संपादकीय

‘एक अंग दान दे सकता है कइयों को नई जिंदगी’ ‘जरूरत…’

कई बार किसी दुर्घटना में व्यक्ति के ‘ब्रेन डैड’ हो जाने पर उसका बचना कठिन होता है। तब ऐसे लोगों के परिजनों द्वारा दान किए उसके अंग मृत्यु किनारे पड़े अन्य रोगियों का जीवन बचा सकते हैं। ‘ब्रेन डैड’ होने पर मस्तिष्क की सभी गतिविधियां स्थायी रूप से बंद हो जाती हैं। सांस लेने और दिल की धड़कन जैसी शरीर की बुनियादी क्रियाओं को नियंत्रित करने वाला ‘ब्रेन स्टैम’ भी काम करना बंद कर देता है तथा शरीर कोई प्रतिक्रिया नहीं करता। ऐसे में अंगदान किया जा सकता है।

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 2,00,000 रोगियों में किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता के मुकाबले केवल 6000 किडनी ही प्रत्यारोपित हो पाती हैं। हृदय तथा अन्य अंगों के प्रत्यारोपण की दर तो और भी कम है। ‘हृदय वाल्व’ के दान से क्षतिग्रस्त हृदय वाल्व वालों का जीवन भी बचाया जा सकता है। इसी कारण समाज के जागरूक लोग ब्रेन डैड अथवा दुर्घटना के शिकार अपने मृत परिजनों के अंग दान करके मृत्यु शैया पर पड़े दूसरे लोगों को जीवनदान दे रहे हैं, जिसके चंद ताजा उदाहरण निम्न में दर्ज हैं :

* 26 सितम्बर, 2024 को मेहसाणा (गुजरात) में डाक्टरों द्वारा ‘ब्रेन डैड’ घोषित ‘रंजनबेन’ नामक महिला के पति ने उनका दिल, लिवर और 2 किडनियां विभिन्न अस्पतालों को दान कर दीं जिनसे 4 जरूरतमंदों को जीवन दान मिला। 
* 29 सितम्बर को सूरत में एक परिवार ने अपनी 6 वर्षीय बच्ची के ‘ब्रेन डैड’ होने के बाद उसका लिवर, दोनों किडनियां और दोनों आंखें दान करने का फैसला किया जिससे 4 जरूरतमंद रोगियों को लाभ पहुंचा। 
* 29 अक्तूबर को पी.जी.आई. चंडीगढ़ में उपचाराधीन केन्या के 2 वर्षीय ‘ब्रेन डैड’ बालक ‘लुंडा कयुम्बा’ के अग्नायाश्य (पैंक्रियास), किडनी तथा उसकी आंखों की कॉॢनया के दान से 4 जरूरतमंदों को नया जीवन मिला।
* 13 दिसम्बर को लुधियाना के डी.एम.सी. में एक ‘ब्रेन डैड’ रोगिणी के परिजनों द्वारा दान की गई किडनी का एक जरूरतमंद रोगी के शरीर में ‘अईकाई अस्पताल’ के डाक्टर बी.एस. औलख ने प्रत्यारोपण किया।

* 18 दिसम्बर को पुणे में एक सड़क दुर्घटना के कारण ‘ब्रेन डैड’ हुई जैसलमेर के ‘खेतोलाई’ गांव की ट्रेनी पायलट ‘चेष्टïा बिश्नोई’ के परिवार ने उसके सभी अंग दान कर दिए जिनसे 8 जरूरतमंदों को नई जिंदगी मिली।
* 31 दिसम्बर को इंदौर में एक ‘ब्रेन डैड’ व्यक्ति ‘सुरेंद्र पोरवाल’ के परिजनों द्वारा दान किए गए लिवर तथा दोनों हाथ एक विशेष विमान द्वारा मुम्बई भेजे गए। इनमें से लिवर एक रोगी को तथा दोनों हाथ एक अन्य युवक के शरीर में लगाए गए जिसके दोनों हाथों ने बिजली का झटका लगने के कारण कुछ वर्ष पूर्व काम करना बंद कर दिया था।
यही नहीं, सुरेंद्र पोरवाल की दोनों किडनियां इंदौर के अस्पताल में 2 जरूरतमंदों को लगाई गईं। उनके परिजनों ने उनकी त्वचा और आंखें भी दान कर दी हैं। सुरेंद्र पोरवाल के सब अंग निकालने के बाद लाल कालीन बिछाकर एम्बुलैंस में रख कर उनके पार्थिव शरीर को विदाई दी गई। 

* 31 दिसम्बर, 2024  को ही जयपुर के एस.एम.एस. अस्पताल में ‘नीमकाथाना’ निवासी एक ‘ब्रेन डैड’ रोगी के दिल और किडनी को एस.एम.एस. अस्पताल में ही 2 जरूरतमंद रोगियों के शरीर में प्रत्यारोपित करके उन्हें नई जिंदगी दी गई जबकि उसका लिवर ‘ग्रीन कोरिडोर’ के जरिए जोधपुर ‘एम्स’ में भेजा गया। 
* और अब 1 जनवरी, 2025 को जूनागढ़ (गुजरात) में डाक्टरों द्वारा ब्रेन डैड घोषित ‘शीलाबेन झंझारिया’ के परिवार द्वारा उनके फेफड़े, दिल, किडनी, आंखें और लिवर जैसे अंग दान करने की घोषणा करने के बाद उन्हें ‘ग्रीन कोरिडोर बना कर जूनागढ़ से अहमदाबाद के अलग-अलग अस्पतालों को भेजा गया। अंगदान एक नेक कार्य है परंतु जागरूकता की कमी के कारण लोगों के मन में अंगदान के बारे में कई निरर्थक भ्रांतियां और भय हैं। उल्लेखनीय है कि ब्रेन डैड रोगी का आमतौर पर अंतिम संस्कार कर बचे अवशेषों का जल विसर्जन कर दिया जाता है और इस प्रकार आंखें, दिल, लिवर, किडनी आदि वे अंग भी नष्ट हो जाते हैं जिनसे किसी जरूरतमंद को नया जीवन मिल सकता है। अत: यदि ब्रेन डैड रोगी के परिजन उसके अंग अन्य जरूरतमंदों को दान कर दें तो जहां अंग ग्रहण करने वाला व्यक्ति उन्हें शुक्रगुजारी की भावना से देखेगा वहीं अंग दान करने वालों को भी अंग ग्रहण करने वालों में अपने मृत परिजनों की छवि देखने से आत्म संतुष्टिï मिलेगी। अत: लोगों को ब्रेन डैड व्यक्ति या मृत्यु होने पर इस्तेमाल योग्य अंगों का दान कर देना चाहिए।

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