किसानों की नाराजगी, बेरोजगारी का विस चुनाव

हरियाणाके मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने हाल ही में कुरुक्षेत्र में रैली को संबोधित किया था, जिसमें एमएसपी को लेकर गारंटी दी गई थी कि सरकार एमएसपी पर ही फसलें खरीदेगी। संयुक्त किसान मोर्चा ने उस गारंटी को खारिज कर दिया। किसान राष्ट्रीय स्तर पर एमएसपी की कानूनी गारंटी मांग रहे हैं, लिहाजा केंद्रीय मंत्रियों से ही बातचीत होती रही है। केंद्र सरकार ने ही एक कमेटी बनाई थी, जिसके फैसले अभी सार्वजनिक किए जाने हैं।
हरियाणा में किसान और बेरोजगारी निर्णायक चुनावी मुद्दे साबित हो सकते हैं। संयुक्त किसान मोर्चा की हरियाणा ईकाई ने न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी, केंद्रीय कृषि मूल्य आयोग, जो एमएसपी तय करता है, किसान आंदोलन के दौरान मारे गए 736 किसानों के स्मारक की मांग और अन्य जुड़े मामलों पर विमर्श करना तय किया है। ये कोई मान्यता प्राप्त किसान संगठन नहीं हैं। केंद्र और राज्य सरकार अपने स्तर पर एमएसपी को लेकर लगातार विमर्श करती रही हैं। यह दीगर है कि फिलहाल कोई भी निष्कर्ष सामने नहीं है। अब किसानों के विमर्श का निष्कर्ष कुछ भी रहे, लेकिन यह हरियाणा के विधानसभा चुनाव की दशा-दिशा तय कर सकता है। हरियाणा की फसलों की खरीद सीमित है तथा हरियाणा के किसानों को ही प्राथमिकता दी जाएगी। किसान मोर्चा ने मुख्यमंत्री की गारंटी को ‘चुनावी स्टंट’ करार दिया है। किसानों का दावा है कि मुख्यमंत्री सैनी के घोषित नए एमएसपी से उन्हें 3851 करोड़ रुपए का नुकसान होगा। नुकसान का यह आंकड़ा किस आधार पर तय किया गया है, यह स्पष्ट नहीं है। हालांकि किसान आंदोलन में हरियाणा अपेक्षाकृत सक्रिय नहीं था और न ही आंदोलन के बाद किसान नेताओं को कोई राजनीतिक सफलता मिली। पंजाब और हरियाणा में जिन किसान नेताओं ने चुनाव लड़े, वे पराजित हुए और जमानतें भी जब्त हुईं।
हरियाणा में सबसे अधिक करीब 24 फीसदी आबादी जाटों की है। वे ही अधिकतर किसानी से जुड़े हैं। उनका समर्थन भाजपा, कांग्रेस, इंनेलो, जेजेपी आदि दलों के लिए विभाजित है। सत्ता-विरोधी लहर होने के बावजूद भाजपा 5 लोकसभा सीटों पर जीती और 5 सीटें कांग्रेस के हिस्से आईं। अब भी यही सीधा मुकाबला रहना है, क्योंकि अन्य दल बहुत कमजोर हो चुके हैं अथवा टूट-फूट कर बिखर चुके हैं। फिर भी यह चुनाव आसान नहीं होगा। हरियाणा में भाजपा सरकार और पार्टी के खिलाफ जबरदस्त लहर है। यह लहर पार्टी के भीतर भी महसूस की जा सकती है। भाजपा नेतृत्व ने लोकसभा चुनाव से पूर्व ही इसे पढ़ लिया था, लिहाजा तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को हटा कर नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया गया। वह 12 मार्च, 2024 से मुख्यमंत्री हैं। नायब सैनी ने ‘नॉन स्टॉप’ बैनर से अपनी सरकार का अभियान शुरू किया। अखबारों में पूरे पृष्ठ के विज्ञापन छपवाए गए और दावे किए गए कि हरियाणा हर क्षेत्र में अब ‘नॉन स्टॉप’ है। एमएसपी का जिक्र भी किया गया। उसे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कांग्रेसी धड़े ने चुनौती दी, जिसका नारा है-‘हरियाणा मांगे हिसाब।’ कांग्रेस में शैलजा के नेतृत्व वाला भी धड़ा है और आलाकमान इस धड़ेबाजी को खत्म नहीं कर पाया है। हालांकि बेरोजगारी, किसान-संकट और रुकी, स्थिर, गतिहीन अर्थव्यवस्था आदि मुद्दे हरियाणा में अच्छी तरह परिचित रहे हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव के आते-आते विपक्ष ने उन्हें गरमा दिया है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के डाटा के अनुसार, हरियाणा में बेरोजगारी दर सर्वाधिक है, जबकि सरकार का डाटा इसके बिल्कुल उलट है और वह बेरोजगारी के मामले में हरियाणा को चौथे स्थान पर मानती है। राज्य की औद्योगिक गतिविधियां सीमित हैं व रोजगार प्रभावित है।



