संपादकीय

कश्मीरियत के लिए चुनौती

इसमें दो राय नहीं कि सीमा पार पाक के सत्ता प्रतिष्ठानों की शह पर कट्टरपंथी ताकतों की साजिश के चलते पहलगाम में पर्यटकों पर हुआ हमला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है, जो आतंकियों की हताशा को ही दर्शाता है। लेकिन पहलगाम का आतंकी हमला कश्मीरियों पर दोहरी मार है। इस हमले का कश्मीर के पर्यटन उद्योग पर घातक प्रभाव नजर आ रहा है। जिस तेजी से पर्यटक कश्मीर छोड़ रहे हैं और बाकी लोग अपनी अग्रिम बुकिंग रद्द करा रहे हैं, वह कश्मीरियों के लिये अप्रत्याशित है। शायद स्थितियां सामान्य होने में वर्षों लग जाएंगे। घाटी में रहने वाले लोग पर्यटकों की संख्या में अभूतपूर्व कमी के कारण भारी नुकसान की आशंका जता रहे हैं। दरअसल, लंबे अंतराल के बाद कश्मीर के पर्यटन उद्योग के पटरी पर लौटने के बाद स्थानीय लोगों ने ऋण लेकर अपने कारोबार नये सिरे से खड़े किए थे। अब उन लोगों के सामने न केवल जीविका का संकट है बल्कि फिक्र है कि वे लिए गये कर्ज कैसे चुकाएंगे। उनकी आकांक्षा है कि घाटी में स्थितियां जल्दी से सामान्य हों। वहीं इस संकट का दूसरा पहलू अन्य राज्यों में रह रहे कश्मीरी छात्रों और व्यापारियों की सुरक्षा को लेकर है। निस्संदेह, पहलगाम की घटना ने पूरे देश को दु:खी किया है। जैसे-जैसे आतंकियों के निर्मम हमले से जुड़ी कहानियां निकल रही हैं, समाज में तल्ख प्रतिक्रिया नजर आ रही है। कश्मीरी लोग आशंकित हैं कहीं इस आक्रोश से उपजे रोष का शिकार कश्मीर मूल के लोगों को न होना पड़े। निश्चित रूप से किसी भी सभ्य समाज में ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होनी चाहिए कि आतंकवादियों के कुकृत्यों का खमियाजा निर्दोष लोगों को भुगतना पड़े। यही वजह है कि जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सज्जाद लोन जैसे प्रमुख राजनेताओं ने कश्मीरियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जतायी है। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों से उम्मीद की जा रही है कि वे विभाजनकारी तत्वों पर नकेल डालेंगे।

निस्संदेह, इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि पहलगाम की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद पहली बार घाटी में आतंकवाद के खिलाफ मुखर प्रतिक्रिया सामने आई है। कश्मीर में सक्रिय रहने वाले राजनीतिक दलों, व्यापार निकायों और सामाजिक-धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ ही आम लोगों ने भी पहलगाम हमले के दौरान हुई पर्यटकों की हत्या की निंदा की है। उन्होंने सीमा पार से आतंकवाद की पाठशाला चलाने वाले लोगों को सख्त संदेश दिया कि हमारे मामलों में तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है। कश्मीर के लोगों ने साफ संदेश भेजा है कि –‘हमारे नाम पर नहीं।’ कश्मीरियों ने बताया कि उन्हें उन आतंकवादियों से किसी भी तरह की सहानुभूति नहीं है, जो मानवता के खिलाफ अपने अपराधों से कश्मीर के साथ-साथ इस्लाम को भी बदनाम कर रहे हैं। निस्संदेह, पहलगाम के क्रूर हमले के बाद पूरे देश में गुस्सा चरम पर है। ऐसे में राजनीतिक दलों और धार्मिक संगठनों को इस आक्रोश को बढ़ाने के बजाय इसे शांत करने का प्रयास करना चाहिए। देश के संघीय स्वरूप व सद्भावना की हर कीमत पर रक्षा की ही जानी चाहिए। पहलगाम की घटना के बाद तल्खी दिखा रहे लोगों को याद रखना चाहिए कि यह कश्मीरी टट्टूवाला सैयद आदिल हुसैन शाह ही था, जिसने बंदूकधारी आतंकवादियों से पर्यटकों को बचाने की कोशिश करते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी थी। एक बहादुर व्यक्ति की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जब वह हमलावर आतंकी से हथियार छीनने की कोशिश कर रहा था। कश्मीरियों के बारे में गलत धारणाओं को दूर करने के लिये उनके नि:स्वार्थ साहस और वीरता को व्यापक रूप से स्वीकार किया जाना चाहिए। बल्कि उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। एक कायरतापूर्ण आतंकी हमले के लिये पूरे राज्य के लोगों को दोषी ठहराना सांप्रदायिक सद्भाव को पलीता लगाने जैसा है, जो हमारे धर्मनिरपेक्ष सामाजिक ताने-बाने को नुकसान भी पहुंचा सकता है। हमें विगत में आतंकी हमले के लिए संप्रदाय विशेष को दोषी ठहराने के बाद हुई प्रतिक्रियाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। कोशिश हो घटनाक्रम के बाद उपजे शोर में समझदार आवाजें दब न जाएं।

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