चीनी-रूसी भाई-भाई

‘चीनी-रूसी भाई-भाई’ के नारे एक बार फिर गूंजने लगे हैं, तो क्या ‘हिंदी-रूसी भाई-भाई’ के परंपरागत और दोस्ती के नारों पर पुनर्विचार करना चाहिए? यह सवाल अहम और अनिवार्य है, क्योंकि रूस भारत का दशकों पुराना और आजमाया हुआ ‘रणनीतिक मित्र’ है और चीन हमारा घोषित दुश्मन है। यदि ‘दुश्मन’ जैसा कड़ा शब्द छोड़ दिया जाए, तो चीन हमारा कट्टर प्रतिद्वंद्वी है। घुसपैठिया और अतिक्रमणवादी है। आज भी लद्दाख के मोर्चे पर दोनों देशों के हजारों सैनिक तैनात हैं। हर पल युद्ध के हालात बने रहते हैं। कई दौर की बातचीत की गई है, लेकिन वे नाटक लगती हैं, क्योंकि तनाव और अडिय़लपन जस का तस बरकरार है। यह बेहद अजीब स्थिति है कि चीन और भारत ‘शत्रुवत’ हैं और रूस-भारत घनिष्ठ मित्र हैं। तीसरा समीकरण रूस-चीन का है, जिसे ‘अंतरंग दोस्ती’ का नाम दिया गया है। राष्ट्रपति पद की नई शपथ लेने के बाद ब्लादिमीर पुतिन हाल ही में चीन गए थे। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से उनकी मुलाकात हुई, शिखर संवाद हुआ और दोनों राष्ट्रपतियों ने साझा बयान भी जारी किया। बेशक चीन-रूस के अंतरंग रिश्तों और रणनीतिक साझेदारी पर शी-पुतिन ने एक बार फिर मुहर लगाई, लिहाजा हुंकार गूंजने लगी-रूसी चीनी भाई-भाई।’ यह कोई सामान्य और औपचारिक मुलाकात नहीं थी। इसके कई अंतरराष्ट्रीय अर्थ और आयाम हैं। शी-पुतिन संवाद तथा बयान पर अमरीका खूब तिलमिलाया है, जबकि ‘दोनों राष्ट्र भाई’ दुनिया में टकराव और युद्ध के हालात के लिए अमरीका को ही ‘दोषी’ करार देते हैं। रूस और चीन के रिश्ते रणनीतिक तो हैं, लेकिन विचारात्मक संबंध भी ऐसे हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
हालांकि अब उनका ‘साम्यवाद’ और ‘वामपंथ’ मात्र सतही रह गए हैं। वे भी पूंजीवाद के रास्ते पर हैं और देश के विभिन्न वर्गों में ‘गहरी असमानता’ है। दोनों देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ‘वीटोधारक’ सदस्य हैं, लिहाजा एक-दूसरे के हितों और रणनीति की सुरक्षा करते हैं। सुरक्षा परिषद में पेश किए गए प्रस्तावों पर अपनी ही कूटनीति के मुताबिक ‘वीटो’ करते रहे हैं। रूस-चीन की दोस्ती हथियारों और युद्ध तक ही सीमित नहीं है। वे दुनिया में अमरीका-विरोधी ब्लॉक माने जाते हैं। जिस तरह अमरीका ने प्रशांत महासागर क्षेत्र में जापान, भारत, ऑस्टे्रलिया के साथ ‘क्वाड’ संगठन बना रखा है, उसी तर्ज पर रूस-चीन संबंध हैं। रूस और चीन दुनिया में ‘शीत युद्ध’ की मानसिकता और वैश्विक सुरक्षा में अस्थिरता के लिए अमरीका को ही कसूरवार और जिम्मेदार मानते हैं। भारत के संदर्भ में चीन और अमरीका दोनों ही दोगले हैं। अमरीका चीन के खिलाफ भारत का ‘इस्तेमाल’ करता रहा है। भारतीय क्षेत्र में चीन ने बार-बार घुसपैठ की है और भारतीय इलाकों पर कब्जे भी किए हैं। चीन अरुणाचल, सिक्किम, हिमाचल आदि इलाकों में कुछ क्षेत्रों को ‘चीनी’ मानता है, जबकि वे भारत गणतंत्र का हिस्सा हैं। दूसरी ओर यूक्रेन रूस के खिलाफ जंग लड़ पा रहा है, क्योंकि अमरीका मुखौटा पहन कर रणक्षेत्र में है।
अमरीका और नाटो देश हथियारों और आर्थिक संसाधनों की मदद यूक्रेन को मुहैया न कराते, तो यूक्रेन कभी का ‘मलबा’ हो गया होता! अमरीका, यूरोप ने इस युद्ध के जरिए हथियारों का कारोबार भी किया है। अमरीका और पश्चिमी देशों ने रूस पर ऐसे आर्थिक प्रतिबंध थोपे थे कि वह बर्बाद हो जाए, दिवालिया निकल जाए, लेकिन रूस ने अपने दो मित्र देशों-भारत और चीन-की बदौलत अस्तित्व बचाए रखा। बल्कि यूरोप के कई देश गैस, ईंधन की कमी के कारण त्राहि-त्राहि करने लगे। गौरतलब तो यह है कि चीन-रूस की घोषित नई दोस्ती का प्रभाव क्या भारत पर पड़ेगा? भारत रूसी हथियारों और सुरक्षा प्रणालियों का सबसे बड़ा खरीददार है। कल्पना करें कि भारत-चीन में युद्ध छिड़ जाता है, तो रूस का रुख क्या रहेगा? सर्वोत्तम स्थिति यह होगी कि रूस तटस्थ रहेगा। यदि बदतर हालात बने, तो रूस चीन का समर्थन करेगा, उसे ही सहयोग देगा। फिर ‘हिंदी-रूसी भाई-भाई’ के ऐतिहासिक और सात दशकों से भी अधिक समय से गूंज रहे नारे का क्या होगा? क्या एक युद्ध ही भारत-रूस के रिश्तों को समाप्त कर देगा? बहरहाल, कूटनीति ऐसा संवेदनशील विषय है कि सरकारों को मंथन करना ही पड़ता है।


