संपादकीय

सामूहिक आत्मघात

हरियाणा के पंचकूला में उत्तराखंड से आए एक परिवार की सामूहिक आत्महत्या ने हर संवेदनशील व्यक्ति को गहरे तक झकझोर कर रख दिया। एक कार में नाकाम बेटे ने मां-बाप,पत्नी, दो किशोर बेटियों व एक बेटे के साथ जहर खाकर आत्महत्या कर ली। पूरे परिवार के खत्म होने के बाद कुछ समय के लिए जीवित बचे व्यक्ति ने चश्मदीद को बताया कि वह कर्ज में डूब गया था, कोई रास्ता नजर न आता देख सामूहिक आत्महत्या का निर्णय लिया। पुलिस के पहुंचने व चिकित्सीय प्रयासों के बावजूद परिवार में किसी व्यक्ति को बचाया नहीं जा सका। निश्चय ही यह दुखद घटना हर इंसान को उद्वेलित करती है। लेकिन यह भयावह घटना तमाम सवालों को जन्म देती है। आखिर इंसान कैसे सोच लेता है कि आत्महत्या कर लेना संकट का अंतिम समाधान है? जब व्यक्ति में जोखिम से उपजे संकट से जूझने का सामर्थ्य नहीं है तो भारी कर्जा उठाना कितना तार्किक है? महत्वपूर्ण सवाल यह भी कर्ज से हारे व्यक्ति को ये अधिकार किसने दे दिया कि वो अपने साथ दो पीढ़ियों को सदा के लिये खत्म कर दे? कैसे कोई व्यक्ति अपनी नाकामी की सजा मां-बाप, पत्नी व बच्चों को दे सकता है? यह कल्पना करनी भी भयावह है कि अपना अधिकांश जीवन जी चुके मां-बाप, तीन बच्चों को जन्म देने वाली मां तथा सुखी भविष्य की कल्पना के साथ जीवन की पारी की शुरूआत करने वाले बच्चों ने जहर खाना सहज स्वीकारा होगा। यदि उन्हें यह जहर बिना बताए भी दिया गया होगा तो भी जहर की पीड़ा ने उन्हें तड़फाया भी होगा। अकसर ऐसे मामलों में पूरे परिवार को मौत की राह में ले जाने वाले आत्मघाती व्यक्ति के मन में यह भय भी होता है कि उसके जाने के बाद उसके परिवार का क्या होगा? कहीं उसके लिये कर्ज की सजा परिवार को तो नहीं मिलेगी?

निस्संदेह, एक परिवार का यूं जहर खाकर आत्महत्या करना हमारी सामाजिक व्यवस्था में आई विद्रूपताओं की ओर इशारा करता है। जिस भी बैंक या व्यक्ति से आत्महत्या करने वाले परिवार के मुखिया ने कर्ज लिया था, निश्चय ही वहां से उसे किसी भी तरह की राहत की उम्मीद नजर नहीं आई होगी। लेकिन सवाल उठता है कि क्या उसे अपने मित्रों व रिश्तेदारों से भी किसी राहत की उम्मीद नहीं थी? कहा जाता है कि पड़ोसी व मित्र ही संकट के समय में मददगार होते हैं। तो क्या माना जाना चाहिए कि आज हमारे रिश्ते महज दिखावे के रह गए हैं? आखिर विवाह समारोह समेत तमाम अवसरों पर जुटने वाली लोगों की भीड़ केवल महज खाने-पीने तक की ही दोस्त होती है? क्या नैतिक दायित्व नहीं बनता कि संकट में फंसे व्यक्ति के नाते रिश्तेदार या मित्र मदद करें? बहरहाल, गत सोमवार को घटी घटना के सभी तथ्य सामने आने में अभी वक्त लगेगा और घटनाक्रम से जुड़ी अन्य जानकारियां भी सामने आएंगी। लेकिन यह एक हकीकत है कि एक कर्ज से हारा हंसता-खेलता परिवार हमेशा-हमेशा के लिये चिरनिद्रा में सो गया है। लेकिन यह दुखांत हमें कई सबक दे गया है। पहला तो यही कि हमें कर्ज उसी सीमा तक लेना चाहिए, जिस सीमा तक हम चुकाने की सामर्थ्य रख सकें। कोई भी जोखिम यदि हम व्यापार में उठाएं तो उसके तमाम नकारात्मक पहलुओं पर जरूरी विचार करें। उसके बुरे से बुरे परिणाम के बारे में आकलन करें। दूसरा सबक यह है कि हमारे सामने संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, हमें हार नहीं माननी चाहिए। यह भी कि खुद व परिवार को मौत के मुंह में धकेलना किसी समस्या का समाधान नहीं है। आज की पीढ़ी जल्दी मोटा मुनाफा कमाने की होड़ में बड़े कर्ज लेकर दांव तो खेलती है,लेकिन जरूरी नहीं हर जोखिम लाभदायक ही साबित हो। हमें अपनी सामर्थ्य और देशकाल परिस्थितियों का पूरा आकलन करके ही कदम उठाना चाहिए। यह भी हकीकत है कि नई पीढ़ी में वह धैर्य व संयम धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, जो हमें संकट से जूझने का सामर्थ्य देता था। कभी संयुक्त परिवार हमें ऐसे संकट से निबटने की ताकत ही नहीं देते थे, बुरे वक्त में मदद भी करते थे। हमें ऐसे तमाम पहलुओं पर विचार जरूर करना चाहिए।

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