राजनीति

वोट के बदले खैरात या विकास की कीमत, चुनावी मौसम में 1 लाख करोड़ का सवाल

फिर आया चुनावों का मौसम सो फिर आया मौसम खैरात बांटने का। दूसरे नजरिए से देखा जाए, तो कह सकते हैं कि मौसम है वोटों को खरीदने का। हर चुनाव में ऐसा लगता है कि राजनेताओं की खैरात का बिल और लंबा होता जा रहा है और वोट के दाम महंगे होते जा रहे हैं। राजनीतिक दल पैसा अपना लगाते इस चुनावी रिश्वत पर, तो शायद एतराज मेरे जैसे लोग बिल्कुल नहीं करते, लेकिन यह पैसा जब बांटा जाता है उन राजनीतिक दलों द्वारा जिनकी सरकारें होती हैं किसी राज्य में, तो खैरात करदाताओं के पैसों से बंटती है, इसको मैं गलत भी मानती हूं और राष्ट्रविरोधी भी। यही कारण है कि मैं इसके बारे में तकरीबन हर चुनावी मौसम में लिखती हूं।

यह जो पैसा बांटा जाता है हर चुनाव से पहले, वह किसी जादुई पैसों के पेड़ से नहीं आता है। यह पैसा आता है राष्ट्र निर्माण की उन योजनाओं से जो देश में असली परिवर्तन ला सकती हैं। युद्ध के इस दौर में क्या केरल में खैरात पर सत्रह हजार करोड़ से लेकर पच्चीस हजार करोड़ रुपए खर्च करने चाहिए? असम में खैरात पर खैरात की कीमत एक हजार करोड़ रुपए से लेकर पंद्रह सौ करोड़ रुपए है। तमिलनाडु में पैंतीस हजार करोड़ रुपए से लेकर पचास हजार करोड़ रुपए खर्चे जाने का अनुमान है।

ज्यादातर यह सारा पैसा जाता है महिलाओं को महीने का जेबखर्च देने पर, छात्रों को उनकी पढ़ाई के लिए और बसों में सफर मुफ्त करने पर। यानी इस पैसे से केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके बैंक खातों में यह जाता है। ऊपर से इतनी थोड़ी होती है यह रकम कि न इससे कोई कारोबार शुरू किया जा सकता है और न लाभार्थियों को कोई ठोस लाभ होता है।

इस युद्ध ने भारत में खास संकट इसलिए पैदा किया है कि अपने देश में ऊर्जा के तकरीबन सारे साधन हम आयात करते हैं। युद्धविराम अगर कायम नहीं रहता और युद्ध लंबा चलता है, तो विशेषज्ञों को चिंता है कि तेल-गैस के दाम और बढ़ जाएंगे और रुपए की कीमत घटती रहेगी। जिन तीन राज्यों की बात मैंने आज की है, उनका तमाम खैरात का हिसाब लगाया जाए, तो पचासी हजार करोड़ रुपए से लेकर एक लाख करोड़ रुपए से अधिक करदाताओं का पैसा जा रहा है ऐसी चीजों पर, जिनसे देश को कोई फायदा नहीं होता है। फायदा होता है सिर्फ राजनीतिक दलों का और वह भी सिर्फ एक चुनाव के लिए।

उधर है हमारा सबसे बड़ा दुश्मन चीन जो मौन रह कर देख रहा है युद्ध के नजारे। ईरान का तकरीबन नब्बे फीसद तेल चीन खरीदता है और होर्मुज जलमार्ग से अभी भी उसके टैंकर जा रहे हैं इसलिए कि ईरान से उसकी गहरी दोस्ती है, लेकिन युद्ध लंबा चलने से चीन को कोई खास तकलीफ नहीं होने वाली है। इसलिए कि विशेषज्ञों का अनुमान है कि चीन की बीस फीसद ऊर्जा अब आती है सूरज और वायु से। ऊपर से वह बिजली की गाड़ियों के निर्माण में भी सबसे आगे है। अनुमान है कि कुछ श्रेणियों में जितनी बिजली की गाड़ियां यूरोप, जापान और अमेरिका में बनती हैं, उससे ज्यादा बन कर निकलती हैं चीन के कारखानों से।

