राजनीति

भाजपा को ओडिशा में पहली बार मिली सत्ता, बंगाल में नहीं चला जादू

पश्चिम बंगाल में कई वर्षों से भाजपा अपने विस्तार की कोशिश में लगी हुई है और पहले उसे अच्छी संख्या में सीटें भी मिली थीं, पर पिछले विधानसभा में और अब लोकसभा में उसे नुकसान का सामना करना पड़ा है. इस चुनाव में उसने आक्रामकता के साथ अपनी सीटें बढ़ाने का प्रयास किया, लेकिन उसकी सीटें घटी हैं. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस का वोट प्रतिशत 46 के आसपास है. भाजपा का वोट शेयर 38 प्रतिशत से कुछ अधिक है. लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस का साझा वोट प्रतिशत 11-12 प्रतिशत होना चाहिए. साल 2021 के विधानसभा चुनाव में जो भाजपा की हार हुई थी, लोकसभा के चुनाव परिणाम उसका दोहराव है. तृणमूल कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा के चुनाव में अपना जो जनाधार खोया था, विशेष रूप से दलित एवं आदिवासी समुदायों में, उसने उसे बहुत हद तक फिर से हासिल किया है. महिलाओं को हर माह वृत्ति देने की जो योजना ममता बनर्जी सरकार ने शुरू की है, उसका उसे बहुत लाभ मिला है. इस योजना का लाभ 2.10 करोड़ महिलाओं को मिल रहा है

विधानसभा चुनाव की तुलना में देखें, तो कांग्रेस और वाम मोर्चे के वोट शेयर में दो-तीन प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन परिणामों पर उसका कोई असर नहीं पड़ा है. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 40 से अधिक हो गया था, जो इस बार घटकर 38 प्रतिशत हो गया. इस कारण उसे सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है. कहा जा सकता है कि जिस प्रकार अनेक राज्यों में मोदी का जादू नहीं चल सका है, उसी प्रकार बंगाल में भी वे बेअसर रहे हैं. सीटों के हिसाब से पश्चिम बंगाल तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. यहां की तरह उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा है. अगर बंगाल में भी इंडिया अलायंस मिलकर चुनाव लड़ता, तो भाजपा के लिए यहां एक भी सीट जीत पाना मुश्किल हो जाता. जहां तक ओडिशा की बात है, तो राज्य विधानसभा में भी भाजपा को भारी जीत मिली है, उसे लोकसभा सीटों का भी लाभ हुआ है. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपनी सरकार और पार्टी बीजू जनता दल की कमान पूर्व अधिकारी पांडियन को देकर भारी गलती की. इस तरह के फ्रेंचाइजी स्टाइल के शासन को ओडिशा की जनता ने नकार दिया है. पांडियन ने बीजू जनता दल को बचाने की जगह राज्य को भाजपा के हवाले कर दिया है. ओडिशा को करीब से जानने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वहां पूर्व नौकरशाहों का एक गठजोड़ बहुत प्रभावशाली है. ये नौकरशाह अलग-अलग दलों में हैं, पर वे तालमेल के साथ काम करते हैं.

बहरहाल, लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना एक सकारात्मक स्थिति है. इस बार एक दशक के बाद संसद में अच्छी संख्या में विपक्ष होगा. इसी के साथ यह मोदी सरकार और भाजपा के वर्चस्व की समाप्ति का प्रारंभ है. चुनाव परिणाम के साथ यह पहलू भी जुड़ा हुआ है कि एग्जिट पोल की आड़ में सरकार को भारी बहुमत से वापसी का दावा किया गया और स्टॉक मार्केट में भारी उछाल आया. पर जब नतीजे आने लगे, तो बाजार औंधे मुंह गिर पड़ा. यह गिरावट कोई सामान्य गिरावट नहीं है. ऐसी घटनाएं हमारी वित्तीय व्यवस्था को अस्थिर कर सकती हैं. इसकी जांच होनी चाहिए.

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