मनोरंजन

नोलन की फिल्म ‘द ओडिसी’ को टक्कर देती एक फ्रांसीसी फिल्म

साल की सबसे बड़ी राजनीतिक फिल्म एक ओडिसी (महाकाव्य यात्रा) की कहानी बयां करती है कि निर्वासन में जी रहा एक अनुभवी योद्धा, अपने परिवार और देश लौटने को बेताब, नरसंहार, प्रतिशोध और विद्रोह के बीच असंभव बाधाओं से जूझती सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व करता है। नहीं, यह क्रिस्टोफर नोलन की ‘द ओडिसी’ नहीं, बल्कि ला बटाईल डी गॉल है-चाल्र्स डी गॉल पर आधारित दो भागों वाला द्वितीय विश्व युद्ध का एक ड्रामा, जिसने चुनावों से एक साल पहले फ्रांस में तहलका मचा दिया है। 320 मिनट की अवधि वाली इस जोड़ीदार फिल्म ने फ्रांसीसी सिनेमाघरों में 40 लाख टिकट बेचे हैं, जो अब अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उतरने के लिए तैयार है।

स्वदेश में फिल्म की सफलता में यह बात भी मददगार साबित हुई कि 1940 में जब देश की सेना और नैतिकता ढह गई थी, तब डी गॉल द्वारा आत्मसमर्पण करने से इंकार की कहानी वीरता का वह सच्चा प्रदर्शन है, जिसकी फ्रांसीसी जनता शायद तलाश कर रही थी, खासकर तब, जब वे संभावित रूप से एक धुर-दक्षिणपंथी राष्ट्रपति पद की ओर बढ़ रहे हैं, जो डी गॉल के ‘पांचवें गणराज्य’ की ऐसी परीक्षा लेगा जैसी पहले कभी नहीं हुई।

ट्रम्प के इस दौर में इसका एक ट्रांस-अटलांटिक पहलू भी है। निर्देशक एंटोनिन बौद्री-जो एक पूर्व राजनयिक हैं और जिन्होंने अमरीका-ईराक युद्ध का विरोध करने वाले डोमिनिक डी विलेपिन के भाषण का सह-लेखन किया था-ने द्वितीय विश्व युद्ध के फिल्म फॉर्मूले को पूरी तरह से गैर-अमरीकी बनाकर एक जोखिम उठाया है। युद्ध के मैदान डनकर्क या ओमाहा बीच नहीं, बल्कि लीबिया और ट्यूनीशिया हैं। नोलन की द ओडिसी को लेकर उत्साहित अमरीकी यूट्यूबर्स यह देखकर भड़क सकते हैं कि फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट को कैसे चित्रित किया गया है-ठंडा, षड्यंत्रकारी और एक लाचार फ्रांस से मोहभंग वाला, जिसे वे खुद की रक्षा करने में असमर्थ एक ‘बच्चा’ मानते हैं।

बौद्री किसी अंध-प्रशंसा के उबाऊ जाल में फंसे बिना अटलांटिक पार के इस इतिहास को ठीक करने में सफल रहे हैं। इसका श्रेय काफी हद तक एक ब्रिटिश इतिहासकार, जूलियन जैक्सन को जाता है, जो निर्देशक के लिए एक प्रेरणा स्रोत जैसे हैं। फिल्म के डी गॉल कोई सुपरहीरो नहीं हैं, हम एक काल्पनिक दुनिया में खोए, खीझ पैदा करने वाले, परेशान नेता को देखते हैं, जो चॢचल को क्रोध और आंसुओं की हद तक ले जाता है और अपने दृढ़ राजनीतिक कौशल के जरिए फ्रांस के पुनरुद्धार के मिशन को आगे बढ़ाता है।

यह फिल्म ‘फ्री फ्रैंच’ की डी गॉल की छोटी टुकड़ी पर भी प्रकाश डालती है, जिसे चर्चिल ‘फाइटिंग फ्रैंच’ कहते थे। पैरिस में एक युवा महिला प्रतिरोध नेता द्वारा नाजियों पर छुपकर गोलियां चलाने का दृश्य ऐसे समय में अत्यधिक प्रतीकात्मक है, जब यूरोप में अनिवार्य सैन्य भर्ती लौट रही है। इस सब की तुलना नोलन की फिल्म से करें, जो अपने सिसिली के दृश्यों के बावजूद पूरी तरह हॉलीवुड का उत्पाद है-एक विशाल बजट, शीर्ष अमरीकी फिल्मी सितारों की कास्ट और ऐसे विषय, जो मुझे लगता है कि आज के भूमध्यसागरीय क्षेत्र की तुलना में ट्रम्प प्रशासन में अधिक गूंजेंगे। ‘मागा’ समर्थक रोमन गुणों और ग्लेडिएटर जैसे शारीरिक सौष्ठव के प्रति आसक्त हैं लेकिन ‘द ओडिसी’ में दिखाए गए ग्रीक अंधविश्वास और चालाकियां इसमें अधिक सटीक बैठती हैं। एज्रा क्लेन इसे इस दशक की राजनीतिक फिल्म कहते हैं।

मेरा तर्क होगा कि डी गॉल यूरोप की अपनी राजनीतिक ब्लॉकबस्टर है। कुछ लोग तर्क देंगे कि वह बहुत विशेष रूप से एक फ्रांसीसी नायक हैं। फिर भी, जब स्क्रीन पर फ्रांस का वह नक्शा दिखाई देता है, जिसे काटकर अमरीका द्वारा प्रशासित किया गया था, तो क्या यह ग्रीनलैंड पर डोनाल्ड ट्रम्प के मौजूदा दावों से बहुत अलग है? जब रूजवेल्ट युद्ध के बाद के फ्रांस के लिए एक नई मुद्रा डिजाइन और प्रिंट करते हैं, तो क्या यह अमरीकी डॉलर के प्रभुत्व से अलग है? और जब चर्चिल यूरोप के ऊपर खुले समुद्र को चुनने की अपनी रणनीति सामने रखते हैं, तो क्या यह ‘ब्रेग्जिट’ का पूर्वाभास नहीं है? यदि चतुर ओडिसियस आज की दुनिया को समझने के लिए एक उपयुक्त मार्गदर्शक है, तो डी गॉल भी वैसे ही हैं, जिन्होंने ऐसे सपनों और विचारों को साकार किया, जो यथार्थ से परे थे-जैसा कि एक बूढ़े और खंडित होते यूरोप को फिर से करना होगा, यदि वह इस सदी में अपना अस्तित्व बनाए रखना चाहता है।-लियोनेल लॉरेंट

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button