लेख

डा. बाबा साहेब अंबेडकर : एक मानवीय दर्शन

हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को संपत्ति, विवाह, तलाक और गोद लेने के समान अधिकार दिलाने का प्रयास किया। 1948 में कानून मंत्री के रूप में उन्होंने इसे संसद में पेश किया, लेकिन रूढि़वादी विरोध के कारण 1951 में बिल अटक गया। इससे आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया…

भीमराव रामजी अंबेडकर का जीवन केवल एक व्यक्ति की जीवनी नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, अथक संघर्ष और बौद्धिक चेतना का जीवंत दस्तावेज है। उनका जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में एक महार परिवार में हुआ था, जो उस समय ‘अछूत’ माने जाते थे। वे अपने माता-पिता के चौदहवें संतान थे। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल भारतीय सेना में सूबेदार थे, जिसके कारण उन्हें कुछ शिक्षा का अवसर मिला, लेकिन समाज की कट्टर जातिवादी व्यवस्था ने उनके बचपन को यातनाओं से भर दिया। स्कूल में वे पानी का नल नहीं छू सकते थे, कोई ‘छूत’ वाला व्यक्ति उनके लिए नल खोलता, तब जाकर वे पानी पी पाते। फिर भी उन्होंने इन परिस्थितियों को अपनी नियति नहीं माना। ज्ञान, तर्क और आत्मबल के माध्यम से उन्होंने इन विभाजनों को चुनौती दी। यही कारण है कि उनका जीवन व्यक्तिगत सफलता से आगे बढक़र सामूहिक मुक्ति का प्रतीक बन गया। अंबेडकर की प्रारंभिक शिक्षा मुंबई के एलफिंस्टन हाई स्कूल में हुई, जहां वे अपने समुदाय में हाई स्कूल पास करने वाले पहले छात्र थे। इसके बाद एलफिंस्टन कॉलेज से अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में स्नातक किया।

बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय की छात्रवृत्ति से 1913 में वे मात्र 22 वर्ष की आयु में कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क पहुंचे। वहां उन्होंने जॉन ड्यूई जैसे विचारकों से प्रभावित होकर लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और आर्थिक संरचना का गहरा अध्ययन किया। 1915 में उन्होंने अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री प्राप्त की। उनकी थीसिस ‘प्राचीन भारतीय वाणिज्य’ और ‘भारत का राष्ट्रीय लाभ’ थीं। बाद में 1927 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने उन्हें पीएचडी प्रदान की। इसके साथ ही उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भी अध्ययन किया, जहां 1921 में एमएससी और 1923 में डीएससी की उपाधि प्राप्त की। उनकी थीसिस ‘ब्रिटिश भारत में प्रांतीय वित्त का विकास’ ने भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ग्रेज इन से बैरिस्टर की डिग्री भी ली। इस बौद्धिक यात्रा ने उन्हें विश्व के प्रमुख विचारकों की श्रेणी में स्थापित किया। उनके चिंतन में पश्चिमी उदारवाद, बौद्ध नैतिकता और भारतीय सामाजिक यथार्थ का अद्वितीय समन्वय दिखाई देता है। अंबेडकर की कृतियां आज भी शोध और विमर्श का केंद्र हैं। ‘जाति का उन्मूलन’ (1936) में उन्होंने जाति व्यवस्था की गहरी आलोचना की, उसे सामाजिक प्रगति की सबसे बड़ी बाधा बताया। यह मूलत: जाट-पट तोडक़ मंडल के लिए लिखा गया भाषण था, जिसे आयोजकों ने ‘असहनीय’ मानकर रद्द कर दिया। अंबेडकर ने स्वयं 1500 प्रतियां छपवाईं। ‘रुपए की समस्या’ में उन्होंने भारतीय मुद्रा और अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को वैज्ञानिक दृष्टि से समझाया, जो रिजर्व बैंक की नींव रखने वाली थी। ‘बुद्ध और उनका धम्म’ में उन्होंने नैतिकता, समानता और करुणा पर आधारित जीवन दृष्टि प्रस्तुत की। अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं- भारत में जातियां, शूद्र कौन थे, अछूत कौन थे, राज्य और अल्पसंख्यक आदि। इनमें एक बात स्पष्ट है- उनका हर विचार शोध, तर्क और प्रमाण पर आधारित था। वे भावनात्मक अपील से अधिक बौद्धिक ईमानदारी को महत्व देते थे। उनका राजनीतिक संघर्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं। 1924 में उन्होंने बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की, जो अछूतों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अधिकारों की लड़ाई लड़ती थी। 1927 में महाड़ सत्याग्रह का नेतृत्व किया, जहां अछूतों को सार्वजनिक जल स्रोत का अधिकार दिलाया।

नासिक के कालाराम मंदिर सत्याग्रह ने मंदिर प्रवेश का मुद्दा उठाया। 1930-32 के गोलमेज सम्मेलनों में उन्होंने दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की, जिसके विरोध में महात्मा गांधी के अनशन के बाद 1932 में पूना पैक्ट हुआ। इसमें अलग निर्वाचन क्षेत्र छोडक़र संयुक्त निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षण की व्यवस्था हुई। उन्होंने स्वतंत्र मजदूर पार्टी और अनुसूचित जाति संघ की स्थापना की। ये संघर्ष उनकी मानवीय दृष्टि को दर्शाते हैं- वे केवल जाति प्रश्न तक सीमित नहीं, बल्कि समग्र सामाजिक न्याय के पक्षधर थे। भारतीय संविधान के निर्माण में उनका योगदान उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। वे संविधान सभा की मसौदा समिति के अध्यक्ष थे। उन्होंने संविधान को केवल कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम माना। समानता (अनुच्छेद 14), स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को स्थापित किया। अस्पृश्यता का उन्मूलन (अनुच्छेद 17) मौलिक अधिकार, आरक्षण की व्यवस्था और लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी। उनका विश्वास था कि राष्ट्र की शक्ति उसके संविधान में नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाली संवैधानिक नैतिकता में होती है। आज जब लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट आता है, तो अंबेडकर का यह दृष्टिकोण और प्रासंगिक हो उठता है। अंबेडकर का चिंतन महिलाओं की स्थिति पर भी केंद्रित था। उन्होंने समाज के विकास का महत्वपूर्ण संकेतक महिलाओं की प्रगति को माना।

हिंदू कोड बिल के माध्यम से उन्होंने महिलाओं को संपत्ति, विवाह, तलाक और गोद लेने के समान अधिकार दिलाने का प्रयास किया। 1948 में कानून मंत्री के रूप में उन्होंने इसे संसद में पेश किया, लेकिन रूढि़वादी विरोध के कारण 1951 में बिल अटक गया। इससे आहत होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका कथन था- ‘समाज की प्रगति को मैं महिलाओं की प्रगति से मापता हूं।’ यह क्रांतिकारी कदम था, जो पारंपरिक ढांचे को चुनौती देता था। आज नारी सशक्तिकरण की चर्चा में उनका योगदान अमूल्य है। अंबेडकर और हिंदुत्व के संबंध को समझने के लिए उनके मूल विचारों को देखना जरूरी है। उन्होंने किसी भी धर्म या परंपरा को केवल आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के मानकों पर परखा। हिंदू धर्म में जाति और असमानता की आलोचना की, लेकिन यह किसी धर्म विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि अन्यायपूर्ण संरचनाओं के विरुद्ध थी। उनका दृष्टिकोण सुधारवादी और मानवीय था।-सिकंदर बंसल

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button