संपादकीय

एक साथ चुनाव का बेतुका विरोध…

यदि एक बार फिर देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ होने लगें तो उसमें किसी को भला क्यों परेशानी होनी चाहिए, क्योंकि 1967 के बाद तो देश में साक्षरता से लेकर संचार के साधनों का काफी विस्तार हुआ है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है। आज राजग विरोधी दल और उनके नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि एक साथ चुनाव कराने पर केंद्र में सत्तासीन राष्ट्रीय दल और उसके शीर्ष नेता में एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति पनपने का खतरा बढ़ेगा।

एक साथ चुनाव कराने के विरोध में तरह-तरह के तर्क गढ़ने वाली कांग्रेस यह कह रही है कि वह संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ होगा। दूसरी ओर कांग्रेस बार-बार यह तर्क दोहराती रहती है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस देश में मजबूत लोकतंत्र की नींव डाली। यानी तब एक साथ चुनाव कराने से लोकतंत्र मजबूत होता था तो आज वही काम करने से वह कमजोर कैसे हो जाएगा?

संविधान निर्माताओं को इस देश के मतदाताओं के विवेक पर पूरा भरोसा था। उन्हें यह अनुभूति थी कि मतदाता राष्ट्रीय हितों के साथ ही अपने राज्य के हितों का भी ध्यान रख सकते हैं। इसीलिए संविधान में ‘एक राष्ट्र और अलग-अलग चुनाव’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं की, क्योंकि एक साथ चुनाव से उन्हें संघवाद पर कोई खतरा नजर नहीं आया।

उसमें सुधार अब समय की जरूरत है। संविधान निर्माता जानते थे कि देश के मतदातागण इतने विवेकशील हैं कि वे एक ही चुनाव के समय लोकसभा के लिए एक पार्टी और उसी चुनाव में विधानसभा के लिए दूसरी पार्टी को वोट दे सकते हैं। स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्व उप-प्रधानमंत्री जगजीवन राम कहा करते थे कि ‘तमाम भारतीय मतदाता भले निरक्षर हैं, पर वे बेवकूफ नहीं हैं।’

वर्ष 1957 के चुनाव में केंद्र में जहां कांग्रेस सरकार कायम रही, वहीं केरल में पहली बार गैर-कांग्रेसी कम्युनिस्ट सरकार बनी। यह सिलसिला समय के साथ और तेज हुआ। वर्ष 1967 आखिरी ऐसा अवसर था जब केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ हुए थे। तब केरल सहित सात राज्यों के विधानसभा चुनावों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जिनमें से एक राज्य बिहार भी था।

तब बिहार में लोकसभा की 53 सीटें थीं। उनमें से 34 सीटें यानी आधी से अधिक कांग्रेस को मिली थीं, मगर विधानसभा चुनाव में उसे बहुमत नहीं मिल सका। यानी बिहार की जनता ने लोकसभा के लिए तो कांग्रेस को वोट दिए, लेकिन विधानसभा चुनाव में गैर-कांग्रेसी सरकार चुनी। तब क्या किसी ने संघीय ढांचे के कमजोर होने का शोर मचाया था।

ऐसे में, यदि एक बार फिर देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ होने लगें तो उसमें किसी को भला क्यों परेशानी होनी चाहिए, क्योंकि 1967 के बाद तो देश में साक्षरता से लेकर संचार के साधनों का काफी विस्तार हुआ है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है। आज राजग विरोधी दल और उनके नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि एक साथ चुनाव कराने पर केंद्र में सत्तासीन राष्ट्रीय दल और उसके शीर्ष नेता में एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति पनपने का खतरा बढ़ेगा।

वर्ष 1967 और 1971 के चुनावों के बाद के राजनीतिक विकास की जिन्हें गहरी जानकारी है, वे ऐसी बेतुकी दलील कतई नहीं देंगे। जब 1967 में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए तब इंदिरा गांधी ही प्रधानमंत्री थीं। उस चुनाव के बाद भी इंदिरा गांधी ही प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन उनमें 1967 से 1971 तक एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति नहीं बढ़ी थी, क्योंकि तब तक कांग्रेस पार्टी में ही एक हद तक आंतरिक लोकतंत्र कायम था।

