युद्ध की आर्थिक लहर

भारत ईरान से सबसे अधिक मात्रा में कच्चा तेल और गैस आयात करता है। दुनिया के जिन देशों में तेल और गैस की आपूर्ति की जाती है, करीब 20 फीसदी आपूर्ति ईरान ही करता है। यदि कच्चे तेल की कीमत 1 डॉलर प्रति बैरल बढ़ती है, तो भारत का आयात बिल 14,000 करोड़ रुपए बढ़ जाता है। इजरायल-ईरान युद्ध भडक़ने से तेल की कीमतें करीब 7 फीसदी बढ़ चुकी हैं। निवेशक और तेल कंपनियां चिंतित हैं कि यह युद्ध कब तक चलेगा? समग्र तौर पर देखें, तो बीते कुछ सप्ताह के दौरान कच्चा तेल औसतन 10 डॉलर महंगा हुआ है। इसमें अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप की ‘टैरिफ नीति’ का भी योगदान है। अमरीका अपने व्यापारिक साझेदारों को भी नहीं छोड़ता। बहरहाल तेल महंगा होता जाता है, तो कमोबेश भारत की जीडीपी पर 1.5 फीसदी तक का प्रभाव पड़ सकता है। अभी जो मुद्रास्फीति नियंत्रण में लग रही है, वह भी निश्चित रूप से बढ़ेगी। रुपया और भी कमजोर होगा। योजनाओं के लिए चुनौतियां पैदा हो सकती हैं। होर्मुज के बंद होने से अतिरिक्त वक्त के साथ-साथ खर्च भी बढ़ेगा, लिहाजा युद्ध किसी भी देश के लिए फायदेमंद स्थिति नहीं है। ईरान और ओमान के बीच एक संकरा-सा जलमार्ग है-होर्मुज जलडमरूमध्य। भारत करीब दो-तिहाई कच्चा तेल और करीब 50 फीसदी प्राकृतिक गैस इसी रास्ते से आयात करता है। भारत अपनी 80 फीसदी से अधिक ऊर्जा-जरूरतों के लिए आयात पर ही निर्भर है, लिहाजा यहां कोई भी व्यवधान तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और बीमा बढऩे का कारण बनेगा। भारत का पश्चिमी देशों को करीब 30 फीसदी निर्यात इसी रास्ते से किया जाता है। भारत का ईरान के साथ कारोबार 14,246 करोड़ रुपए और इजरायल के साथ 27,608 करोड़ रुपए का है। 2024-25 में भारत ने ईरान को 1.24 अरब डॉलर का माल निर्यात किया था और 44.19 करोड़ रुपए का आयात किया। इजरायल को 2.15 अरब डॉलर का निर्यात और 1.61 अरब डॉलर का आयात किया। ईरान इस जलमार्ग को बंद करने की धमकी पहले भी दे चुका है और अब तो युद्ध के हालात हैं।
होर्मुज से ही दुनिया के तेल-परिवहन का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ईरान 33 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चे तेल का उत्पादन करता है। एक फ्रेंच बैंक के मुताबिक, ईरान का तेल-निर्यात गिर कर 16 लाख बैरल प्रतिदिन हो गया है। उसकी उत्पादन क्षमता से बिल्कुल आधा उसका निर्यात हो गया है। यदि बाजार से यह सप्लाई भी हटा ली जाए अथवा युद्ध के कारण ऐसा करना पड़े, तो ओपेक अपने उत्पादन में कोई कटौती किए बिना ही 22 लाख बैरल रोजाना की क्षतिपूर्ति कर सकता है। मौजूदा हालात में विशेषज्ञों के आकलन हैं कि तेल की कीमतें 100 डॉलर से 120 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ सकती हैं। यह किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक मजबूत लहर की स्थिति होगी। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने अपनी हालिया रपटों में खुलासा किया है कि वैश्विक तेल की मांग घट सकती है, क्योंकि युद्ध के तनाव देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर नकारात्मक असर डालेंगे। बहरहाल बुनियादी चिंताएं और सरोकार होर्मुज को बंद करने के मद्देनजर हैं। अमरीकी निवेशक संस्थानों के आकलन हैं कि इस रास्ते को बंद किया गया, तो भी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक उछल सकती हैं। इन कीमतों का स्थानीय पेट्रोल पंपों पर कितना असर पड़ेगा, यह सरकार के फैसले पर है, क्योंकि कच्चा तेल सस्ता हुआ था, तो स्थानीय ग्राहकों को रियायत नहीं दी गई थी। आज भी पेट्रोल-डीजल के दाम 100 रुपए प्रति लीटर के करीब हैं। बहरहाल ईरान और इजरायल दोनों देशों के साथ भारत के महत्वपूर्ण संबंध हैं। यह आर्थिक लहर वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।



