इंसानी जीपीएस का क्षरण

अक्सर कहा जाता है कि मनुष्य शरीर के वे अवयव निष्क्रिय हो जाते हैं, जिनका मनुष्य लगातार उपयोग नहीं करता। मानव शरीर की अद्भुत कुदरती क्षमताओं पर भी यही बात लागू होती है। हाल ही में नोबेल पुरस्कार विजेता न्यूरोसाइंटिस्ट डॉ. एडवर्ड मोजर की वह चेतावनी चौंकाती है कि तकनीकी जीपीएस पर बढ़ती निर्भरता से इंसान के मस्तिष्क में स्थित कुदरती जीपीएस की क्षमता कम हो रही है। सदियों से इससे हमारे दिमाग में लक्षित स्थान का नक्शा बनाकर जगह तक पहुंचने में मदद मिलती थी। लेकिन हम रास्ते नहीं खोजते, बस जीपीएस की हिदायतें ही मानते हैं। याद करें जब फोन नहीं थे तो वाहन चालक व सामान पहुंचाने वाले वर्कर्स खुद रास्ते तलाशकर गंतव्य स्थान तक पहुंचते थे। लेकिन अब हम अपने दिमाग में पहुंचने वाली जगह का नक्शा बनाने की बजाय बस जीपीएस की हिदायतें ही मानते हैं। हम सिर्फ रास्ते की कड़ियों का हिस्सा बन रहे हैं। एक समय था कि हमें घुमावदार रास्ते भी याद रहते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं। इसकी वजह है कि अब हम रास्तों व उसके आसपास की चीजों को याद करने की जहमत नहीं उठाते। कमोबेश यह स्थिति ऐसी ही है जैसे कुछ साल पहले तक हमें बहुत सारे फोन नंबर याद रहते थे। यहां तक कि लैंडलाइन फोन के नंबर भी हम याद रखते थे। लेकिन अब फोन में नंबर सुरक्षित करके हम अपने परिवार के खास फोन नंबर याद नहीं रख पा रहे हैं। इसी तरह हम कुदरती जीपीएस की क्षमताओं से वंचित होने लगे हैं।
दरअसल, वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य के मस्तिष्क के भीतर ग्रिड सेल्स होते हैं। जिन्हें इंसानी दिमाग का भीतरी जीपीएस कहा जा सकता है। जो हमारा मार्गदर्शन करते हैं कि हम कहां हैं और हमें आगे कहां जाना है। ये ही हमारे दिमाग में लक्षित जगह का नक्शा बनाने में मदद करते हैं कि हमें कैसे व कहां जाना है। रोचक तथ्य यह है कि मनुष्य के मस्तिष्क में यह कुदरती जीपीएस जन्म के बाद जल्दी ही सक्रिय हो जाता है। यानी कुछ समय बाद ही मनुष्य के शरीर में रास्ते पहचानने की क्षमता विकसित हो जाती है। लेकिन विडंबना यह है कि हम लगातार अपने शरीर के इस कुदरती गुण को नजरअंदाज करके तकनीक यानी जीपीएस पर निर्भरता बढ़ाने लगे हैं। चिंता इस बात की भी है कि कहीं देर-सवेर हम अपने शरीर के भीतर स्थित जीपीएस से वंचित न हाे जाएं। जिसका सीधा असर हमारी सीखने की क्षमता, रास्ते याद रखने की शक्ति और भविष्य में लक्षित मार्ग खोजने की योग्यता में गिरावट के रूप में होगा। वैज्ञानिक कहते हैं कि हम तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन कुदरती क्षमता को सिरे से नजरअंदाज न करें। यदि समय-समय पर हम उसका उपयोग करेंगे तो उसकी सक्रियता बनी रहेगी। फिर जिन स्थानों पर गूगल व अन्य जीपीएस काम नहीं करते, वहां हम अपनी नैसर्गिक क्षमता का उपयोग रास्ते तलाशने में कर सकते हैं। वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं कि दिमागी जीपीएस प्रारूप का इस्तेमाल रोबोटिक्स में करने में कैसे सफलता मिले। जिससे मशीनें भी वैसा ही व्यवहार करें जैसा हमारा दिमाग करता है।



