जब पहाड़ एक जाल बन जाते हैं : मानसून सुरक्षा योजना की आवश्यकता क्यों

हर साल मानसून हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में हरी-भरी घाटियों, भरी हुई नदियों और शानदार परिदृश्यों के वादे के साथ आता है और हर साल लगभग एक जानी-पहचानी पटकथा की तरह, वही त्रासदी सामने आती है-सड़कें भूस्खलन के नीचे गायब हो जाती हैं, पुल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, नदियां खतरनाक रूप से उफनने लगती हैं, पर्यटक फंस जाते हैं और संवेदनशील ढलानों पर रहने वाले परिवार रातें जागकर यह सोचते हुए बिताते हैं कि उनके ऊपर का पहाड़ टिकेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि हम अभी भी इतनी बार इसके लिए तैयार क्यों नहीं मिलते? समस्या का पैमाना इस साल फिर से दिखाई दे रहा है। हिमाचल प्रदेश में मानसून से होने वाली मौतें और नुकसान पहले ही खतरनाक स्तर पर पहुंच चुके हैं, जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 15 अगस्त तक 183 मौतें और 972 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान दर्ज किया गया है। उत्तराखंड में भूस्खलन और मलबे के कारण दर्जनों सड़कें बार-बार बंद हो चुकी हैं। जुलाई में एक समय पर 69 सड़कें पूरी तरह से बंद थीं।
ये केवल आंकड़े नहीं हैं। हर अवरुद्ध सड़क के पीछे एक परिवार अस्पताल नहीं पहुंच पा रहा, एक दुकानदार को आपूर्ति नहीं मिल पा रही, एक होटल व्यवसायी अपनी बुकिंग खो रहा है, एक किसान अपनी उपज को बाजार नहीं ले जा पा रहा और एक पर्यटक यह सोच रहा है कि आगे की सड़क सुरक्षित है या नहीं। सबसे बड़ी विफलता यह है कि मानसून कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। सरकारों को महीनों पहले से पता होता है कि जून से सितम्बर तक भारी बारिश होगी। वे जानती हैं कि कौन-सी सड़कें संवेदनशील हैं। वे जानती हैं कि पिछले भूस्खलन कहां हुए थे। वे जानती हैं कि कौन-सी ढलानें अस्थिर हैं और कौन-से पुल तथा जल निकासी प्रणालियां बार-बार विफल होती हैं। फिर भी अधिकांश प्रतिक्रिया आपदा आने के बाद ही शुरू होती है। सड़कें बंद होने के बाद साफ की जाती हैं। ढलानों के ढहने के बाद रिटेनिंग दीवारों पर चर्चा होती है। सड़कों पर पानी भरने के बाद नालियों की सफाई की जाती है। सैंकड़ों लोगों के पहले से ही सड़कों पर होने के बाद पर्यटकों को यात्रा न करने की चेतावनी दी जाती है।
बदलाव के उत्साहजनक संकेत भी मिल रहे हैं। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का कहना है कि उसने हिमाचल प्रदेश में संवेदनशील हिस्सों की पहचान कर ली है और ढलान स्थिरीकरण, रिटेनिंग दीवारों, जल निकासी सुधार और कटाव-रोधी कार्य किए हैं। उत्तराखंड ने चार धाम मार्ग के कुछ हिस्सों पर उपग्रह-आधारित प्रणालियों सहित उन्नत भूस्खलन-निगरानी तकनीक का उपयोग करना भी शुरू कर दिया है। लेकिन ऐसे उपायों को नियमित बनना चाहिए। तैयारी पहली भारी बारिश से पहले शुरू होनी चाहिए।
