महिला डॉक्टर से बर्बर बलात्कार और हत्या

कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का यह मामला एक और ‘निर्भया कांड’ है। महिला टे्रनी डॉक्टर की आंखों में उसके चश्मे का शीशा घुस गया, क्योंकि ‘राक्षस’ ने चश्मे पर भी वार किया था। डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट और छाती पर काफी गहरी चोट के निशान मिले हैं। सिर दीवार पर मारा गया था, लेकिन हत्या गला दबा कर की गई। ये पोस्टमॉर्टम के संक्षिप्त निष्कर्ष हैं। अच्छा हुआ कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से जांच सीबीआई को सौंप दी गई है, लेकिन मामला आईने की तरह सब कुछ बयां कर रहा है। ऐसे ‘दानव’ की सजा फांसी होनी चाहिए। दुर्भाग्य है कि जिन्हें हम‘जीवन-दाता’ भी कहते हैं ‘जीवन-रक्षक’ मानते हैं, और कई असाध्य बीमारियों के संदर्भ में भगवान से भी तुलना करते हैं, ऐसी ही एक महिला डॉक्टर के साथ बर्बर बलात्कार और अंतत: हत्या का ‘राक्षसी काम’ किया गया है। उनके साथी डॉक्टर ही नहीं, देश भर के डॉक्टरों का रोष और आंदोलन अब भी जारी है। करीब 3-4 लाख चिकित्सक देश भर में विरोध-प्रदर्शन को बाध्य किए गए हैं, लिहाजा अपने दायित्व को भी पीछे छोड़ कर वे अपने अस्तित्व और सुरक्षा की लड़ाई लड़ रहे हैं। देश में महिला डॉक्टर और नर्स, अस्पताल के परिसर में होने के बावजूद, सुरक्षित नहीं हैं। उन बलात्कारियों को ‘दरिंदा’ कहें या कुछ और करार दें, वे कमोबेश इनसान नहीं हैं। उन्होंने मानवीय लबादा ओढ़ रखा है। कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल का यह मामला एक और ‘निर्भया कांड’ है। महिला टे्रनी डॉक्टर की आंखों में उसके चश्मे का शीशा घुस गया, क्योंकि ‘राक्षस’ ने चश्मे पर भी वार किया था। डॉक्टर के प्राइवेट पार्ट और छाती पर काफी गहरी चोट के निशान मिले हैं। सिर दीवार पर मारा गया था, लेकिन हत्या गला दबा कर की गई। ये पोस्टमॉर्टम के संक्षिप्त निष्कर्ष हैं। अच्छा हुआ कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से जांच सीबीआई को सौंप दी गई है, लेकिन मामला आईने की तरह सब कुछ बयां कर रहा है। ऐसे ‘दानव’ की सजा फांसी होनी चाहिए। मामला किसी गांव अथवा नाबालिग का नहीं है, जिसमें बहुस्तरीय जांच की दरकार होती है। पीडि़ता भी बहुत कुछ बोल नहीं पाती। यह वीभत्स दुष्कर्म तो अस्पताल के सेमिनार रूम में किया गया, जहां 36 घंटे की लंबी ड्यूटी के बाद महिला डॉक्टर आराम करने या सोने गई थी। इस व्यवस्था पर भी सवाल होने चाहिए कि अस्पताल में सोने की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की गई थी? दरअसल सुरक्षा बंदोबस्त और उनके कारगर होने के बीच ‘गहरी खाई’ है, इस केस से यह भी साबित हो गया। सवाल पुलिस की भूमिका पर भी उठाए जा रहे हैं, जिसने ऐसे बलात्कारी को ‘वॉलंटियर’ बना रखा है।
दुष्कर्म की घटना के 5 दिन बाद तक भी पुलिस किसी शुरुआती निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई थी, लिहाजा अदालत ने जांच सीबीआई को सौंप दी। देश की राजधानी दिल्ली में जब 16 दिसंबर, 2012 की गहरी रात में ‘निर्भया कांड’ किया गया था और उसके बाद यौन हमलों, शोषण और उत्पीडऩ को लेकर नया कानून बनाया गया था, संसद खूब चीखी थी, तब कुछ सुकून महसूस हुआ था कि अब दरिंदगी कमोबेश कम होनी चाहिए, लेकिन वे प्रलाप ‘नारी-शक्ति’ तक ही सीमित रहे और औसत महिला की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो पाई। बलात्कार और हत्याएं तो आज भी देश भर में होती हैं। यह डॉक्टर का और वह भी अस्पताल के भीतर का मामला है, लिहाजा ज्यादा गंभीर और संवेदनशील है। कोलकाता से लेकर मुंबई तक महिला डॉक्टरों के साथ जघन्य अपराधों के मामले सामने आते रहे हैं। गंभीर चिंता और सरोकार का मुद्दा है कि यह वहशीपन कब समाप्त होगा? समाज और देश मनोविकृतियों के बीमार हैं क्या? केंद्र सरकार ने ‘निर्भया फंड’ बनाया था। मौजूदा बजट में 100 फीसदी आवंटन बढ़ाया गया है, लेकिन 2013-22 का पूरा डाटा निराश करता है, क्योंकि 50 फीसदी से भी कम बजट खर्च किया गया है। या तो निष्क्रियता है अथवा प्रशासन गंभीर नहीं हैं! 2020-21 में उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण किया गया जिसमें चिकित्सा की पढ़ाई करने वाले पुरुष और महिला का अनुपात 1:1 था। नर्सिंग में 100 पुरुष पर 310 महिलाएं यह पढ़ाई कर रही थीं। कार्यस्थल पर महिला के यौन उत्पीडऩ को लेकर 2013 में कानून बना था, लेकिन उसकी व्यवस्था भी आधी-अधूरी रही है। जहां कानून लागू किया गया है, वह आधे मन से किया गया है। सर्वोच्च अदालत ने भी मई, 2023 में ‘सुरक्षित कार्यस्थल’ को लेकर अथॉरिटी, प्रबंधन, नियोक्ताओं को तलब किया था। वे दफ्तर में सुरक्षित और संरक्षित माहौल मुहैया कराने में नाकाम रहे थे। फिर भी अस्पताल के भीतर इतनी बर्बर और वीभत्स घटना हो गई! यह चिंताजनक है।



