संपादकीय

स्वर्ग के शैतान, कश्मीर घाटी में 35 वर्ष बाद भी बची हुई है विषबेल

 आसी गच्छीए पनुनुय पाकिस्तान, बताव रोस्तुय बतेनियन सान (हमें अपना पाकिस्तान चाहिए। कश्मीरी पंडित पुरुषों के बिना, लेकिन कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ)। – 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में कश्मीर के मुसलमानों द्वारा सार्वजनिक पर्चों में की गई घोषणा।

मेरे पिता का देहांत हो गया है, हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार उनकी अस्थियां (फूल) हरिद्वार में गंगा जी में प्रवाहित करने हमें जाना है। आपसे प्रार्थना है हमें हरिद्वार यात्रा की इजाजत दें – मोहन लाल टिक्कू।

उर्दू दैनिक श्रीनगर टाइम्स के 11 दिसंबर, 1990 के अंक में छपा विज्ञापन जिसमें हिंदू परिवार इस्लामी जिहादियों से हरिद्वार जाने की अनुमति मांग रहा है।

कश्मीरी पंडित कायर थे, दगा दे गए, जिन्होंने अपनी मर्जी से घाटी को छोड़ा। उनको कश्मीर में नौकरियां दीं गईं, फ्लैट दिए गए, लेकिन वे काम नहीं करते, जम्मू में ऐश कर रहे हैं- शोपियां से स्वतंत्र विधायक शबीर अहमद कुले का जनवरी 2026 में न्यूज 18 पर बयान। (विवाद बढ़ने पर बयान वापस लिया)

पृथ्वी पर भारत एकमात्र देश है, जहां के देशभक्त नागरिकों को ‘स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र’ में राष्ट्र ध्वज के प्रति वफादारी और धर्मनिष्ठा के कारण अंतहीन अत्याचारों का शिकार होना पड़ा। अपने ही देश में निर्वासन भोगना पड़ा। कश्मीरी हिंदू अपने घर, सेब के बगीचे, खेत, अखरोट और बादाम के पेड़, सब जस के तस छोड़कर आने पर मजबूर हुए।

कश्मीर के मुस्लिम नेता, उन हिंदुओं के मुस्लिम पड़ोसी, उनके मुस्लिम मित्र सब मुंह मोड़कर अपने ही रक्त बंधुओं और मां-बहनों को रोते-बिलखते जाते देखते रहे। किसी ने उनको रोका नहीं, किसी ने उनको बचाया नहीं।

विश्वास पर गहरा आघात

गिरिजा टिक्कू जैसे अनेक लोमहर्षक उदाहरण कश्मीर की खूनी वादियों में बिखरे हुए हैं। वह पति के साथ कश्मीर के बांदीपोरा नगर में एक स्कूल में प्रयोगशाला सहायिका के नाते काम करती थी। जेकेएलएफ (जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट) के कुख्यात मुखिया यासीन मलिक के ‘काफिरों घाटी छोड़ो’ ऐलान के बाद गिरिजा टिक्कू सपरिवार जम्मू आ गई। कुछ दिन बाद उसको श्रीनगर से किसी ने फोन किया कि हालात सुधर गए हैं, तुम आकर अपना वेतन ले जाओ। विश्वास कर वह अपने स्कूल गई।

वेतन लेकर अपनी मुस्लिम सहेली से मिलने आई और सोचा वहां से जम्मू वापस आ जाएगी। वहां उसकी सहेली और नागरिकों के सामने जेकेएलएफ के मुजाहिद गुंडों ने उसका अपहरण कर लिया। गिरिजा टिक्कू को इस्लामी दरिंदे अज्ञात स्थान पर ले गए, दुष्कर्म किया, कई दिन बाद जब उसका क्षत-विक्षत शव मिला तो पता चला उसको आरे से जिंदा काटा गया था। हजरतबल श्रीनगर इलाके से नर्स सरला भट्ट का अपहरण कर लिया गया।

उसके साथ कई दिन सामूहिक दुष्कर्म हुआ। बाद में सड़क किनारे उसका शव मिला। दोनों ही मामलों में किसी के आंसू नहीं बहे, किसी ने इनको मानवाधिकार हनन का मामला नहीं माना। हिंदुओं पर अत्याचार सामान्य और रोजमर्रा की बात मानकर संविधान, सरकार, चुनाव, राजनीतिक उठापटक के दौर चलते रहे। चलती रही पत्थरबाजी, हड़तालें, खूंखार हत्यारे यासीन मलिक की शानदार दिल्ली दावतें और तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ उसकी मुलाकातें!

