बीएमसी रिजल्ट, बीजेपी यूं ही नहीं बनी धुरंधर, 5 पॉइंट्स में समझें

महाराष्ट्र की कुल 29 महानगरपालिकाओं के चुनाव में बीजेपी का डंका बजा है। 25 जगहों पर बीजेपी ने गठबंधन के साथ जीत हासिल की है। इससे पहले, नगरपरिषद के चुनावों में भी बीजेपी गठबंधन को भारी सफलता मिली थी। अब, 5 फरवरी को स्थानीय चुनावों की अंतिम कड़ी में जिलापरिषद के चुनाव होंगे।
बीएमसी चुनाव में मिली सफलता से सत्ता पक्ष की राह आसान कर दी है, जबकि विपक्ष के लिए नए सिरे से जमीन पर मौके तलाशने की चुनौती सामने लाई है। इसका असर, आगामी समय में राज्य की राजनीति के साथ-साथ विधानमंडल के कामकाज पर भी दिखाई देगा।बीएमसी चुनाव के नतीजे हमेशा से ही दूरगामी परिणामकारक होते आए हैं। देश की सबसे बड़ी महानगरपालिका के इन नतीजों से निकले पांच अहम पॉइंट्स बता रहे हैं विजय पांडेय…
बीजेपी पहली बार देश की सबसे बड़ी महानगरपालिका BMC की सत्ता संभालेगी। पिछली बार महज 2 सीटों से चुकी बीजेपी ने इस बार कोई कसर नहीं छोड़ी। उद्धव सेना से दूरी के बाद देवेंद्र फडणवीस ने मिशन मुंबई को सफल बनाने के लिए खुद कमान संभाली। सीट बंटवारे पर सहमति बनाकर शिंदे और आठवले को साथ लिया। चुनाव से ठीक पहले अमित साटम को मुंबई BJP की कमान सौपी। हर प्रभाग के लिए पूरी रणनीति आंकी। लगातार रणनीति में बदलाव, उम्मीदवारों की मदद के लिए ऐप समेत अन्य सुविधाएं और बगावत दूर करने को बड़े नेताओं को मैदान में उतारा।
राज ठाकरे से गठबंधन का उद्धव ठाकरे को अपेक्षित फायदा नहीं मिला। मराठी वोट एकत्रित करने के चक्कर में गैर-मराठी वोट पार्टी से छिटक गए। बीजेपी का विकल्प बनने का ख्वाब देख रही पार्टी पिछली बार का 84 सीटों का प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी। ठाकरे ने खुद को बीएमसी तक सीमित कर लिया था। शिवाजी पार्क में राज ठाकरे के आक्रामक भाषण से भी शांतिप्रिय वोटर दूर हुए। हालांकि, मुस्लिमों ने कई इलाकों में पार्टी का साथ दिया। इससे उद्धव सेना सम्मानजनक स्थिति में पहुंची। पार्टी ने घर-
घर पहुंचने की कोशिश की लेकिन बेस वोट कम होने से मेयर की कुर्सी दूर हो गई।
संसाधनपूर्ण मेहनत, उद्धव सेना के 55 से ज्यादा नगरसेवकों को साथ लाने के बावजूद शिंदे बीएमसी चुनाव में प्रभाव छोड़ने में असफल रहे। सीट बंटवारे में 90 सीटें हासिल
करने के बावजूद पार्टी 30% का स्ट्राइक रेट भी नहीं हासिल कर सकी। साफ तौर पर पार्टी का कैडर उद्धव के साथ ही होने का पार्टी को भरपूर नुकसान हुआ। शिंदे सेना से जीते तमाम नगरसेवकों का अपने क्षेत्र में प्रभाव ही नतीजों में काम कर गया। अब सत्ता बंटवारे में शिंदे की पार्टी के हिस्से में अहम भूमिका आने की संभावना कम है। शिंदे को पार्टी के विस्तार के लिए अधिक संघर्ष करना होगा।
मुंबई में कांग्रेस का कोर वोट बैंक अब भी है। पार्टी ने अकेले चुनाव लड़कर संगठन को जिंदा करने की पहल की। हालांकि, सीटों के लिहाज से उसे पुरानी सफलता नहीं मिली। लेकिन अलग-अलग इलाकों से उसके नगरसेवक चुनकर आए। इससे भविष्य के लिए पार्टी को संजीवनी मिली है। बीएमसी चुनाव में देरी से उम्मीदवारों की घोषणा, स्टार प्रचारकों की दूरी, चुनाव से पहले तक संगठन पर मशक्कत और पार्टी में गुटबाजी के चलते पार्टी दलित और मुस्लिम वोट बैंक का फायदा पूरी तरह नहीं ले सकी। प्रकाश आंबेडकर से गठबंधन भी पार्टी को ज्यादा लाभ नहीं दिला सका।
सामान्य तौर पर, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और उद्धव सेना को मुस्लिम वोटों का दावेदार माना जा रहा था, लेकिन एआईएमआईएम ने प्रभावी रूप से इन इलाकों में चुनावी जीत दर्ज की। हालांकि, पार्टी के कई जीते उम्मीदवार दूसरी पार्टी से आए हुए थे। लेकिन असद्दुदीन ओवैसी का प्रभाव मुंबई में असरदार नजर आया। पार्टी अब आगे विपक्ष के हिस्से के वोट को कब्जे में करने की कोशिश करेगी, खासकर अन्य मुस्लिम इलाकों में। मुस्लिम इलाकों से समाजवादी पार्टी को जबर्दस्त लगा झटका पार्टी के भविष्य की चिंता को बढ़ाने के लिए काफी है।



