लेख

अमरीका में भारतीयों के बुरे दिन

2023 में अमरीका के कोलेरेडो विश्वविद्यालय में एक दम्पति, आदित्य प्रकाश और उर्मि भट्टाचार्य पीएच.डी. कर रहे थे। वे वहां अपना लंच ओवन में गर्म कर रहे थे। खाने में पालक-पनीर था। लेकिन विश्वविद्यालय के कर्मचारियों ने उन्हें खाना गर्म करने से रोक दिया। उनका कहना था कि इसमें से बदबू आ रही है, इसलिए इसे यहां गर्म नहीं किया जा सकता। यह भी कि हम तो यहां ब्रोकली भी गर्म नहीं करने देते। इस बात की शिकायत विश्वविद्यालय प्रशासन से की गई। उर्मि वहां शिक्षिका भी थीं। उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। दोनों को पीएच.डी. की डिग्री भी नहीं दी गई।  तब इन दोनों ने न्यायालय में शिकायत की कि मामूली-सी बात को इतना बड़ा बना दिया गया। उन्हें तरह-तरह से तंग किया गया और डिग्री भी नहीं मिली। अदालत ने प्रशासन को आदेश दिया कि इस दम्पति को दो लाख डालर मुआवजे के रूप में दे। उनकी पीएच.डी. की डिग्री भी दी गई। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन ने हमेशा के लिए अपने यहां उन्हें बैन कर दिया। जिस मामले में इन दोनों का कोई दोष नहीं था, उसके लिए इन्हें इस तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा।

याद रहे कि यह ट्रम्प के दोबारा सत्ता में आने से पहले की बात है। इन दिनों वहां प्रशासन लगातार भारतीयों पर हमलावर है। कहा जा रहा है कि नौकरियां सिर्फ अमरीकी लोगों को ही दी जाएं। इनमें भी बिना कहे गोरों को प्राथमिकता दी जाए। पिछले दिनों टैक्सास विश्वविद्यालय में भी ऐसी ही गाइडलाइंस भेजी गईं। अब तक लोग समझ रहे  थे कि एच1 बी वीजा के शिकार सिर्फ आई.टी. सैक्टर के लोग ही बनेंगे, मगर अब यूनिवॢसटीज भी इससे नहीं बच रहीं। जिस अमरीका ने पूरी  दुनिया को अस्मिता मूलक विमर्श के चश्मे से देखने की आदत डाल दी, अब वही इससे पांव खींच रहा है।  वे इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि यदि अमरीका में लोग इतने ही मेहनती होते, तो बाहर के लोगों को बुलाने की जरूरत ही क्यों पड़ती। कुछ समय पहले बिल गेट्स ने कहा था कि अगर हम भारतीयों को रोकेंगे, तो वे अपना गूगल खुद बना लेंगे। लेकिन नफरती नेताओं को यह बात भला क्यों समझ में आने लगी।  प्रशासन की शह पाकर इन दिनों अमरीका में भारतीयों के खिलाफ लगातार घृणा फैलाई जा रही है। उन पर हमले बोले जा रहे हैं। पीछा किया जा रहा है। बच्चों को स्कूलों में परेशान किया जा रहा है। लोग दीवाली मनाने की शिकायत कर रहे हैं।

भारतीयों के खिलाफ नारे लगाए जा रहे हैं कि अपने देश वापस जाओ। उनके बारे में तरह-तरह के दुष्प्रचार किए जा रहे हैं कि वे गोबर खाते हैं। गौ मूत्र पीते हैं। वे अमरीका को बर्बाद करने के लिए आए हैं। यह कोई नई बात नहीं है। कई साल पहले पोलैंड में घूमते एक भारतीय को एक अमरीकी ने रोककर कहा था कि तुम यहां भी आ पहुंचे। अपने देश वापस जाओ। दरअसल जब सरकारों के पास अपने वोटरों को देने के लिए कुछ नहीं होता, तो वे वैमनस्य के विचारों और नारों को हवा देती हैं। लोगों को एक-दूसरे से लड़वाकर नेता चांदी काटते हैं।

जोहरान ममदानी जब न्यूयार्क के मेयर का चुनाव जीते, उस समय यह लेखिका न्यूयार्क में ही थी। जिस वल्र्ड ट्रेड सैंटर को 9/11 को तोड़ा गया था, वह अब दोबारा बन गया है। उसके नीचे खड़ी यही सोच रही थी कि इसे तोडऩे में आप्रवासियों का ही हाथ बताया गया था लेकिन अब क्या हुआ कि ममदानी के खिलाफ लगातार दिए बयानों के बावजूद, वह जीत गए। ध्यान से देखें, तो न्यूयार्क में बाहर से आए  लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। पिछले दिनों जिस तरह से आप्रवासियों को निशाना बनाया गया, इससे उनमें असुरक्षा की भावना बढ़ी। उन्हें लगा कि ममदानी उनके पक्ष में लगातार बोलते हैं, उनकी समस्याओं को उठाते हैं, इसलिए उन्हें जिता दिया। 

अमरीका, अमरीकी लोगों के लिए ही है, यह बात तो ठीक है, लेकिन खुद अमरीका के गोरे वहां के मूल निवासी नहीं हैं। वे भी बाहर से आए  और उन्होंने वहां के मूल निवासियों को तहस-नहस कर दिया।  ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का जो नारा दिया गया है, अर्से से भारतीय उसी में योगदान दे रहे हैं। सिलिकॉन वैली को सफल बनाने में भारतीयों का ही बड़ा हाथ है। भारतीय डाक्टरों को अमरीका में बहुत पसंद किया जाता है, क्योंकि उनके बारे में माना जाता है कि वे मरीजों की बात सुनते हैं, उन्हें ढांढस भी बंधाते हैं। जबकि अमरीका में आम डाक्टर का 3 महीने से पहले टाइम भी मिलना मुश्किल होता है। अस्पताल में जाना पड़े, तो बहुत देर बाद ही चिकित्सकीय सहायता मिल पाती है। इन सब बातों को देखकर सत्तर के दशक की याद आती है। जब युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन ने पीढिय़ों से रह रहे भारतीयों को वहां से खदेड़ा था। उनके बैंक अकाऊंट भी फ्रीज कर दिए गए थे। उस समय ईदी अमीन के अत्याचार बहुत सुर्खियां भी बने थे। अमरीका एक उदार देश रहा है। उसकी यही छवि उसे महान भी बनाती है। लेकिन ऐसा महसूस होता है कि पूरे विश्व में अब उदारता के दिन लद गए हैं।-क्षमा शर्मा

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