कर्नाटक में तुष्टीकरण का खतरनाक खेल, मजहबी आरक्षण का प्रयास

गरीबी न मजहबी होती है और न स्थायी। जो आज गरीब हैं वह अपने प्रयत्नों एवं राष्ट्र राज्य के आर्थिक उत्प्रेरण से संपन्न हो जाते हैं। इसलिए गरीबों-वंचितों के लिए रक्षोपाय तय करते समय पंथ, मजहब का विचार अनुचित है। यह अलगाववादी है और संविधान विरोधी भी। बावजूद इसके कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने सरकारी ठेकों में मुसलमानों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण की पहल की है।
यह पहला मौका नहीं है। मुस्लिम वोट बैंक तुष्टीकरण कथित सेक्युलर राजनीति का स्थायी मिशन है। संविधान विरोधी होने के कारण मजहब आधारित आरक्षण के प्रस्तावों को न्यायालयों ने कई बार असंवैधानिक बताया है तब भी मजहबी तुष्टीकरण का खतरनाक खेल जारी है। भाजपा ने इस आरक्षण का तीव्र विरोध किया है। कांग्रेस बैकफुट पर है, जबकि राज्य सरकार ने जरूरी संविधान संशोधन की बात भी कही है।
मजहबी आरक्षण का यह प्रयास पहला नहीं है। कर्नाटक में ही पहले भी ऐसे प्रयास हुए हैं। संविधान विरोधी ऐसी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं। वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में 50 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण का एलान किया था। तत्कालीन केंद्रीय मंत्री अर्जुन सिंह ने इसका समर्थन किया था। जमीयत उलमा ए हिंद ने विशाल रैली में मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी।
सोनिया गांधी ने भी प्रतिबद्धता प्रकट की थी। यूनिवर्सिटी लंबे समय तक अलगाववाद को लेकर राष्ट्रवादियों के निशाने पर रही है। एक समय आल इंडिया मुस्लिम सम्मेलन में विधायिका और नौकरियों में मजहब आधारित आरक्षण मांगा गया था। फिर 1983 में मुस्लिम लीग ने केरल में मुस्लिम आरक्षण की यही मांग दोहराई।
1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और जनता दल ने मुस्लिम आरक्षण का वादा किया था। आंध्र प्रदेश ने भी मुस्लिम आरक्षण की दिशा में कदम रखे। संविधान की उद्देशिका और अनुच्छेद 15 एवं 16 में धर्म और पंथ आधारित भेद का निषेध है। मुस्लिम आरक्षण अनुच्छेद 15 और 16 का उल्लंघन है।
पंथ-मजहब आधारित निर्णय उचित नहीं होते। इसीलिए संविधान निर्माता पंथ-मजहब आधारित विशेषाधिकारों के विरोधी थे। सभा के सदस्य मजहब आधारित भारत विभाजन से आहत थे। विभाजन के माहौल में ही संविधान आकार ले रहा था। मुस्लिम आरक्षण का विषय सभा के समक्ष आया। सभा ने गहन अध्ययन के लिए अल्पसंख्यक अधिकारों संबंधी समिति गठित की।
सरदार पटेल समिति के सभापति बने। सभा में जेडएच लारी ने मुस्लिम आरक्षण की मांग पर कहा कि आपको अनुसूचित जातियों के हितों की चिंता है, पर मुस्लिम हितों की नहीं। एक मुस्लिम सदस्य नजीरूद्दीन अहमद ने कहा कि किसी प्रकार के रक्षण स्वस्थ राजनीतिक विकास के प्रतिकूल हैं। जगत नारायण लाल ने कहा कि भारत एक सेक्युलर राज्य होगा और अब आरक्षण की मांग नहीं होनी चाहिए। सभा में इस पर दो दिन बहस हुई।