इंदिरा सरकार 1969 से 1971 तक अपने अस्तित्व के लिए दूसरे दलों पर भी निर्भर थी। यहां तक कि इंदिरा गांधी 1967 के चुनाव में पूर्व रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन तक को लोकसभा का टिकट नहीं दिलवा सकीं। जबकि वह 1962 के चुनाव में बंबई (अब मुंबई) की एक लोकसभा सीट से जीतकर आए थे। तब कांग्रेस संगठन मेनन के खिलाफ था।

हालांकि 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतकर आईं तो उनमें एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई। यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ी कि सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को भी लग गया कि यह देशहित में नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी के एकाधिकारवाद पर एक लंबा लेख लिख दिया।

उसी लेख के कारण जेपी से प्रधानमंत्री कुपित रहने लगीं। यह जेपी आंदोलन के शुरू होने से पहले की बात है। इसी पृष्ठभूमि में किसी कार्य से जेपी ने पटना से दिल्ली पहुंचकर जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने की कोशिश की तो श्रीमती गांधी ने उन्हें कहलवा दिया कि वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल से मुलाकात कर लें। जेपी गुजराल से मिले बिना पटना लौट गए।

अब जो प्रतिपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि एक साथ चुनाव से प्रधानमंत्री में एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो वे 1971 के सत्ताधारी दल और आज के सत्ताधारी दल की बनावट एवं प्रवृत्ति में अंतर नहीं देख पा रहे हैं। फिर यदि ऐसी कोई प्रवृत्ति उभरती भी है तो मतदाता उसका जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं।

एक साथ चुनाव कराने के विरोध में तरह-तरह के तर्क गढ़ने वाली कांग्रेस यह कह रही है कि वह संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ होगा। दूसरी ओर वही कांग्रेस बार-बार यह तर्क दोहराती रहती है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस देश में मजबूत लोकतंत्र की नींव डाली। यानी तब एक साथ चुनाव कराने से लोकतंत्र मजबूत होता था, तो आज वही काम करने से वह कमजोर कैसे हो जाएगा? जबकि तब की अपेक्षा आज के भारतीय मतदाता अधिक जागरूक हैं।

कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि फिर से एक साथ चुनाव की व्यवस्था से इंदिरा गांधी के उस विवादास्पद फैसले के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा, जिसके तहत उन्होंने 1971 में अलग से लोकसभा का चुनाव कराया था, जिसके पीछे उनका निजी स्वार्थ था। उनकी सरकार सीपीआइ और डीएमके जैसे दलों के सहारे आराम से चल रही थी।

उस पर कोई खतरा नहीं था, लेकिन वह इन दलों के दबाव से जल्द मुक्त होना चाहती थीं। सीपीआइ आदि के दबाव के कारण वह न तो खुद एकाधिकारवादी बन पा रही थीं न ही अपने पुत्र संजय गांधी के लिए कार संयंत्र की स्थापना करवा पा रही थीं। संजय गांधी ने लंदन के एक कार कारखाने में कुछ समय तक प्रशिक्षण भी लिया था।

संजय की बड़ी इच्छा थी कि वह भारत में कारखाने की स्थापना करें। संजय ने अपने नाना के सिरहाने से हेनरी फोर्ड की किताब निकाल कर पढ़ी थी, जिससे उन्हें इसके लिए प्रेरणा मिली थी। इस बीच 1969 में कांग्रेस के महाविभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का लुभावना नारा गढ़ने के साथ ही कुछ लोकलुभावन काम भी किए।

1971 के चुनाव में जीत के बाद इंदिरा गांधी गरीबी हटाने का अपना वादा तो भूल गईं, लेकिन अपने पुत्र संजय के कारखाने का सपना जरूर पूरा किया। उसके मूल में अलग-अलग चुनाव कराने की जो एक विसंगति आरंभ हुई, उसे दूर करना मौजूदा सरकार का दायित्व है।

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