संपादकीय

बाबरी बनाम राम मंदिर

तृणमूल कांग्रेस के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने कुछ मुस्लिम चेहरों के साथ बाबरी मस्जिद की नींव रखी, तो दूसरी तरफ बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस, बाबा बागेश्वर और कई साधु-संतों ने, एक व्यापक जन-सैलाब के साथ, ‘गीता पाठ’ किया। बाबरी मस्जिद से 11 किमी की दूरी पर ‘बहरामपुर’ में राम मंदिर बनाने का उद्घोष किया गया। इन दोनों फैसलों और कर्मकांडों का धार्मिक आस्था से कोई सरोकार नहीं है। ये सांप्रदायिक, हिंदू बनाम मुसलमान, जमावड़े थे, जिनकी मानसिकता में अप्रैल-मई, 2026 के विधानसभा चुनाव उमड़-घुमड़ रहे थे। बेशक प्रभु श्रीराम समूचे भारत के जनमानस के सबसे अधिक स्वीकार्य और पूजनीय आराध्य हैं। राम के जीवन-चरित पर सबसे अधिक, प्रमुख भाषाओं में, ‘रामायण’ का सृजन किया गया है। यदि हमारे आराध्य का एक और मंदिर बनाया जाता है, तो वह विवादास्पद नहीं हो सकता, क्योंकि बहुसंख्यक हिंदू ‘मूर्ति पूजक’ हैं, लेकिन श्रीराम की जन्मस्थली अयोध्या में आराध्य का भव्य मंदिर बन चुका है। मंदिर के शिखर पर सनातन की प्रतीक ‘धर्म-ध्वजा’ भी सुशोभित की जा चुकी है। देश भर से लाखों श्रद्धालु अपने आराध्य श्रीराम के दर्शन करने और मत्था टेकने अयोध्या जा रहे हैं। राम मंदिर का सम्मान किसी तीर्थ-स्थान से कमतर नहीं है, लिहाजा एक और राम मंदिर के उद्घोष का औचित्य क्या है? देश में आज भी प्रभु राम के असंख्य मंदिर हैं, जहां अनवरत पूजा-पाठ जारी है। बेशक राम के नाम पर धु्रवीकरण और सामुदायिक लामबंदी जरूर की जा सकती है। चुनाव के मद्देनजर उनका महत्व भी निर्णायक है। यकीनन हिंदुओं अथवा ऐसे आस्थावानों के ध्रुवीकरण से भाजपा को चुनावी फायदा सर्वाधिक होता रहा है।

स्वतंत्र भारत में बाबर जैसे विदेशी आक्रांताओं के स्मारक के तौर पर मस्जिद बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। भारत अब एक संप्रभु, लोकतांत्रिक और संवैधानिक राष्ट्र है, उसमें बाबर का स्मारक स्वीकार्य नहीं है। मुस्लिम मस्जिद बनाना चाहते हैं, तो सरकार से बाकायदा इजाजत लें और पैगंबर मुहम्मद के नाम पर मस्जिद बनाएं। किसे आपत्ति होगी? हालांकि राजधानी दिल्ली में ‘बाबर रोड’ आज भी मौजूद है। ऐसे और भी स्मारक बाबर के नाम पर देश में होंगे, लेकिन नए प्रयास, नए शिलान्यास, नए निर्माण को नहीं होने देना चाहिए। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को कथित बाबरी मस्जिद की नींव नहीं रखने देनी चाहिए थी। भाजपा के जो चेहरे चीखा-चिल्ली कर बाबरी का विरोध कर रहे थे, उन्हें भी नींव का पुरजोर विरोध करना चाहिए था। मुख्यमंत्री को अपने ही बागी विधायक को गिरफ्तार कराना चाहिए था, लेकिन बाबरी मस्जिद की प्रतीकात्मक नींव रख दी गई और वह तबका अपनी सांप्रदायिकता में कामयाब रहा। ममता को मुर्शिदाबाद की 24 विधानसभा सीटों पर 65 फीसदी से ज्यादा मुसलमानों के वोट की चिंता थी, तो ममता हिंदुओं के वोट भी छोड़ नहीं सकती थी। बंगाल में 35-40 फीसदी हिंदू वोट ममता की पार्टी के पक्ष में भी जाते हैं, लिहाजा मुख्यमंत्री ने विधायक को निलंबित ही किया। हुमायूं कबीर ने 6 दिसंबर की तारीख इसलिए तय की थी, क्योंकि 1992 में इसी तारीख को अयोध्या की कथित बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया था। मुसलमानों के एक तबके में आज भी उस घटना के खिलाफ गुस्सा और आक्रोश है। मुसलमान उस विध्वंस को ‘पाक मस्जिद की शहादत’ करार देते हैं। उसी जमीन पर सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ के फैसले के बाद राम मंदिर बना है। अदालत ने मस्जिद की वैकल्पिक जगह जहां देने का भी आदेश दिया था, उसे मुसलमानों ने न तो लिया है, मस्जिद निर्माण तो बहुत दूर की कौड़ी है। मुर्शिदाबाद में जिस बाबरी मस्जिद की कथित नींव रखी गई है, उसके निर्माण को पैसा कहां से आएगा?

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