संपादकीय

भाजपा का ‘नबीन’ दौर

नितिन नबीन भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति में बड़े समारोह के साथ उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत की है। नबीन के पक्ष में केंद्रीय मंत्रियों, प्रदेश अध्यक्षों और संसदीय बोर्ड ने कुल 37 नामांकन प्रस्ताव दिए थे, विरोध में कोई भी नामांकन नहीं था, लिहाजा भाजपा अध्यक्ष निर्विरोध चुने गए हैं। यह भाजपा की स्थापित परंपरा है कि शीर्ष नेतृत्व एक नाम तय करता है और समूचा संगठन उस पर स्वीकृति की मुहर लगा देता है। भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाते हुए कभी कोई विरोध, चुनाव की चुनौती सामने नहीं आई, लिहाजा पार्टी में अब ‘नबीन दौर’ शुरू हो गया है। इसे स्वीकार करना चाहिए। भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष 45 वर्षीय, सबसे युवा नेता हैं। उनसे पहले अमित शाह 49 वर्ष और नितिन गडकरी 52 वर्ष के थे, जब वे भाजपा अध्यक्ष बने। पार्टी के भीतर से यह खबर भी आ गई है कि भाजपा संगठन में अब 70 फीसदी पद 60 साल की उम्र से कम वाले चेहरों को दिए जाएंगे। साफ है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी और पदाधिकारियों के स्तर पर व्यापक बदलाव किए जा सकते हैं। भाजपा ने नितिन नबीन के दौर के साथ ही यह प्रचारित करना शुरू कर दिया है कि देश की 65 फीसदी आबादी युवा है और भाजपा ‘जेन जी’ की पहली पसंद वाली पार्टी है। पार्टी के प्रथम सरोकार, लक्ष्य, प्राथमिकताएं, कार्यक्रम आदि भी ‘जेन जी’ केंद्रित होंगे। इस सोच और रणनीति के पीछे जनादेश के आंकड़ों का भी योगदान है। 2024 के लोकसभा चुनाव में 39 फीसदी से अधिक युवाओं ने भाजपा-एनडीए के पक्ष में वोट दिए।

राज्य स्तरीय चुनावों में समर्थन का यह आंकड़ा 45-47 फीसदी तक भी पहुंचा है। लिहाजा प्रधानमंत्री मोदी ने, गृहमंत्री अमित शाह की सलाह से, भाजपा अध्यक्ष के लिए एक निर्विरोध, निर्विवाद और संगठन के अनुभवी युवा चेहरे को चुना है। यह नाम जब सामने आया था, तो प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर देश को हैरान कर दिया था। बहरहाल भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल, 1980 को की गई और अटलबिहारी वाजपेयी को प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया। भाजपा की पृष्ठभूमि ‘भारतीय जनसंघ’ में निहित रही है, जिसकी स्थापना 21 अक्तूबर, 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने, बलराज मधोक और दीनदयाल उपाध्याय सरीखे साथियों के संग, एक स्कूल के प्रांगण में की थी। आपातकाल के बाद ‘जनता पार्टी’ के राजनीतिक संगठन का उदय हुआ, तब जनसंघ समेत कई विपक्षी दलों ने अपना निजी अस्तित्व समाप्त कर ‘जनता पार्टी’ में विलय किया था। नतीजतन 1977 का शानदार, प्रचंड जनादेश विपक्ष को हासिल हुआ, लेकिन 1979 में जनता पार्टी के विघटन के बाद जनसंघ वाले गुट ने भाजपा का गठन किया। राजनीति में 45 साल का सफर कोई लंबा नहीं माना जाता, लेकिन आज भाजपा 17 करोड़ से अधिक सदस्यों और काडर वाली विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। यह आश्चर्यजनक विस्तार और स्वीकृति है। भाजपा के प्रथम प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी थे, जिन्होंने 6 साल तक भारत सरकार का नेतृत्व किया। 26 मई, 2014 से नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। वह लगातार तीन बार प्रधानमंत्री चुने गए हैं।

देश के 21 राज्यों में भाजपा-एनडीए की सरकारें हैं। करीब 68 फीसदी देश पर उनका शासन है। बिहार विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के 1654 विधायक हैं और एनडीए विधायकों की संख्या 2300 से अधिक है। भाजपा का लक्ष्य है कि आगामी दो साल में उसके अपने विधायकों की संख्या 1800 को छू सकती है। इतना जनादेश क्या पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल के विधानसभा चुनावों से मिल सकता है? हमें तो यह भी आश्चर्य नहीं लगता। आज भाजपा आंध्रप्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के साथ सत्ता में है। कमोबेश जनता का शुरुआती जनादेश तो मिला। विस्तार बाद में किया जा सकता है। आज भाजपा, जनसंघ की तरह, बनियों, ब्राह्मणों, व्यापारियों की पार्टी ही नहीं है। अब ओबीसी, दलित, आदिवासी और 7-8 फीसदी मुसलमान भी भाजपा के साथ हैं, लिहाजा पार्टी का ऐसा विस्तार हुआ है। इसके बावजूद भाजपा आज भी दक्षिणपंथी, हिंदूवादी, मंदिरवादी पार्टी है, लिहाजा वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का घोर विरोध करती है। उससे राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है और पार्टी को चुनावी फायदा होता है। पार्टी ने ऐसी राजनीति भी की है, जो देशहित में नहीं रही, लेकिन भाजपा फायदे में रही है।

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