वायुसेना प्रमुख की चिंता

भारत के वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल अमर प्रीत सिंह ने सार्वजनिक मंच से रक्षा-सौदों की लेटलतीफी पर चिंता जताई है, तो यह कोई सामान्य टिप्पणी या सरोकार नहीं है। सीआईआई के बिजनेस समिट में वायुसेना प्रमुख ने कहा कि ऐसा कोई रक्षा प्रोजेक्ट नहीं है, जो तय समय पर पूरा हुआ हो। जब रक्षा सौदों के करार पर दस्तखत किए जाते हैं, तब जानकारी होती है कि यह प्रोजेक्ट समय पर पूरा नहीं होगा, लेकिन फिर भी हस्ताक्षर कर दिए जाते हैं। यहीं से पूरी प्रक्रिया बिगड़ जाती है। एयर चीफ मार्शल ने यहां तक संकेत दिए हैं कि इसी से युद्ध की तैयारियां प्रभावित होती हैं। वायुसेना प्रमुख ने यह खुलासा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा सचिव आरके सिंह की उपस्थिति में किया है, जाहिर है कि यह चिंता एक बार फिर प्रधानमंत्री मोदी तक पहुंचेगी। प्रधानमंत्री और वायुसेना प्रमुख की रूबरू मुलाकातें भी होती रही हैं। उनमें भी यह मुद्दा उठा होगा। हमारी वायुसेना लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टर और अन्य रक्षा-उपकरणों का संकट और समयहीनता उस परिदृश्य में झेल रही है, जब चीन ने पाकिस्तान को 5वीं पीढ़ी का लड़ाकू विमान जे-35 ए देने की घोषणा की है। चीन ऐसे 30-35 विमान पाकिस्तान को मुहैया कराएगा, जबकि भारतीय सेना के पास 5वीं पीढ़ी का एक भी लड़ाकू विमान नहीं है। दुश्मन को कमतर नहीं आंकना चाहिए। वायुसेना प्रमुख का यह रहस्योद्घाटन तब सार्वजनिक हुआ है, जब भारत की वायुसेना ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान में आतंकियों के बड़े अड्डे ‘मिट्टी-मलबा’ कर चुकी है, करीब 170 आतंकियों को ढेर कर चुकी है और कई प्रमुख एयरबेस, रडार और एयर डिफेंस सिस्टम तबाह कर चुकी है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ हमने अपनी वायु-शक्ति की बदौलत ही जीता है, लिहाजा वायुसेना प्रमुख की ये चिंताएं बेहद गंभीर हैं। चीफ मार्शल पहले भी फरवरी, 2025 में एक टे्रनर जेट के कॉकपिट में बैठे हुए कह चुके हैं कि उन्हें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स (एचएएल) पर भरोसा नहीं है। एचएएल मिशन मोड में काम नहीं कर रही है। बहरहाल अब उन्होंने निजी क्षेत्र की कंपनियों को आगे आने का आह्वान किया है। भारत में 21 निजी कंपनियां रक्षा-उत्पादन के क्षेत्र में सक्रिय हैं, जबकि सरकारी नेतृत्व की 16 सार्वजनिक कंपनियां भी जुड़ी हैं। इस क्षेत्र में कुल 430 अन्य कंपनियों के अलावा सूक्ष्म, लघु, मध्यम उद्यम 16,000 से अधिक हैं, जो रक्षा-उपकरणों के कल-पुरजे बनाते हैं।
इतना व्यापक क्षेत्र होने के बावजूद हमारे लड़ाकू विमान लेटलतीफी के शिकार हैं, जाहिर है कि कारण असामान्य ही होंगे। हालांकि एयर चीफ मार्शल ने न तो किसी प्रोजेक्ट विशेष और न ही कंपनी का नाम लिया, लेकिन यह समयहीनता हमें भारी पड़ सकती है। कुछ उदाहरण गौरतलब हैं। तेजस एमके 1ए हल्के लड़ाकू विमान मई, 2024 तक उपलब्ध होने चाहिए थे। 2021 में एचएएल के साथ 83 विमानों का अनुबंध किया गया था, लेकिन अभी तक एक भी नहीं मिल पाया है। इसी तरह तेजस के अन्य किस्म के विमान का अभी ‘प्रोटोटाइप’ भी नहीं बना है। 2026 तक ऐसे 200 विमान सप्लाई करने का करार किया गया था। विमानों की डिलीवरी में देरी का बुनियादी कारण ‘जीई एयरोस्पेस कंपनी’ का इंजन रहा है, जो स्वदेशी लड़ाकू विमानों में लगना है। वायुसेना ने एचएएल के साथ 70 एचटीटी-40 बेसिक टे्रनर विमानों के लिए भी अनुबंध पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस विमान को इसी साल सितंबर तक सेना में शामिल किया जाना है, लेकिन लेटलतीफी के कारण ऐसा संभव नहीं लगता। आज हम करीब 65 फीसदी रक्षा-उपकरणों का उत्पादन भारत में करते हैं। वायुसेना प्रमुख इतना ही पर्याप्त नहीं मानते। वह कहते हैं कि डिजाइन और डिवेलपमेंट भी भारत में ही होना चाहिए, लेकिन डीआरडीओ शोध और विकास की गति बढ़ाने में असमर्थता व्यक्त कर रहा है, क्योंकि उसे कुल रक्षा बजट का मात्र 5 फीसदी हिस्सा ही मिलता है। वायुसेना प्रमुख का मानना है कि कंपनियों और डीआरडीओ का आउटपुट आगामी 10 सालों में खूब बढऩा चाहिए। जो आज करना है, उसे आज ही किया जाना चाहिए। हमें भविष्य की तैयारियों के लिए आज ही तैयार होना होगा।



