राष्ट्रीय

क्या बीजेपी के पास है हिंदुत्व की कोई नई परिभाषा?

2024 के चुनाव के बाद राजनीतिक पंडितों के एक विशेष वर्ग ने यह कहना शुरू किया था कि BJP का पूर्ण बहुमत न ला पाना दरअसल हिंदुत्व की हार है। माना जा रहा था कि गठबंधन की नई सरकार हिंदुत्व के अजेंडा से विमुख हो जाएगी और शायद अटल बिहारी वाजपेयी सरकार जैसी स्थिति फिर बन जाए। लेकिन पिछले कुछ दिनों में हिंदुत्व की राजनीति ने एक नई करवट ली है। हिंदुत्व न सिर्फ एक राजनीतिक शक्ति के रूप में पुनः स्थापित हुआ है बल्कि उसकी सक्रियता और अधिक रेडिकल हो गई है।

बौद्धिक अस्पष्टता
हिंदुत्व की इस सफलता को ऐसे देखा जा रहा है जैसे BJP और संघ परिवार के अन्य घटकों के बीच कोई मतभेद नहीं है। हमें बताया जा रहा है कि हिंदुत्व अपने आप में एक ऐसी वैचारिक शक्ति है, जिसके आधार पर न केवल भारतीय समाज को पुनर्परिभाषित किया जा सकता है, बल्कि इसका चुनावी फायदा भी उठाया जा सकता है। यह स्पष्टीकरण कई मायनों में खोखला है। हाल के महीनों में हिंदुत्व की राजनीति के कुछ अंतर्विरोध उभर कर सामने आए हैं। साफ है कि हिंदुत्व को लेकर संघ परिवार के भीतर एक बौद्धिक अस्पष्टता अभी भी बनी हुई है। यह बौद्धिक अस्पष्टता न केवल राजनीतिक है, बल्कि इसके कई वैचारिक पहलू भी हैं। इसे समझने के लिए पहले हमें देखना होगा कि संघ परिवार की रूपरेखा क्या है।

अपरिभाषित सोच
आमतौर पर माना जाता है कि संघ परिवार के घटकों को आपस मे जोड़ने वाला वैचारिक धागा हिंदुत्व है। ध्यान से देखें तो हिंदुत्व के इस व्यापक अर्थ को कभी भी पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। हिंदुत्व शब्द की पहली राजनीतिक परिभाषा हिंदू महासभा और वी डी सावरकर से जुड़ी हुई है, जिसके आधार पर हिंदू राष्ट्रवाद का विचार दिया गया था। RSS के वैचारिक विमर्श में हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल काफी समय बाद शुरू हुआ। एम. एस. गोलवलकर की मशहूर किताब ‘बंच ऑफ थॉट’ में हिंदुत्व शब्द के प्रति एक आक्षेप भी नजर आता है। लेकिन 1980 के बाद से संघ परिवार के विभिन्न घटकों ने हिंदुत्व शब्द को न केवल स्वीकार किया, बल्कि उसकी परिभाषा में अपनी राजनीति को बांधने की एक सक्रिय शुरुआत भी की। हिंदुत्व की इस स्वीकार्यता ने 2014 के बाद कई नए सवालों को जन्म दिया। अब यह जरूरी हो गया कि हिंदुत्व को राज्य तंत्र या गवर्नेंस के अर्थों मे परिभाषित किया जाए। 2018 में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में तीन लेक्चर दिए, जिनमें उन्होंने यह बताया कि वर्तमान का हिंदुत्व क्या है।

वैचारिक पिछड़ापन
दिलचस्प बात यह है कि BJP के वैचारिक क्रिया-कलापों में हिंदुत्व अभी भी अपरिभाषित है। BJP का पार्टी संविधान ‘हिंदुत्व’ को अपनी विचारधारा के रूप मे इंगित नहीं करता। BJP के बड़े नेता भी ‘हिंदुत्व’ शब्द के वैचारिक अर्थों का खुलासा करने से बचते हैं। दूसरी तरफ हिंदुत्व के नाम पर हर रोज नए संगठन बन रहे हैं। इनके लिए हिंदुत्व की परिभाषा के कोई मायने नहीं हैं। इस वैचारिक खोखलेपन का सबसे दिलचस्प उदाहरण प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट के तहत दर्ज होने वाले नए मामले हैं, जिनमें संभल और अजमेर का मामला प्रमुख है।

आपसी खींचतान
एक ओर RSS, खासतौर से मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि उनकी हिंदुत्व की परिभाषा के मुताबिक इस तरह के मुद्दे का कोई औचित्य नहीं है। 2018 के अपने लेक्चर्स में मोहन भागवत ने हिंदुत्व की अवधारणा को एक समन्वयकारी वैचारिक परिपेक्ष्य परिभाषित करने की कोशिश की थी। हर पुरानी मस्जिद के नीचे मंदिर खोजने वाली आज की जद्दोजहद RSS के इस हिंदुत्व के साथ मेल नहीं खाती। वहीं ऐसे हिंदुत्ववादी संगठन भी हैं, जो मोहन भागवत की बात को ठुकरा रहे हैं। उनका मानना है कि RSS को अब अपने आप को केवल एक सांस्कृतिक संगठन के रूप में परिभाषित करना चाहिए। इन घटकों के अनुसार मंदिर-मस्जिद के मसलों में RSS को हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है।

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