राजनीति

लद्दाख में मोदी के नए रणनीतिक कदम!

लद्दाख एक ऐसा क्षेत्र है जहां देशभक्ति कूट-कूट कर भरी है और यहां का हर नागरिक बिना वर्दी के एक सैनिक की तरह काम करता है। सिंधु नदी लद्दाख की जीवन रेखा है, जो हमारे क्षेत्र में 500 किलोमीटर से भी ज्यादा दूरी तक बहती है। हमने  1998 में भारत की पहली सिंधु यात्रा (सिंधु अभियान ) का आयोजन किया था। पहला सिंधु दर्शन अक्तूबर 1997 में हुआ था। सिंधु नदी ने ही हमारे देश, लोगों, संस्कृति और सभ्यता को इंडिया, हिंदू और हिंदुस्तान जैसे नाम दिए। दुनिया की किसी भी दूसरी नदी को ऐसा गौरव हासिल नहीं है। यही बात लद्दाख को सिंधु सभ्यता का पालना (केंद्र) बनाती है, जिसे बहुत कम लोग समझ पाते हैं।

लगभग तीन लाख की बिखरी हुई आबादी वाला लद्दाख करीब 59,146 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, जिसकी सीमाएं चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से लगती हैं। आज, चीन ने अक्साई चिन क्षेत्र में भारत की लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर अवैध कब्जा कर रखा है, जिसे उसने 1962 के युद्ध में छीना था। इस कदम से अफगानिस्तान सीमा तक भारत का सीधा जमीनी रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। इसके अलावा, पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में भारत की लगभग 78,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर अवैध कब्जा किया हुआ है। इसमें से पाकिस्तान ने 1963 के सीमा समझौते के तहत शक्सगाम घाटी का 5,180 वर्ग किलोमीटर हिस्सा अवैध रूप से चीन को सौंप दिया। यह सब पंडित नेहरू के मायावी हिंदी चीनी भाई-भाई काल में हुआ था।

22 फरवरी 1994 को भारत की संसद के दोनों सदनों ने सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया था, जिसमें तीन मुख्य बातें कही गई थीं :

अटूट हिस्सा :  पूरा जम्मू-कश्मीर राज्य  (जिसमें लद्दाख, पी.ओ.के.,  अक्साई चिन और शक्सगाम शामिल हैं) भारत का एक अभिन्न और अटूट हिस्सा है।
ज़मीन खाली करना : पाकिस्तान अपने अवैध और जबरदस्ती कब्जे वाले सभी इलाकों को तुरंत खाली करे।
कोई समझौता नहीं : भारत इन क्षेत्रों को देश से अलग करने की किसी भी कोशिश को पूरी तरह खारिज करता है।
यह प्रस्ताव पूरे देश के लिए लद्दाख के भारी रणनीतिक महत्व को दर्शाता है; यहां  जो कुछ भी होता है, उसका असर हम सब पर पड़ता है। इसीलिए, लद्दाख हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एजैंडे में सबसे ऊपर रहता है। जब उन्होंने अपने विश्वस्त  विनय कुमार सक्सेना को लेह का उपराज्यपाल बनाकर भेजा, तो इसमें कोई हैरानी नहीं थी। अपनी त्वरित और निर्णायक कार्यशैली के लिए प्रसिद्ध  सक्सेना ने तुरंत कई कड़े और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कदम उठाए, जो इस क्षेत्र को हमेशा के लिए बेहतर बना देंगे। सबसे बड़ा  फैसला सभी सात जिलों के लिए स्वायत्त पर्वतीय परिषदों  का गठन करना है। लद्दाख के मुख्य सचिव आशीष कुंद्रा ने 13 जुलाई 2026 को लेह में एक प्रैस कांफ्रैंस में घोषणा की कि केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन सभी सात जिलों में स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद का गठन करेगा।

अपनी जरूरत के मुताबिक विकास :  परिषदें अपने विकास की योजनाएं खुद तैयार करेंगी, जिससे हर जिले को लेह या कारगिल से निर्देश मिलने की बजाय अपनी प्राथमिकताओं को खुद तय करने की आज़ादी मिलेगी।
सार्वजनिक सेवाएं : परिषदें जिला स्तर पर स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यटन, स्थानीय बुनियादी ढांचे और सामाजिक कल्याण योजनाओं की सीधी जिम्मेदारी संभालेंगी।
एक अनोखा केंद्र शासित प्रदेश-स्तरीय निकाय :  धारा 371 के एक विशेष ढांचे के तहत इन सातों परिषदों के ऊपर एक सर्वोच्च संस्था बनाने का प्रस्ताव है। विधायी, कार्यकारी, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों से लैस इस मॉडल की भारत में कोई दूसरी मिसाल नहीं है। इसे देश की अन्य क्षेत्रीय और जनजातीय व्यवस्थाओं की सबसे अच्छी खूबियों को मिलाकर बनाया जाएगा।

लद्दाख के किसी भी प्रशासन का यह परम कत्र्तव्य है कि वह इस क्षेत्र की मूल बौद्ध पहचान को मजबूत करे और उसकी रक्षा करे। अपनी विशिष्ट बौद्ध पहचान के बिना लद्दाख का सांस्कृतिक अस्तित्व अधूरा है। ऐतिहासिक रूप से, शेख अब्दुल्ला के दिनों से ही लद्दाख के बौद्ध समुदाय को निशाना बनाने, जबरन धर्मांतरण और स्थानीय जनसांख्यिकी (डैमोग्राफी) को बिगाडऩे के लगातार प्रयास किए गए। लद्दाख के आज के कई प्रमुख नेता उन कड़े जमीनी आंदोलनों से निकले हैं, जो बौद्ध परिवारों की रक्षा और बाहरी ताकतों से अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिए शुरू हुए थे।-तरुण विजय 

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