दरवाजे पर एआई

कृत्रिम बौद्धिकता (एआई) नए युग का यथार्थ है। वह नए किस्म का इनसान है, लिहाजा मानवता का पूरक है। एआई से हमारे युवाओं की नौकरियां छिनेंगी, यह धारण मिथ्या है। एआई मानवता के लिए कोडिंग रच रहा है। स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि से लेकर राजनीति, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और समाज में एआई कारगर भूमिकाएं निभा रही है। यह प्रौद्योगिकी सिर्फ अमरीका और यूरोपीय देशों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि चीन 71,000 करोड़ रुपए का निवेश कर रहा है। चीन के एआई प्रयोग ने अमरीका की नींद उड़ा दी है। भारत में भी राष्ट्रीय एआई मिशन के जरिए एआई का भाषायी मॉडल तैयार किया जा रहा है। भारत अपना अनुभव और विशेषज्ञता दुनिया से साझा करने को तैयार है। प्रधानमंत्री मोदी ने एआई के पेरिस शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए आश्वस्त किया कि तकनीक कभी भी इनसानों की जगह नहीं ले सकती। जिस तरह कम्प्यूटर इनसान का विकल्प नहीं बन पाया, बल्कि इनसान का एक तकनीकी हथियार है। एआई तकनीक को लोकतांत्रिक बनाना होगा। इतिहास गवाह है कि तकनीक से नौकरियां और काम कभी विलुप्त नहीं हुए। अलबत्ता उनकी प्रकृति जरूर बदल रही है। नए किस्म की नौकरियों और रोजगार का सृजन हो रहा है, लिहाजा निवेश के साथ-साथ लोगों के कौशल को भी निखारना होगा। एआई भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, तभी प्रधानमंत्री मोदी को पेरिस शिखर सम्मेलन की सह-अध्यक्षता करने का अवसर मिला। अगला शिखर सम्मेलन भारत में ही, इसी साल के अंत में, आयोजित किया जाएगा। एआई से आम आदमी खुद को अछूता न समझे, क्योंकि यह प्रौद्योगिकी किसी भी दिन आपके दरवाजे पर दस्तक दे सकती है।
आपकी जिंदगी की सारथी बन सकती है, लिहाजा एआई को ग्रहण करने की मानसिकता बना लीजिए। प्रधानमंत्री मोदी ने एआई के खतरों, जोखिमों, साइबर अपराध और सुरक्षा, आपसी विश्वास की बात भी कही है। उन्होंने एआई के क्रियान्वयन और पहुंच को सभी के लिए खुली और उपलब्ध रखने का आह्वान भी किया। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘ग्लोबल साउथ’ की पैरवी की कि एआई उन देशों तक जरूर पहुंचनी चाहिए। बेशक उनकी क्षमताएं कम हैं, कम्प्यूटर पॉवर कम है, प्रतिभाओं और डाटा का अभाव है और आर्थिक संसाधन भी पर्याप्त नहीं हैं, लेकिन एआई का सर्वव्यापी, विकसित, ओपन सोर्स के तौर पर तभी विस्तार संभव है। फ्रांस के राष्ट्रपति एवं शिखर सम्मेलन के सह-अध्यक्ष इमैनुअल मैक्रों और अमरीका के उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस सरीखे वैश्विक नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी की बात पर सहमति जताई, लेकिन मैक्रों ‘ग्लोबल नॉर्थ बनाम ग्लोबल साउथ’ के तौर पर दुनिया को बांट कर देखने के पक्ष में नहीं हैं, लिहाजा तय किया गया कि एआई का वैश्विक तंत्र तैयार किया जाए। एआई फाउंडेशन और टिकाऊ परिषद बनाने पर निर्णय लिया गया। तंत्र विश्वसनीय, पारदर्शी और पूर्वाग्रहों से मुक्त होना चाहिए। इसके गवर्नेंस के लिए मानक बनाने को एकजुट होना चाहिए, ताकि एआई के खतरों को चिह्नित कर विश्वास कायम किया जा सके। एआई ओपन सोर्स बनाम क्लोज्ड सोर्स में बंटी है। दरअसल क्लोज्ड सोर्स में एआई कोड पर किसी का मालिकाना हक होता है। वह केवल डेवलपर्स या उसे तैयार करने वाली कंपनी के लिए ही सुलभ होता है, लिहाजा एआई की पहुंच और नियंत्रण के दो अलग आयाम हैं। इन सबके अलावा कार्बन फुटप्रिंट का मुद्दा बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील है। एआई की खपत से कार्बन उत्सर्जन होते हैं। जैसे-जैसे डाटासेट और मॉडल जटिल होते जाते हैं, एआई को प्रशिक्षित और संचालित करने के लिए बहुत अधिक ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। यह डिजीटल का युग है, तो एआई का स्वागत करना चाहिए।