भारत क्यों इतना पीछे रह गया है उन क्षेत्रों में जहां बनते हैं प्रगति लाने के महत्त्वपूर्ण औजार? क्या इसलिए कि इस नवीकरणीय ऊर्जा पर बहुत खर्चा होता है। इतने पैसे हमारी सरकारों की तिजोरी में बचते नहीं हैं जब खैरात के बिल अदा कर चुके होते हैं? पिछले सप्ताह महाराष्ट्र के सरकारी ठेकेदारों ने हड़ताल पर जाने की धमकी दी इस वजह से कि सरकार उनके बिल अदा नहीं कर पा रही है।

महाराष्ट्र सरकार अपनी ‘लाडली बहनों’ को घर बैठे ही हर महीने पंद्रह सौ रुपए से ज्यादा देती है। इसका सालाना खर्चा करीब पचास हजार करोड़ बनता है। ऐसे में कहां से आएगा ठेकेदारों को देने के लिए पैसा? उनका कहना है कि महाराष्ट्र सरकार उनके कोई 96 हजार करोड़ रुपए देने से कतरा रही है पिछले कुछ सालों से जल जीवन मिशन और ग्रामीण विकास योजनाओं के निर्माण के लिए।

क्या बेहतर न होता अगर हमारे आला राजनेता तय करते कि खैरात पर खर्च कम कर विकास की असली योजनाओं पर निवेश किया जाए? मिसाल के तौर पर वायु और सूरज से ऊर्जा बनाने पर। इस तरह की बातें जब मैं करती हूं देश के आला अधिकारियों से, तो अक्सर जवाब देते हैं कि चीन की तुलना भारत से नहीं होनी चाहिए। एक लोकतांत्रिक देश की तुलना कैसे हो सकती है एक तानाशाही देश के साथ? तानाशाही के फायदे हैं ऐसे मामलों में जरूर, लेकिन मेरा मानना है कि हमारी नीतियां भी इतनी गलत रही हैं कि चीन विकास की दौड़ में हमसे इतना आगे भाग चुका है कि अर्थशास्त्री मानते हैं कि वह भारत से पचास साल आगे है।

चीन हमसे आगे कई क्षेत्रों में है जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता। मेरा मानना है कि विकास, तकनीक और आधुनिकता की दौड़ में भारत पीछे रह गया है कुछ इसलिए कि हमारे देश में चुनावों का मौसम हर साल आता है और कुछ इसलिए कि हमारे अर्थशास्त्रियों ने सरकारों को गलत चीजों पर पैसा खर्च करने से कभी नहीं रोका है। न ही हम मीडिया वालों ने ठीक से चौकीदारी की है, वरना बहुत पहले हमको सरकारों को सावधान कर देना चाहिए था कि हमारा पैसा वोट खरीदने पर न बर्बाद किया जाए।

अब जब अच्छे दिनों का मौसम सारी दुनिया से गायब होता दिख रहा है, तो क्या यह सही समय नहीं है कि प्रधानमंत्री चुनाव प्रचार से थोड़ी फुर्सत निकाल कर अपने आला अधिकारियों से मिल कर पूछें कि चीन क्यों इतना आगे बढ़ गया है। यहां याद रखना यह भी जरूरी है कि 1990 तक चीन और भारत विकसित होने की इस दौड़ में बराबर चल रहे थे।

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर प्रदेश के अग्रणी राजनीतिक दलों ने अपने घोषणापत्रों में कल्याणकारी योजनाओं के मद में वित्तीय सहायता के साथ-साथ रोजगार पर केंद्रित वादे शामिल किए हैं। घोषणापत्रों में किए गए वादों में विकास बनाम निशुल्क कल्याणकारी के दम पर दोनों प्रमुख दल सत्ता में काबिज होने की पुरजोर कोशिश में जुटे हैं।

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