संपादकीय

भारत-रत्न आडवाणी

पहले बिहार के ‘जननायक’ समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर और अब भाजपा के शिखर-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत-रत्न’ से नवाजने का निर्णय राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा के दौर में लिया गया। यह सम्मान प्रधानमंत्री की अनुशंसा पर राष्ट्रपति देते हैं। आडवाणी को ‘भारत-रत्न’ देने पर राजनीति और धर्म के एक वर्ग को घोर आपत्ति है, क्योंकि वह उन्हें ‘सांप्रदायिक नेता’ मानता रहा है, लेकिन भाजपा की दृष्टि भिन्न है। भाजपा की स्थापना और बुलंदियों तक पहुंचाने में जिन दो राजनेताओं का प्रथम योगदान रहा है, उन्हें यह सम्मान देकर भाजपा सरकार ने अपना कत्र्तव्य निभाया है। आडवाणी न केवल भारत सरकार में ‘लौह-पुरुष’ की भूमिका में थे, बल्कि वह ही भाजपा के बुनियादी शिल्पकार और विस्तारक रहे। आज भाजपा देश की सबसे बड़ी, ताकतवर काडर वाली, सत्तारूढ़ पार्टी है, जिसने इन दो सम्मानों के जरिए ‘मंडल बनाम कमंडल’ वाली राजनीति को ‘मंदिर और मंडल’ की राजनीति में परिणत करने की कोशिश की है। यह भाजपा का नया राजनीतिक विस्तार साबित होगा। बहरहाल आडवाणी बहुआयामी, व्यापक-विविध प्रतिभाओं के राजनेता रहे हैं। वह छोटी-सी उम्र में आरएसएस के प्रचारक बने, पत्रकारिता भी की, सशक्त लेखक भी रहे, अध्ययनशील ताउम्र रहे और देश के उपप्रधानमंत्री पद तक पहुंचे। गौरतलब यह है कि आडवाणी पर सक्रिय राजनीति के बावजूद एक दाग तक नहीं लगा। वह राजनीति में जिस शुचिता, ईमानदारी, मर्यादा और गरिमा के पक्षधर थे, उन्होंने उन मूल्यों को पूरी शिद्दत से निभाया। आज की राजनीति में ऐसे चमकदार, उजले चेहरे विलुप्त श्रेणी में हैं, लिहाजा आडवाणी को ‘भारत-रत्न’ देना सार्थक और सुखद लगता है।

वह कई बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। संसद के दोनों सदनों के सांसद रहे। लंबे समय तक उन्होंने नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभाई। अब 96 साल की उम्र में वह संन्यास की अवस्था में हैं, तो उनके परिवार का एक भी सदस्य राजनीति या सरकार में नहीं है। ‘भारत-रत्न’ देकर आडवाणी के बेदाग सार्वजनिक जीवन को अलंकृत किया गया है। दरअसल आडवाणी तब भारतीय राजनीति की धुरी बने, जब उन्होंने सोमनाथ मंदिर से अयोध्या तक की रथ-यात्रा निकाली थी। रथ-यात्रा पूरी नहीं हो सकी, लेकिन वह उस दौर की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक यात्रा साबित हुई। आडवाणी ने धर्म को राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, देशभक्ति से जोड़ा। सांप्रदायिक धु्रवीकरण की चिंगारी भी यहीं से भडक़ी। हिंसा का दौर शुरू हुआ और सरकारों ने दमन-चक्र चलाया। नतीजतन राम मंदिर आंदोलन अधिक लामबंद, एकजुट और उग्र होने लगा। कथित बाबरी मस्जिद का विध्वंस कर दिया गया और भारतीय राजनीति का भविष्य भी तय कर दिया गया।

आडवाणी पर मस्जिद तोडऩे या भडक़ाने-उकसाने का आरोप पूर्वाग्रह हैं, क्योंकि तमाम रिकॉर्ड संरक्षित हैं कि उन्होंने और विहिप के अशोक सिंघल आदि ने कारसेवकों को मस्जिद पर चढऩे और उसे क्षति पहुंचाने को रोकने के आह्वान किए थे, लेकिन रामभक्तों के रोष, आक्रोश, आक्रामकता ने किसी की नहीं सुनी। शायद यही नियति थी! एक तरह से अच्छा ही हुआ, क्योंकि सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद यह विवादास्पद अध्याय ही बंद हो गया। अब तो राम मंदिर का एक हिस्सा बन चुका है और उसमें प्रभु श्रीराम की प्राण-प्रतिष्ठा भी की जा चुकी है। दरअसल यही वह दौर था, जब आडवाणी भाजपा के शिल्पकार साबित हुए और 1996 में पार्टी लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी। तब से आज तक भाजपा सर्वोच्च ही रही है। अब तो अकेले दम पर भी पार्टी को ऐतिहासिक जनादेश हासिल है। आडवाणी भाजपा के संगठन-पुरुष थे। उन्होंने पार्टी में नेताओं की दूसरी पीढ़ी तैयार की। प्रधानमंत्री मोदी भी उसी पीढ़ी के सदस्य रहे हैं।

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