संपादकीय

भ्रष्टाचार, ‘आप’ हाजिर हो

जिस आम आदमी पार्टी की स्थापना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से शुरू हुई थी और जो आज तक ‘कट्टर ईमानदारी’ और शुचिता के दावे करती रही है, उस पार्टी का अस्तित्व भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण संकट में पड़ गया है। आम आदमी पार्टी (आप) पहली ऐसी राजनीतिक राष्ट्रीय पार्टी है, जिसे आपराधिक केस में ‘आरोपित’ बनाया गया है। अब ‘आप’ के खिलाफ भी अदालत में मुकदमा चलेगा। अदालत ने केजरीवाल और ‘आप’ दोनों को हाजिर होने का आदेश सुनाया है। यदि ‘आप’ अपराध में दंडित की गई, तो चुनाव आयोग पार्टी की मान्यता भी रद्द कर सकता है। पराकाष्ठा की यह स्थिति करीब 12 साल में ही आ गई। ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक अर्थात मुखिया केजरीवाल को भी ‘आरोपित’ बना दिया गया है। मुख्यमंत्री होने के बावजूद वह जेल में हैं। उनकी कैबिनेट में उपमुख्यमंत्री रहे मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्य मंत्री रहे सत्येन्द्र जैन भी लंबे वक्त से जेल में हैं। संदर्भ दिल्ली में नई शराब नीति की आड़ में 100 करोड़ रुपए की घूस और घोटाले का है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने अदालत में दाखिल आरोप-पत्र में केजरीवाल को ‘किंगपिन’ करार दिया है। विडंबना है कि जिस पार्टी की स्थापना भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से हुई थी और जो आज तक ‘कट्टर ईमानदारी’ और शुचिता के दावे करती रही है, उस पार्टी का अस्तित्व भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के कारण संकट में पड़ गया है। ‘आप’ के प्रवक्ता और नेता चुनावी बॉन्ड का प्रलाप करते हुए आरोप-पत्र को खारिज नहीं कर सकते। यह ईडी को साबित करना है कि केजरीवाल के खिलाफ चवन्नी भी बरामद नहीं हुई है, फिर भी वह जेल में हैं। साक्ष्य और मनी टे्रल भी ईडी को ही पेश करने हैं। जांच एजेंसी अभी तक न्यायाधीशों के सामने कुछ साक्ष्य तो पेश कर रही होगी, जिनके आधार पर पदासीन मुख्यमंत्री भी जेल में हैं। अब ट्रॉयल अदालत में होगा और वह ही अंतिम निष्कर्ष देगी। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा की अब कोई भूमिका नहीं है। केजरीवाल लगातार राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता की बात अदालत के सामने कह रहे हैं, लेकिन अभी तक अदालत के विवेक पर कोई असर नहीं पड़ा है। दरअसल बुनियादी आरोप 45 करोड़ रुपए की घूस का है, जो राशि हवाला के जरिए, गोवा चुनाव के दौरान, भेजी गई थी। बेशक केजरीवाल पक्ष कुछ भी दलीलें देता रहे, लेकिन बुनियादी लाभार्थी तो ‘आप’ और उसके मुखिया केजरीवाल हैं। हवाला कारोबारियों की कंपनियों के अलग-अलग नाम हैं, लेकिन उनका जुड़ाव केजरीवाल और ‘आप’ से था।

आरोप-पत्र में चरनप्रीत सिंह के बैंक खाते का जिक्र किया गया है। हवाला का पैसा उस तक आया था और वह गोवा में ‘आप’ का कार्यकर्ता था। केजरीवाल के वकीलों को साबित करना है कि केजरीवाल और चरनप्रीत के कोई करीबी संबंध नहीं थे। वह पार्टी के आधार पर काम नहीं कर रहा था। गोवा में चुनाव प्रत्याशियों को नकदी पैसा बांटने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। जिन चुनावी उम्मीदवारों को नकदी पैसा दिया गया, उनके नाम, बयान और ब्योरे भी ईडी ने आरोप-पत्र में दर्ज किए हैं। बैंकों के नोट और उनके सीरियल नंबरों का उल्लेख भी किया गया है। बहरहाल हम इन्हें खाली आरोप मान भी लें, तो अब अदालत को तय करना है कि कौन सच्चा है और कौन अपराधी है? चूंकि ‘आप’ को लाभान्वित माना गया है, लिहाजा उसे आरोपी नंबर 38 बनाया गया है, जबकि केजरीवाल आरोपी नंबर 37 हैं। सवाल है कि मनी लॉन्ड्रिंग वाले कानून के दायरे में क्या राजनीतिक पार्टी भी आती है? उस पर केस कैसे चलेगा? क्या पार्टी के प्रमुख प्रभारियों पर ही केस चलेगा? आरोप-पत्र के मुताबिक, पीएमएलए की धारा 70 के तहत ‘आप’ 45 करोड़ रुपए की आपराधिक आय की लाभार्थी है। धारा 3 में ‘आप’ को भी धनशोधन के अपराध की दोषी माना गया है। धारा 70 में यह भी स्पष्ट उल्लेख है कि जो कंपनी का इंचार्ज होगा, उसे ही ‘अपराधी’ माना जाएगा। कानून में कंपनी की जो परिभाषा है, वह ‘आप’ पर भी लागू होती है। मुख्यमंत्री एवं ‘आप’ के राष्ट्रीय संयोजक केजरीवाल को भी आपराधिक आय की जानकारी थी। बहरहाल कंपनी दोषी साबित हुई, तो उसके जिम्मेदार प्रभारी जेल जाएंगे और पार्टी पर आर्थिक जुर्माना लगेगा। अब यह अदालत में स्पष्ट होगा कि केजरीवाल ही सर्वेसर्वा रहे हैं अथवा कोई और?

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