संपादकीय

रक्त रंजित मणिपुर शांति के इंतजार में लोगों की मुश्किलें …

पिछले वर्ष 3 मई को मणिपुर में शुरू हुई जातीय हिंसा में अब तक 20 महिलाओं और 8 बच्चों सहित 226 से अधिक लोगों की मौत और 1500 से अधिक लोग घायल हुए हैं जबकि लगभग 60,000 लोग राहत शिविरों में जीवन बिताने को मजबूर हैं। मणिपुर में जारी जातीय संघर्ष में बीच में कमी आई थी परंतु इस वर्ष 13 अप्रैल के बाद फिर हिंसा भड़क उठी तथा बिष्णुपुर जिले में सी.आर.पी.एफ. की चौकी पर हमले में 2 लोग मारे गए, 2 जवानों सहित कम से कम 4 लोगों की हत्या हो चुकी है। लोकसभा चुनावों के समाप्त होने के बाद, राज्य में हिंसक घटनाओं में तेजी आ गई है। 

मानो यह पर्याप्त नहीं था कि 29 मई को मणिपुर में भयंकर बाढ़ की खबरें आ गईं जिसके कारण देश से राज्य का सम्पर्क भी टूट गया। बाढ़ से कुल 1,88,143 लोग प्रभावित हुए और कम से कम 24265 घरों को भी नुकसान पहुंचा। राज्य के अनेक इलाकों इम्फाल, बिष्णुपुर, चुराचांदपुर आदि में अत्यंत भावपूर्ण दृश्य देखने को मिलते हैं। इन इलाकों में स्थित स्कूल, कालेजों की इमारतों में जहां किसी समय छात्रों की चहल-पहल रहती थी, आज इनमें छात्र नहीं, न्याय का इंतजार कर रहे हजारों विस्थापित परिवार रह रहे हैं। कमरों पर कक्षाओं के नाम लिखे हुए हैं लेकिन अब इन कमरों में छात्रों के भविष्य के सपने नहीं बुने जाते, अपने बच्चों की चिंता में घुल रहे परिवारों की आहें गूंजती हैं। 

ऐसे ही विस्थापित शिविर में रहने वाली एक महिला, जिसके बड़े बेटे की चुराचांदपुर में और छोटे बेटे की लामलाई में हत्या कर दी गई, के अनुसार, ‘‘हमारे पास सब कुछ था-एक घर, रोजगार, एक पड़ोस लेकिन अब हमारे पास यादों और अनिश्चित भविष्य के डर के अलावा कुछ नहीं है।’’ आंखों में आंसू और हाथों में अपने एक बेटे की फटी हुई तस्वीर पकड़े इस महिला ने कहा, ‘‘मेरे बेटे, मेरी दुनिया थे।’’ जहां पीड़ितों का कहना है कि मणिपुर की इस स्थिति के लिए जिम्मेदार लोगों को न्यायपालिका जवाबदेह ठहराए व अपराधियों को पकड़े। लोगों के निजी नुक्सान की कहानियां न्यायपालिका व राज्य सरकार के हस्तक्षेप की मांग करती हैं। विभिन्न राहत शिविरों में रहने वाले लोगों को शिकायत है कि राज्य में व्याप्त ङ्क्षहसा की घटनाओं की जांच और उन पर की गई कार्रवाई के बारे में भी उन्हें कोई अपडेट नहीं मिलता सिवाय इसके कि एफ.आई.आर. दर्ज कर ली गई है। 

स्थिति इतनी तनावपूर्ण है कि राज्य के विभिन्न जातीय समूहों के लोगों को अलग-अलग शिविरों में रखा गया है। लोगों का कहना है कि उनके पास घर, खेत और शांतिपूर्ण जीवन था लेकिन अब उनके पास अब कुछ भी नहीं रहा।  वे अब तंग कमरों में रहते हैं, दूसरों की सहायता पर निर्भर हैं और उन्हें कोई पता नहीं कि कल क्या होगा। लोगों का भरोसा सरकार पर से उठ गया है क्योंकि न तो राज्य और न ही केंद्र सरकार ने कोई ङ्क्षचता व्यक्त की और न ही समस्याओं को हल करने के लिए कोई कार्य योजना बनाई। लोग किसी भी मुद्दे पर सहायता के लिए अपने गांवों के मुखियाओं के पास जाते हैं। लोगों का कहना है कि उनके खेत नष्टï हो गए , मवेशी मर गए और पहाडिय़ों से दागी जाने वाली गोलियां उन्हें किसी भी समय मार सकती हैं। 

एक महिला ने कंकड़ भरे मुट्ठी भर चावल दिखाते हुए कहा,‘‘हमें दिन में 2 बार खाना मिलता है लेकिन देखिए हमें क्या मिलता है?’’ एक दुखी महिला ने कहा, ‘‘मेरे बच्चे डाक्टर और इंजीनियर बनने का सपना देखते थे। अब मुझे नहीं पता कि वह कभी दोबारा स्कूल या कालेज जा भी पाएंगे या नहीं।’’ यद्यपि 13 जुलाई 2023 को यूरोपीय संसद ने मणिपुर में हिंसा को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेषकर ईसाइयों की रक्षा के लिए आह्वान किया था। आर.एस.एस. प्रमुख श्री मोहन भागवत ने हाल ही में सरकार का इस समस्या की ओर ध्यान दिलाया। 

17 जून को मणिपुर ङ्क्षहसा और राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में बैठक करके मैतेई और कुकी समुदाय से बात करने की बात कही है। इस बैठक में मणिपुर के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह उपस्थित नहीं थे परंतु मणिपुर के सुरक्षा सलाहकार कुलदीप सिंह इसमें शामिल थे। और अब राज्य के मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने 21 जून को कहा है कि राज्य में व्याप्त जातीय अशांति दूर करने के लिए मोदी सरकार जल्द ही एक कार्य योजना बनाएगी तथा राज्य में चल रहे संकट का समाधान जल्द ही हो जाएगा। ऐसे में अच्छा है कि मणिपुर की समस्या का किसी को ध्यान तो आया। अब आगे-आगे देखें होता है क्या?

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