संपादकीय

‘दीदी’ की अग्नि-परीक्षा

‘दीदी’ के संभ्रांत शहर कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में ड्यूटी कर रही टे्रनी डॉक्टर के साथ जो बर्बरता की गई और बाद में हत्या कर दी गई, उससे समूचा देश शर्मसार है। साझा आंदोलन का मुद्दा यही है। यह ममता बनर्जी की राजनीति का सबसे कठिन समय है, क्योंकि छात्रों, युवाओं और महिलाओं के समवेत आंदोलनों ने ही ममता को सडक़ से मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचाया था। आज ममता ऐसे ही आंदोलनों के युवाओं और छात्रों को ‘गुंडा’ करार दे रही हैं। बंगाल पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठियां भांजी, पानी की तेज धार मारी, आंसू गैस के गोले दागे और बाद में हिरासत में भी बंद कर दिया। सचिवालय तक के रास्ते में 27 बैरिकेड्स स्थापित किए, 26 डीसीपी सरीखे वरिष्ठ अधिकारी तैनात किए, 6000 से ज्यादा पुलिसकर्मी और सुरक्षा बल के जवान तैनात किए। लोहे की दीवारें खड़ी की गईं, जिन पर तेल और ग्रीस मला गया। क्या कोई रणक्षेत्र सजा था?

यह बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अग्नि-परीक्षा का दौर है। बंगाली सम्मान से उन्हें ‘दीदी’ कहते रहे हैं, लिहाजा जवाब भी उन्हीं से मांग रहे हैं। ‘दीदी’ के खिलाफ आंदोलन-दर-आंदोलन जारी हैं। यह स्थिति तब है, जब दो माह पहले लोकसभा चुनाव में उनकी ‘तृणमूल पार्टी’ को 46 फीसदी वोट मिले और 42 में से 29 सीटें जीतीं। इस जनादेश की आड़ में आप नहीं छिप सकतीं, क्योंकि राज्य की युवा और छात्र शक्ति गुस्से और आक्रोश में है। प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा का विरोध-प्रदर्शन और 12 घंटे का बंद भी आयोजित किया गया है और 3 सितंबर को वाममोर्चा का काडर सडक़ों पर उतरेगा। सभी की साझा मांग है कि ममता बनर्जी मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दें। कोई राजनीतिक गठबंधन नहीं हुआ है। ‘दीदी’ ने किससे युद्ध करने को अपने जवान तैनात कराए थे? आंदोलनकारी ‘नबन्ना सचिवालय’ तक मार्च करना चाहते थे और डॉक्टर बिटिया के साथ ‘रेप-मर्डर’ की नृशंसता का न्याय मांग रहे थे। आंदोलन और शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन तो हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। आंदोलनकारियों ने कुछ पथराव किया, तो उनके मानसिक रोष को समझना चाहिए था। आंदोलन की ताकत इसी से समझी जा सकती है कि 80,000 से अधिक युवा और छात्र सडक़ पर आंदोलित हुए।

यह ममता बनर्जी की सत्ता के खिलाफ सामूहिक लहर का एक प्रमाण है। यह 2026 के जनादेश को भी तय कर सकता है। ममता-विरोधी आंदोलनों ने कोलकाता के बाहर और पश्चिम बंगाल के पार खासकर बंगालियों को जगा दिया है। ये उनके लिए चेतावनी की घंटी है। औसतन बंगाल महिला-सुरक्षा और सम्मान का पक्षधर रहा है। बंगाल देवी दुर्गा और मां काली की आराधना-स्थली है। अगले माह दुर्गा पूजा और फिर दीपावली के त्योहार हैं। आह्वान किए जा रहे हैं कि ये त्योहार न मनाए जाएं। आखिर एक बेटी को कुचल कर मारा गया है। इंसाफ अभी निश्चित नहीं है, क्योंकि सीबीआई की जांच जारी है। साक्ष्य मिटा दिए गए थे, जब हजारों की भीड़ एक रात में अचानक अस्पताल तक आई और सब कुछ तबाह कर दिया। बंगाल पुलिस उस भीड़ को तो रोक नहीं पाई। बल्कि उसकी खुफिया सूचना तक हासिल नहीं कर पाई। ‘दीदी’ को इन सभी अपराधों के जवाब देने होंगे। कोलकाता के आंदोलनकारी ‘दीदी’ ममता की प्रतिक्रिया जानना चाहते थे। ‘रेप-मर्डर’ बर्बर मामले के संदर्भ में मुख्यमंत्री ने ही अस्पताल के प्रशासन और पुलिस के निकम्मेपन का बचाव किया है, लिहाजा ममता की भूमिका को भी अक्षम्य माना गया। सर्वोच्च अदालत की न्यायिक पीठ ने ऐसी ही तल्ख टिप्पणियां की थीं। ममता इन आंदोलनों को राम-वाम और कांग्रेस पर थोप कर अग्नि-परीक्षा पार नहीं कर सकतीं। राज्य के गवर्नर लगातार मुख्यमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ टिप्पणियां कर रहे हैं। अभी वह दिल्ली में राष्ट्रपति और गृह मंत्री से मुलाकात करके लौटे हैं, लिहाजा बंगाल में अनुच्छेद 356 के तहत ‘राष्ट्रपति शासन’ लगाने की चर्चाएं भी जारी हैं। सरकार बिल्कुल नाकाम है, संवैधानिक मशीनरी ढह चुकी है, कानून-व्यवस्था अराजक स्थिति में है, अपराध बढ़ रहे हैं, राजनीतिक हत्याएं भी की जा रही हैं, लिहाजा 356 का यह फिट केस है, लेकिन ममता ‘सड़किया राजनेता’ हैं। वह फिर सडक़ पर बिछ सकती हैं। सहानुभूति ग्रहण कर सकती हैं, लिहाजा 356 चस्पां करना है, तो गंभीर विमर्श के बाद किया जाना चाहिए। विपक्ष सवाल उठा रहा है कि आंदोलित युवाओं पर पुलिसिया बल प्रयोग क्यों किया जा रहा है। क्या रेप व हत्या की शिकार हुई प्रशिक्षु चिकित्सक को न्याय नहीं मिलना चाहिए। लगता है जब तक उसे न्याय नहीं मिलेगा, आंदोलन जारी रहेगा।

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