राजनीति

बीजेपी के ‘चाणक्य’ ने ऐसा कौन सा दांव चला कि सहयोगी दल वक्फ बिल पर ना नहीं बोल पाए

नई दिल्लीः गृह मंत्री अमित शाह को बीजेपी का चाणक्य कहा जाता है। वक्फ संशोधन बिल जैसे विवादित विधेयक पर एक फिर शाह की ‘नीति’ काम आई और संसद भवन में सहयोगी दल से मुलाकात के बाद सदन में खेल का पासा ही पलट गया। अमित शाह की रणनीति का ही कमाल था कि मुस्लिम समर्थक मानी जाने वाली बीजेपी की सहयोगी पार्टियां वक्फ संशोधन बिल पर सरकार के साथ खड़ी रहीं।

चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी और नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड जैसी सेकुलर पार्टियों ने विवादास्पद वक्फ संशोधन बिल का समर्थन किया। इन दोनों दलों के इस फैसले ने सियासी गलियारों में हलचल मचा दी है। बताया जा रहा है कि बीजेपी ने इस विवादित मुद्दे पर सहयोगियों का समर्थन हासिल करने के लिए काफी प्रयास किया था।


पर्दे के पीछे की रणनीति काम आई

परंपरागत रूप से माना जाता है कि टीडीपी और जेडी(यू) मुस्लिम समर्थन पर निर्भर करती हैं। इन दोनों पार्टियों ने मुसलमानों से संबंधित मुद्दों खासकर समान नागरिक संहिता जैसे मामलों पर बीजेपी से अलग रुख अपनाया है। लेकिन बताया जा रहा है कि पर्दे के पीछे की चर्चाओं ने बीजेपी को इन पार्टियों को विधेयक का समर्थन करने के लिए राजी कर लिया।

बीजेपी ने वक्फ संशोधन बिल की जरूरत बताई

अगस्त में विधेयक पेश करने से पहले सीनियर मंत्रियों ने टीडीपी और जेडी(यू) नेतृत्व को इसके महत्व के बारे में बताया था। बीजेपी के मंत्रियों ने सहयोगी दलों चिराग पासवान की लोक जनशक्ति और जयंत चौधरी की राष्ट्रीय लोक दल के नेताओं से भी विचार विमर्श किया। इसकी आवश्यकता को समझाया और इस बात पर जोर दिया कि इसका मकसद मुस्लिम हितों की रक्षा करना और महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करना है, न कि समुदायों का ध्रुवीकरण करना जैसा कि विपक्ष ने आरोप लगाया है।


कुछ प्रावधानों से सहयोगी दल सहमत नहीं थे

हालांकि सहयोगी दल बीजेपी की बातों से सहमत थे लेकिन कुछ प्रावधानों को लेकर उन्होंने अपनी चिंता जाहिर की थी। खासकर मौजूदा वक्फ संपत्तियों पर प्रभाव और राज्य सरकारों के अधिकारों को लेकर। इसके बाद, विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया, जिसने 14 संशोधनों को स्वीकार किया, जिसमें जेडी(यू) और टीडीपी के महत्वपूर्ण सुझाव शामिल थे। जेडी(यू) ने इस बात पर जोर दिया कि मौजूदा मस्जिदों, दरगाहों या अन्य मुस्लिम धार्मिक स्थलों के साथ हस्तक्षेप से बचने के लिए नए कानून को लागू नहीं किया जाना चाहिए।

सहयोगी दलों के सुझावों को सरकार ने माना

जेडीयू ने वक्फ भूमि पर निर्णय के लिए राज्यों से चर्चा करने पर भी जोर दिया, क्योंकि भूमि राज्य का विषय है। टीडीपी ने राज्यों की स्वायत्तता बनाए रखने की वकालत की और विवाद समाधान के लिए कलेक्टर लेवल से ऊपर के सीनियर अफसरों को नियुक्त करने और पोर्टल पर वक्फ से संबंधित दस्तावेजों को अपलोड करने की समय-सीमा बढ़ाने का सुझाव दिया।

संशोधित बिल में इन सुझावों को शामिल किया गया, जिसके कारण इसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। जेडीयू और टीडीपी के नेताओं ने मुस्लिम महिलाओं और हाशिए के समुदायों के हितों को साधने की बात को लेकर विधेयक का समर्थन किया। एलजेपी और आरएलडी ने भी बिल का समर्थन किया है। लोकसभा में बिल पेश किए जाने से पहले गृह मंत्री अमित शाह ने जेडीयू नेताओं ललन सिंह और संजय झा से संसद भवन में मुलाकात की और उन्हें बताया कि पार्टी के सुझावों को विधेयक में शामिल कर लिया गया है।

बीजेपी के सेकुलर दलों ने संसद में क्या कहा?

लोकसभा में बहस के दौरान ललन सिंह ने विधेयक का जोरदार समर्थन किया और इस चिंता को खारिज कर दिया कि यह मुस्लिम हितों के खिलाफ है। उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मुसलमानों के कल्याण के लिए उठाए गए कदमों के बारे में बताया और आगामी बिहार चुनावों के मद्देनजर कई बार उनका जिक्र किया।

इसी तरह, टीडीपी के केपी टेनेटी ने इस बात पर जोर दिया कि आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने मुसलमानों के हित में कई फैसले लिए हैं। टीडीपी ने मुस्लिम महिलाओं, युवाओं और हाशिए पर पड़े समुदायों के हितों पर फोकस करते हुए बिल का समर्थन किया। एलजेपी,हिंदुस्तान आवाम मोर्चा और आरएलडी सहित अन्य बीजेपी सहयोगियों ने भी इस रुख से सहमति जताई। बताया जा रहा है कि विधेयक पर सहयोगियों को साथ लेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूसरे से तीसरे कार्यकाल तक की नेतृत्व शैली में निरंतरता को दर्शाता है।

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