वर्षों बाद मिला न्याय

25 जनवरी, 1998 (गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले)- कश्मीर के गांदरबल जिले के वंधमा गांव में इस्लामी आतंकवादियों ने एक हिंदू परिवार में भारतीय जवानों के वेश में आकर चाय पी और वायरलेस पर जब उनको बताया गया कि सब हिंदुओं को एकत्र कर लिया है तो उन सबको गोलियां मार दीं, जिनमें दो और चार साल के नन्हे बच्चे भी थे। इससे पहले कि पाठक कश्मीर के हिंदू नरसंहार को भूलें, उनको भारतीय वायुसेना के जांबाज अधिकारी स्क्वाड्रन लीडर रविंद्र कुमार खन्ना की शोकांतिका से परिचित कराना जरूरी है।

अमृतसर निवासी स्क्वाड्रन लीडर खन्ना 25 जनवरी, 1990 को श्रीनगर के पास रावलपुरा बस स्टैंड पर वायुसेना बस की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके साथ वायुसेना के अन्य चार कार्मिक भी थे। जेकेएलएफ के आतंकवादी यासीन मलिक के नेतृत्व में वहां पहुंचे और एके47 से वायुसैनिकों पर गोलियां चला दीं। इस भयानक हत्याकांड की कांग्रेस तथा मुफ्ती-अब्दुल्ला शासनों में गवाहियां तक नहीं हुईं। यासीन इस हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त होने के बावजूद दिल्ली आता रहा, प्रधानमंत्री से मिलता रहा।

पुलवामा हमले (14 फरवरी 2019) के बाद नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा अलगाववादियों के खिलाफ की गई कार्रवाई के तहत यासीन मलिक को 22 फरवरी 2019 को श्रीनगर में हिरासत में लिया गया। अप्रैल 2019 में राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने 2017 के ‘आतंकवाद को आर्थिक मदद’ मामले में पूछताछ के लिए यासीन मलिक को गिरफ्तार किया और दिल्ली के तिहाड़ जेल ले आई।

मई 2022 में विशेष एनआईए अदालत में यासीन मलिक ने सभी आरोपों को कबूल किया, जिसमें आतंकवादी गतिविधियां, आपराधिक साजिश और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ना शामिल था। 25 मई, 2022 को पटियाला हाउस कोर्ट ने यासीन मलिक को आतंकवाद को आर्थिक मदद मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई, लेकिन वायुसैनिकों की हत्या का मामला अभी चल रहा है और उसमें यासीन को मृत्युदंड मिलना निश्चित है।

स्थापित हो संतुलित जनसंख्या

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के लौह संकल्प ने यह स्थिति कैसे बदली, स्मृतिविहीन समाज आज इसका अनुमान लगाना भी कठिन मान रहा है। हवा बदली, मौसम बदला, पत्थरबाजों का काला दौर खत्म हुआ, धारा 370 और 35ए का अंधा युग समाप्त हुआ, दो झंडों का चुभने वाला सामंती समय समाप्त हुआ, लाल चौक पर हर दिन हर क्षण राष्ट्रीयता का तिरंगा उत्सव अब आम बात हो गई। यह अविश्वसनीय सा यथार्थ न पाकिस्तानी आईएसआई को सहन हुआ, न ही उनके कश्मीर में बैठे एजेंट्स को।

नतीजा हुआ पुलवामा हत्याकांड- जिसमें 26 हिंदू पर्यटकों को उनका धर्म पूछकर क्रूरता से मार दिया गया। आज भी फारूक अब्दुल्ला तथा कुले जैसे कश्मीरी नेताओं के संवेदनहीन बयान बताते हैं कि घाटी के मुसलमान कश्मीरी हिंदुओं की घरवापसी के प्रति सतही बातें करते रहेंगे परंतु उनके मन में प्रतिरोध जमा रहेगा। घाटी में हिंदुओं की जनसंख्या बढ़ाकर, वहां सैनिक कालोनियां स्थापित करके तथा घाटी का एकतरफा जनसांख्यिकी असंतुलन न्याय संगत करने के बाद ही कश्मीर शांति का स्वर्ग बन सकेगा। यह कार्य लौह नीतियों से ही संभव हो पाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं!

फिर भी जारी रहीं साजिशें

1990 में कश्मीर घाटी में इस्लामिक आतंकवादी , एक हाथ में कुरआन और दूसरे में पाकिस्तानी सहायता से पाए हथियारों को सार्वजनिक प्रदर्शित करते थे । उन्होंने कश्मीर घाटी को हिंदूविहीन कर दिया और देश मूक दर्शक बना देखता रहा। नस्लीय नरसंहार के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान मिटाने की इस्लामी साजिशें हिंदू मंदिरों के अपमान और उनको क्षतिग्रस्त करने के रूप में 2006 के बाद भी जारी रहीं – मंदिरों पर कब्जे और तोड़फोड़ के साथ।

1989 से 2014 तक 1,000 से अधिक मंदिर क्षतिग्रस्त किए गए। मैं 35 वर्षों से कश्मीर क्षेत्र में जाता रहा हूं और आतंकवाद पर हजरतबल से रिपोर्टिंग भी की। मैंने वह दौर देखा है जब जम्मू-कश्मीर के हर कार्यालय, विधान सभा और हर नेता- पक्ष तथा विपक्ष के वाहनों पर दो झंडे लगे होते थे – एक भारत का और दूसरा जम्मू-कश्मीर रियासत का। भारत का कोई कानून भारतीय संसद द्वारा पारित होने के बावजूद जम्मू-कश्मीर में तब तक लागू नहीं होता था, जब तक वहां के राज्य की विधानसभा उसका अनुमोदन न कर दे!

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