संपादकीय

केरल में ‘प्रलय’ से तबाही

यह यह प्रलय कुदरती मार नहीं, बल्कि मानव-निर्मित घटना है, क्योंकि आदमी अपनी ऐयाशी के लिए पहाड़ों को तोड़ रहा है। पहाड़ों की चोटियों पर भी इमारतें बनाई जा रही हैं। प्रलय को हमने पढ़ा और सुना है। जिसने प्रलय को देखा और झेला है, वह जिंदा नहीं रहा। 2013 में केदारनाथ धाम में जो सैलाब आया और तबाही हुई अथवा उत्तरकाशी में भूकंप के बाद जो बाढ़ आई, हमने उन्हें ही प्रलय माना। विनाश और बर्बादी का दूसरा नाम प्रलय है। अब केरल के वायनाड जिले में लगातार तीन भू-स्खलन आए और फिर सैलाब आया, गांव के गांव दफन हो गए, 400 से अधिक घर देखते ही देखते ‘मलबा’ हो गए, करीब 200 मौतें हो चुकी हैं और इतने ही लोग लापता बताए जा रहे हैं, यह प्रलय नहीं है, तो और क्या है? केरल में सेना और एनडीआरएफ के जवान हमें ‘देवदूत’ लगे, जिन्होंने मलबे में से निकाल कर असंख्य जिंदगियां बचाईं। हालांकि केरल की भौगोलिक स्थिति परंपरागत पहाड़ों से भिन्न है, लेकिन देश भर के 80-85 फीसदी भू-स्खलन केरल में ही आते हैं। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक, 2015 से 2022 तक 3782 भू-स्खलन आए। उनमें से करीब 60 फीसदी केरल में ही आए। मौजूदा हालात पर विशेषज्ञों का मानना है कि अरब सागर का तापमान बढऩे से बेहद घने बादल बने और उसी से केरल में कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हुई। वायनाड पहाड़ी जिला है और पश्चिमी घाट का हिस्सा है। यहां 2100 मीटर तक ऊंचे पहाड़ हैं। मानसून में ये पहाड़ भू-स्खलन के लिए बेहद संवेदनशील हैं। जहां यह त्रासद घटना हुई है, वहां दो सप्ताह से बारिश हो रही थी, लिहाजा पहाड़ की मिट्टी गीली और ढीली हो चुकी थी। इसलिए एक ही रात में लगातार 3 भू-स्खलन आए। जमीन खिसक गई। घर हिलने लगेे। पहाड़ दरक कर गिरने लगे। सडक़ और पुल ताश के पत्तों की तरह बिखरने और ढहने लगे। जलवायु-परिवर्तन ने भी बारिश की स्थिति और भू-स्खलन की तीव्रता को बढ़ाया है। एक शोध में कहा गया है कि जो वायनाड साल भर बूंदाबांदी और मानसून की बारिश वाला ठंडा, नम वातावरण वाला इलाका होता था, जलवायु-परिवर्तन के कारण अब सूखा, गर्म, लेकिन मानसून के दौरान भारी, तीव्र बारिश वाला क्षेत्र बन गया है। इस बदलाव से भू-स्खलन का जोखिम बढ़ा है।

2018 के मानसून में भी खूब बारिश हुई थी, तब करीब 400 लोगों की जान चली गई थी। उसके बाद केरल में भू-स्खलन वाला क्षेत्र बढ़ गया है। इस हादसे, संकट या घटना पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में बयान दिया है कि उन्होंने 23, 24, 25 जुलाई को केरल सरकार को चेतावनी भेजी थी। फिर 26 जुलाई को भू-स्खलन, भारी बारिश की चेतावनी देते हुए आशंका व्यक्त की थी कि कई जानें भी जा सकती हैं। केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने ऐसी चेतावनियों से इंकार किया है। उनका कहना है कि रेड अलर्ट तब जारी किया गया, जब सैलाब आ चुका था। बहरहाल ऐसे आरोप-प्रत्यारोप से बचना चाहिए। देश में हर राज्य में, हर क्षेत्र में विकास होना चाहिए, लेकिन ऐसी घटनाओं से सबक भी सीखना चाहिए। विकास-कार्य जापान और ताइवान सरीखे देशों में भी हो रहे हैं। वहां भी पहाड़ काटे जा रहे हैं, लेकिन ऐसे हादसों से बचने के बंदोबस्त भी किए जा रहे हैं। वे दीवार पुश्ता लगाना हो अथवा पेड़-पौधों का रोपण या कुछ और बंदोबस्त करना हो, जापान इसमें अग्रणी रहा है। वहां के पहाड़ों को स्थिर बनाए रखने के लिए विशेष तरह की जालियां तक लगाई गई हैं। देश के उत्तराखंड राज्य में टिहरी बांध में ढलानों की कटाई के बाद बेहतर सुरक्षा उपाय किए गए हैं। ताइवान ने पहाड़ पर दबावमापी यंत्र लगाकर एक भिन्न प्रयोग किया है। इससे यथासमय पता चल जाता है कि पहाड़ पर कितना दबाव है और वह लोगों को पहाड़ के दरकने को लेकर आगाह कर देता है। भारत में हर सरकार और नागरिक विकास चाहते हैं। उसके लिए जो निर्माण-कार्य किए जाते हैं, वे बेलगाम और अनियोजित हंै। खनन तक धड़ल्ले से कराया जाता है। पहाड़ को काटते-तोड़ते रहेंगे, तो ऐसे ‘प्रलय’ कैसे रोके जा सकते हैं? इस पर सोचना चाहिए। देश के अन्य हिस्सों से भी बरसाती कहर के समाचार आ रहे हैं। बिहार हर वर्ष बाढ़ के कहर से सहम जाता है। वहां पर हर वर्ष बड़ी तादाद में जान और माल का नुकसान होता है। इस कहर से बिहार को बचाने के लिए इस वर्ष के बजट में विशेष आर्थिक सहायता दी गई है। अन्य राज्यों को भी उदारता के साथ विशेष आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए। खासकर हिमाचल पिछले वर्ष भी बुरी तरह प्रभावित हुआ था, और इस वर्ष भी बरसात का कहर उसने देखा है। उसे केंद्रीय मदद की सख्त जरूरत है।

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