पहली आवश्यकता हर संवेदनशील पहाड़ी सड़क का एक उचित मानसून-पूर्व ऑडिट है। सड़कों का निरीक्षण केवल गड्ढों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इंजीनियरों को ढलानों, जल निकासी, कलवर्ट, रिटेङ्क्षनग दीवारों, पुलों और उन क्षेत्रों की जांच करनी चाहिए जहां पहले भूस्खलन हो चुके हैं। जल निकासी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जो पानी सुरक्षित रूप से बाहर नहीं निकल सकता, वह पहाड़ से होकर अपना रास्ता खुद बना लेगा। यह मिट्टी को संतृप्त करता है, दबाव बढ़ाता है और एक दिखने वाली स्थिर ढलान को मिट्टी और चट्टान के बहते हुए द्रव्यमान में बदल सकता है। पहाड़ लाखों आगंतुकों को आकॢषत करते हैं और पर्यटन कई पहाड़ी समुदायों की आर्थिक जीवन रेखा है। अकेले मसूरी में 2024 में 21 लाख से अधिक आगंतुक दर्ज किए गए। जब सड़कें बंद होती हैं, तो पर्यटकों को परेशानी होती है लेकिन उन लोगों को भी होती है जिनकी आजीविका उन पर निर्भर करती है। होटलों की बुकिंग रद्द हो जाती है। रेस्तरां खाली रहते हैं। टैक्सी चालकों की आय के दिन बंद हो जाते हैं। स्थानीय उत्पाद बेचने वाले दुकानदारों के ग्राहक गायब हो जाते हैं। गाइड, पोर्टर और छोटे होमस्टे तुरंत प्रभावित होते हैं।
साथ ही, पर्यटक शिकार बन सकते हैं क्योंकि वे अक्सर भूगोल को नहीं समझते। एक सड़क, जो पूरी तरह से सुरक्षित प्रतीत होती है, अचानक गिरती हुई चट्टानों या भूस्खलन से अवरुद्ध हो सकती है। कोई परिवार सड़क बहने से खुद को घंटों या दिनों के लिए फंसा हुआ पा सकता है। इसलिए पर्यटकों के लिए एक बहुत मजबूत चेतावनी प्रणाली होनी चाहिए-सड़क-स्थिति की लाइव जानकारी, अत्यधिक वर्षा के दौरान अनिवार्य अलर्ट, किन मार्गों से बचना चाहिए, इस पर स्पष्ट सलाह और जोखिम वास्तव में अधिक होने पर पर्यटकों की आवाजाही पर अस्थायी प्रतिबंध।
अनियोजित निर्माण समस्या को और बदतर बना देता है। ढलानों को काटना, पर्याप्त जल निकासी के बिना सड़कों का निर्माण करना, अत्यधिक निर्माण और भूवैज्ञानिक स्थितियों की अनदेखी करना पहले से ही नाजुक भूभाग को कमजोर कर सकता है। इसलिए विकास को प्रत्येक घाटी और ढलान की वहन क्षमता के अनुसार होना चाहिए। निर्माण की अनुमति भूवैज्ञानिक और पर्यावरणीय सुरक्षा के आधार पर दी जानी चाहिए। यदि कोई सड़क हर साल एक ही ङ्क्षबदू पर बह जाती है, तो इसका उत्तर केवल हर साल इसे फिर से बनाना नहीं हो सकता। यदि कोई ढलान बार-बार ढह जाती है, तो सवाल यह होना चाहिए कि यह क्यों ढह रही है और क्या सड़क को फिर से डिजाइन करने की आवश्यकता है। यदि कोई बस्ती बार-बार बाढ़ की चपेट में आती है, तो अंतहीन मुआवजा देने की तुलना में पुनर्वास या सुरक्षात्मक इंजीनियरिंग अधिक समझदारी भरा कदम हो सकता है।
भारत के हिमालयी राज्यों को मौसम पूर्वानुमान, भूवैज्ञानिक मैपिंग, उपग्रह निगरानी, स्थानीय चेतावनी प्रणालियों, मजबूत जल निकासी, ढलान स्थिरीकरण, सुरक्षित निर्माण और तेजी से निकासी योजनाओं को मिलाकर एक स्थायी मानसून लचीलापन कार्यक्रम की आवश्यकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्थानीय लोगों को इस प्रणाली का हिस्सा होना चाहिए। वे जानते हैं कि कौन-सी ढलानें खिसकती हैं, कौन-सी नदियां पहले उफनती हैं और कौन सी सड़कें खतरनाक हो जाती हैं। आधुनिक तकनीक के साथ उनका ज्ञान जान बचा सकता है।
पहाड़ों में अच्छे शासन का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि सरकार भूस्खलन के बाद सड़क को कितनी जल्दी साफ करती है। यह होना चाहिए कि क्या उसने उस भूस्खलन को आपदा बनने से रोकने के लिए पहले ही पर्याप्त उपाय किए थे?-देवी एम. चेरियन



