दिल्ली में तो यमुना साक्षात है। केंद्र और अद्र्धराज्य दिल्ली की सरकारों ने यमुना की सफाई पर करीब 8000 करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं। फिर भी सफाई की जगह नाला क्यों उभर आया है? यह जवाबदेही दोनों सरकारों की है। अकेले केजरीवाल ‘खलनायक’ नहीं हैं। गंगा-यमुना के नाम पर राजनीति 1980 के दशक से खेली जा रही है। सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा-यमुना एक्शन प्लान बनवाए थे। उसके बाद बार-बार इन पवित्र नदियों की सफाई की घोषणाएं की जाती रहीं और बजट तय किए जाते रहे, लेकिन आज भी दोनों नदियां मैली हैं। गनीमत है कि गंगा नाला नहीं बन सकी।

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