एक मुस्लिम सदस्य बी. पोकर ने धमकाते हुए मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग करते हुए कहा कि मुसलमान शक्तिशाली और संगठित हैं और यदि उन्हें लगा कि उनकी आवाज नहीं सुनी गई, तो वे उद्दंड हो सकते हैं। प्रख्यात विधिवेत्ता ए. आयंगर ने कहा, ‘मेरा अनुमान था कि पाकिस्तान प्राप्त करने के बाद मुस्लिम दोस्त अपना व्यवहार बदलेंगे।
सभा के उपाध्यक्ष एचसी मुखर्जी ने दो टूक कहा कि हम एक राष्ट्र चाहते हैं तो मजहब के आधार पर कोई मान्यता नहीं दे सकते। संविधान सभा के कुछ मुस्लिम सदस्य मौलाना हजरत मोहानी, तजम्मुल हुसैन, नजीरुद्दीन अहमद आदि पंथ आधारित आरक्षण के पक्ष में नहीं थे। सरदार पटेल ने बहस के उत्तर में कहा, ‘समिति के अध्ययन का निष्कर्ष है कि मुस्लिम बंधुओं ने आरक्षण की मांग पर बल नहीं दिया है।’ कई मुस्लिम सदस्यों ने आपत्ति की। कहा गया कि मुस्लिम ताकतवर हैं। संगठित हैं।
बादशाह रहे हैं। उन्हें कमजोर न मानें। इस पर पटेल ने कहा, ‘आपका समाज संगठित है। शक्तिशाली है। तो आप विशेष सुविधाएं क्यों मांगते हैं। जो अल्पमत देश विभाजन करा सकता है। वह अल्पमत नहीं हो सकता। अगर आपको ऐसा असंभव लगता है तो आप अपने विचार के अनुसार किसी सुंदर स्थान पर चले जाइए।’ पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा, ‘सभी वर्ग अपनी-विचारधारा के अनुसार गुट बना सकते हैं, लेकिन पंथ, मजहब आधारित अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक वर्गीकरण नहीं किया जा सकता। मैं यहां तक कहता हूं कि जो रक्षण रह गए हों, वह भी समाप्त कर दिए जाएं। वर्तमान परिस्थितियों में अनुसूचित जाति के आरक्षण को हटाना सही नहीं होगा।’
संविधान निर्माता मजहब आधारित विशेषाधिकारों के विरोधी थे। पंडित नेहरू ऐसे आरक्षण और वर्गीकरण के विरुद्ध थे ही। पटेल मजहबी अलगाववाद और पंथक अस्मिता के विरोधी थे। संविधान सभा की मसौदा समिति के सभापति डॉ. आंबेडकर सभी तरह की सांप्रदायिकता के विरोधी थे। मूलभूत प्रश्न है कि क्या नेहरू के मजहबी आरक्षण विरोधी विचार का प्रभाव सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि कांग्रेस जनों पर भी नहीं पड़ता? क्या डॉ. आंबेडकर के नाम पर वोट मांगने वाले दल समूहों को मुस्लिम आरक्षण का विरोधी नहीं होना चाहिए।
संविधान सभा में डा. आंबेडकर, राधाकृष्णन, आयंगर आदि प्रतिष्ठित विद्वान मजहबी अस्मिता के घातक परिणामों के जानकार थे। डा. आंबेडकर और उनके सामने दुनिया के कई देशों के आरक्षण संबंधी माडल थे। वे भारत की सामाजिक संरचना से भिन्न थे। भारत में जाति आधारित भेदभाव रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने व्यथित, वंचित अनुसूचित जातियों को आरक्षण दिया। वह भी सुनिश्चित अवधि के लिए।
मुस्लिमों की बात करें तो वे भारत में लगभग 600 साल तक सत्ताधीश रहे हैं। वे सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं। इसके बावजूद वोट बैंक तुष्टीकरण के लिए बार-बार मुस्लिम आरक्षण की असंवैधानिक मांग की जाती है। संविधान निर्माताओं ने अपनी ओर से इस विषय का निस्तारण कर दिया था। भारतीय राष्ट्रराज्य को भी इसका अंतिम निस्तारण करना चाहिए। जो स्वयं संविधान नहीं मानते, उन्हें राष्ट्र सर्वोपरिता समझाना कठिन है।



