मुस्लिम नहीं कर सकेंगे एक से ज्यादा शादी? बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र से उस याचिका पर जवाब मांगा है जिसमें मुस्लिमों के बीच बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि मुस्लिमों में बहुविवाह संविधान के प्रविधानों का उल्लंघन करता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्या बागची और वी.मोहन की पीठ ने महिलाओं के अधिकारों की कार्यकर्ता जाकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज सहित अन्य द्वारा दायर याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया। पीठ ने इस याचिका को लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से जवाब मांगा
याचिका में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 82 को लागू करने का निर्देश मांगा गया है, जो बहुविवाह को समान रूप से दंडित करती है और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के तहत किसी भी छूट को हटाने की मांग करती है। इसमें केंद्र से बहुविवाह की प्रथा को समाप्त करने के लिए विधायी कदम उठाने और इसे सभी नागरिकों के लिए प्रारंभ से ही अमान्य मानने का निर्देश देने की मांग की गई है, चाहे वे किसी भी धर्म के हों।
याचिका में कहा गया है कि भारत में बहुविवाह की प्रथा, जिसे मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरियत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 द्वारा मान्यता दी गई है, महिलाओं और बच्चों पर गहरा और स्वाभाविक नुकसान पहुंचाती है, गलत धार्मिक रूपांतरण को बढ़ावा देती है और सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक नैतिकता के क्षेत्र में दखल देती है।
बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित करने की मांग
मुस्लिम महिलाओं के कानूनी अधिकारों और सुरक्षा के लिए कई अन्य निर्देशों के अलावा, याचिका में सभी मुस्लिम विवाहों और तलाकों का अनिवार्य पंजीकरण राज्य प्राधिकरणों के साथ कराने का निर्देश देने की भी मांग की गई ताकि बाद के गुप्त रूप से किए निकाहों को रोका जा सके।
याचिका में पहली पत्नी और बच्चों के लिए वैवाहिक घर का तात्कालिक अधिकार और बहुविवाह से संबंधित मामलों में भरण-पोषण के लिए त्वरित तंत्र की भी मांग की है। वर्तमान याचिका भारत के संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए दायर की गई है।”
संवैधानिक वैधता को चुनौती
अधिवक्ता श्रीया मैनि की दायर याचिका में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून (शरियत) आवेदन अधिनियम, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई, क्योंकि यह बहुविवाह को मान्यता और वैधता देता है।
इससे मुस्लिम महिलाओं को बीएनएस की धारा 82 के तहत अन्य सभी नागरिकों को उपलब्ध बहुविवाह के खिलाफ सुरक्षा से वंचित किया जाता है।
अनुच्छेद 14, 15 व 21 का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बहुविवाह स्वाभाविक रूप से भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है।
मुस्लिम पुरुषों को उसी कार्य के लिए धार्मिक सुरक्षा दी जाती है, जिससे कानूनी असमानता उत्पन्न होती है। जबकि अन्य भारतीय नागरिकों के लिए बीएनएस की धारा 82 के तहत बहुविवाह एक आपराधिक मामला है।



