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बंगाल का समानांतर सेंसर बोर्ड, क्या बंगाल फाइल्स के विरोधी यह चाहते हैं कि फिल्म उनकी कथा-पटकथा के हिसाब से बनती?

बंगाल फाइल्स पर आपत्ति अकेले तृणमूल कांग्रेस को ही नहीं अन्य अनेक लोगों और खासकर सेक्युलर-लिबरल किस्म के लोगों को भी है। क्या वे यह चाहते थे कि बंगाल फाइल्स उनके हिसाब से बनाई जाती? पता नहीं वे क्या चाहते हैं लेकिन उनके पास बंगाल फाइल्स न देखने की भी सुविधा है और उसे खराब फिल्म बताने की भी।

 एक और ऐसी फिल्म चर्चा में है, जिसे लेकर विवाद है। विवाद का कारण फिल्म की विषयवस्तु है। फिल्म बंगाल फाइल्स इस कारण विवादों में है, क्योंकि वह जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे के आह्वान के बाद कलकत्ता की भयानक मारकाट (इसे ग्रेट कोलकाता किलिंग भी कहते हैं) के इर्द-गिर्द घूमती है।

इस फिल्म में अगस्त 1946 की कलकत्ता और नोआखाली की भयावह हिंसा के साथ ही उस समय की राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों को भी दिखाया गया है। यह वह कालखंड था, जब भारत आजादी के साथ बंटवारे की ओर भी बढ़ रहा था। 1946 में जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर अड़े थे और कांग्रेस नेता बंटवारे से बचने में। इसी समय ब्रिटिश सरकार ने कैबिनेट मिशन भेजा था।

कैबिनेट मिशन ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए जो प्रस्ताव तैयार किया, उससे जिन्ना आगबबूला हो उठे। उन्होंने डायरेक्ट एक्शन डे का एलान कर दिया। यह हिंसा की खुली धमकी थी। इस धमकी को अंजाम देने की शुरुआत कलकत्ता से हुई। इसका प्रमुखता से चित्रण बंगाल फाइल्स में है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं किया गया। कोलकाता हिंसा पर कई किताबें भी लिखी जा चुकी हैं। लाइफ पत्रिका ने ‘कलकत्ता के गिद्ध’ शीर्षक वाले 9 सितंबर, 1946 के अंक में कलकत्ता हिंसा की रोंगटे खड़े करने वाली तस्वीरें छापी थीं। इनमें लाशों के ढेर के सामने एक मुंडेर पर बैठे गिद्ध भी दिखते हैं।

कुछ वर्ष पहले मार्च 2014 में दस-भागों वाले टीवी सीरियल ‘संविधान’ को राज्यसभा टीवी पर दिखाया गया था। इस डाक्यूड्रामा के निर्माण में तत्कालीन उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का योगदान था। इसका निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया था। ‘संविधान’ के पहले ही भाग में कोलकाता और नोआखाली की हिंसा का संक्षिप्त चित्रण है। यह इसीलिए किया गया, क्योंकि जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे से उपजी हिंसा के साये में ही संविधान निर्माण का कार्य आगे बढ़ा।

सीरियल में अंतरिम सरकार के गठन के विरोध में जिन्ना को ऐसा उकसावे वाला भाषण देते हुए दिखाया गया है, ‘अब हमने भी अपना हथियार तैयार कर लिया है और हम इसका इस्तेमाल भी करना जानते हैं। आज मैं हिंदुस्तान के सारे मुसलमानों से डायरेक्ट एक्शन की अपील करता हूं। आने वाले जुमे, 16 अगस्त से हम आर-पार की सीधी लड़ाई लडेंगे और हथियार तभी रखेंगे, जब मंजिले मकसूद सामने दिखाई देगी यानी हमारा प्यारा पाकिस्तान।.. मैं यहां उसूल-इखलाक की बात नहीं करुंगा। आप सभी लोग जानते हैं कि मुझे गांधी की अहिंसा-वहिंसा में कोई यकीन नहीं है।….’

जिन्ना के भाषण के बाद स्क्रीन पर प्रकट होती हैं सीरियल की एंकर स्वरा भास्कर। वे बताती हैं, ‘कैबिनेट मिशन वापस लौट गया और हिंसा के बादल चारों ओर मंडराने लगे। वायसराय वेवेल ने सारे गवर्नरों को बुलाकर पुलिस व्यवस्था को चाक-चौबंद करने को कहा, पर बंगाल के गवर्नर ने वेवेल को खबर दी कि बंगाल के मुस्लिम लीगी प्रधानमंत्री एचएस सुहरावर्दी के कहने पर उन्होंने 16 अगस्त से सारे पुलिस महकमे को छुट्टी पर भेज दिया है। 16 अगस्त, 1946 भारत के इतिहास के काले दिनों में शामिल होने जा रहा था।

जिन्ना साहब की पुकार पर 16 अगस्त की सुबह हथियारबंद लोग सड़कों पर उतर आए और हत्याओं का सिलसिला शुरू हो गया।..’ क्या यह बताने की जरूरत है कि जिन्ना की पुकार पर हत्याओं का सिलसिला किसने शुरू किया होगा? नहीं न! इसके बाद स्वरा भास्कर की आवाज के साथ कलकत्ता हिंसा के कुछ दृश्य स्क्रीन पर उभरते हैं। आगे नोआखाली की भीषण हिंसा और वहां गांधीजी के जाने के दृश्य हैं।

फिल्म बंगाल फाइल्स में विवेक रंजन अग्निहोत्री ने कलकत्ता हिंसा का चित्रण अपनी तरह से किया है। यदि उन्होंने कुछ गलत किया होता तो फिल्म सेंसर बोर्ड में अटकती या फिर किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी होती। अदालत का दरवाजा खटखटाने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ, फिर भी पश्चिम बंगाल में इस फिल्म की रिलीज पर अघोषित पाबंदी है। यह इसलिए है, क्योंकि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को फिल्म रास नहीं आई। वह फिल्म पर पाबंदी नही लगा सकती थी, इसलिए उसने अघोषित प्रतिबंध का रास्ता चुना।

उसकी ओर से मल्टीप्लेक्स वालों को धमकाया गया कि यदि उन्होंने बंगाल फाइल्स दिखाई तो उनकी खैर नहीं। उन्होंने अपनी खैर मनाई। बंगाल में बंगाल फाइल्स पर अघोषित पाबंदी यही बताती है कि राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने अपना समानांतर सेंसर बोर्ड कायम कर लिया है। तृणमूल कांग्रेस उन दलों में शामिल है, जिसे संविधान खतरे में दिखाई दे रहा है, लेकिन वह करणी सेना की तरह व्यवहार कर रही है।

बंगाल फाइल्स पर आपत्ति अकेले तृणमूल कांग्रेस को ही नहीं, अन्य अनेक लोगों और खासकर सेक्युलर-लिबरल किस्म के लोगों को भी है। क्या वे यह चाहते थे कि बंगाल फाइल्स उनके हिसाब से बनाई जाती? पता नहीं वे क्या चाहते हैं, लेकिन उनके पास बंगाल फाइल्स न देखने की भी सुविधा है और उसे खराब फिल्म बताने की भी।-राजीव सचान

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