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जंगलों से गुम होती महुआ की विरासत, बदलती खेती-सड़क चौड़ीकरण ने बढ़ाई चिंता

मध्य भारत के जंगलों में पिछले कई वर्षों के अनुभव बताते हैं कि महुआ के वृक्ष धीरे-धीरे बदल रहे हैं, लेकिन यह बदलाव अक्सर आँकड़ों और दस्तावेजों से ओझल रह जाता है। वन से जुड़े विशेषज्ञ गाजीपुर, बलिया और जौनपुर जैसे जिलों में इसे बारीकी से महसूस करते रहे हैं। गांवों की अर्थव्यवस्था में महुआ सिर्फ एक वृक्ष नहीं, बल्कि एक जीवनरेखा है, खासकर उन परिवारों के लिए जो जंगलों पर निर्भर हैं।

गर्मी की शुरुआत में जब खेतों में काम कम हो जाता है, तब महुआ के फूल आजीविका का सहारा बनते हैं। सुबह-सुबह कई महिलाएं और बुजुर्ग टोकरियां लेकर इन फूलों को बीनने निकलते हैं। इसके बीजों से निकलने वाला तेल रसोई और औषधि का हिस्सा होता है, जबकि महुआ के पेड़ की घनी छांव पशुओं के लिए आराम की जगह बनाती है, लेकिन अब यह मौसमी दृश्य धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है।

महुआ केवल एक वन वृक्ष नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शुष्क वन पारिस्थितिकी का आधार है। इसके फूल भोजन, पेय और पशु चारे के रूप में उपयोग होते हैं, जबकि बीजों से निकला तेल खाद्य, औषधीय और घरेलू उपयोग में आता है। इसकी पत्तियां पारंपरिक पत्तल-दोने बनाने में काम आती हैं और घनी पत्तियां गर्मी में पशुओं तथा वन्यजीवों को छाया प्रदान करती हैं। कृषि के सुस्त मौसम में इसके फूल मधुमक्खियों जैसे परागणकों के लिए भी भोजन के महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं।

महुआ की अहमियत केवल इसके प्रत्यक्ष उपयोगों तक सीमित नहीं है। यह शुष्क वनों की पारिस्थितिकी, स्थानीय जैव विविधता और वन-आधारित आजीविका का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। अनेक आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लिए यह केवल आय का स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपराओं, स्थानीय ज्ञान और खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ वृक्ष है। इसलिए महुआ का संरक्षण केवल एक प्रजाति को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे सामाजिक और पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखने का सवाल है।

क्षेत्रीय सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई है कि महुआ के पुराने पेड़ तो अब भी दिख जाते हैं, लेकिन नए पौधे लगभग नदारद हैं। अनेक क्षेत्रों में मौजूद ये परिपक्व वृक्ष अपनी प्राकृतिक आयु के अंतिम चरणों में पहुंच चुके हैं, जबकि उनका प्राकृतिक पुनरुत्पादन सीमित रह गया है। कई बीजारोपण सफल नहीं हो पाते और लंबी शुष्क अवधियों, भूमि-विघटन, अत्यधिक चराई तथा मिट्टी के सख्त होने के कारण पौधे मुरझा जाते हैं। यहां तक कि फूल बीनने के दौरान साफ-सफाई के लिए लगाई गई मौसमी आग भी, यदि नियंत्रित न हो, तो बीजों के फैलाव और नए पौधों के स्थापित होने में बाधा बनती है। परिणामस्वरूप, पुराने महुआ वृक्ष तो अब भी घने छत्रों के साथ खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन उनकी जगह लेने वाली नई पीढ़ी पर्याप्त संख्या में विकसित नहीं हो पा रही।

महुआ एक कठोर प्रजाति का वृक्ष है, जो गर्मी और सूखे का सामना कर सकती है, लेकिन अब वर्षा में जो बदलाव आ रहे हैं, वे इस पर भारी पड़ रहे हैं। ग्रामीणों का अनुभव है कि महुआ के फूलों का मौसम अब पहले जैसा अनुमानित नहीं रहा। देरी से पड़ने वाली सर्दियों की बारिश और लंबी सूखा अवधियों ने फूलों को या तो कम कर दिया है या फिर उनके खिलने का समय ही बदल गया है। नतीजतन, फूल बीनने वाले परिवारों के लिए यह मौसम पहले जितना भरोसेमंद नहीं रह गया है।

यह दबाव केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। ‘नेचर सस्टेनेबिलिटी’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत के कृषि परिदृश्यों में बिखरे हुए बड़े पेड़ों में गिरावट दर्ज की गई है। अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2010-11 में मौजूद बड़े कृषि-वृक्षों में लगभग 11.2 प्रतिशत वृक्ष 2018 तक गायब हो चुके थे। इसके बाद 2018 से 2022 के बीच 50 लाख से अधिक बड़े वृक्ष और लुप्त हो गए। इसे शोधकर्ताओं ने बदलती कृषि पद्धतियों से जोड़कर देखा है। ग्रामीण विकास के तहत सड़कों के चौड़ीकरण के दौरान महुआ के सैकड़ों पुराने पेड़ उखाड़ दिए गए, जो दशकों से ग्रामीण सड़कों की शोभा बढ़ा रहे थे।

इससे भी चिंताजनक सांस्कृतिक अंतराल है। एक समय था जब गांव के चौपालों, चरागाहों और खेतों की मेड़ों पर महुआ के पेड़ दिखाई देते थे। इसकी पत्तियों से पत्तल बनाई जाती थी, जो सामुदायिक भोज और शादियों का अभिन्न हिस्सा थीं। मगर अब प्लास्टिक की प्लेटों ने पत्तलों की जगह ले ली है, जिससे एक ओर आजीविका प्रभावित हुई है, तो दूसरी ओर महुआ की सांस्कृतिक पहचान भी फीकी पड़ गई है। बुजुर्ग अब भी याद करते हैं कि कैसे एक पीढ़ी पहले खेतों के किनारे महुआ के वृक्षों की कतारें होती थीं, जो अब नजर नहीं आतीं।

कुछ राज्यों में संगठित खरीद और मूल्य-वर्धन योजनाओं से महुआ संग्रह करने वालों को लाभ तो हुआ है, लेकिन प्रसंस्करण और बाजार तक सीमित पहुंच के कारण इसकी आर्थिक क्षमता का पूरा लाभ स्थानीय समुदायों तक नहीं पहुंच पाया है। क्षेत्रीय अनुभव बताते हैं कि बहुत से सरल उपाय महुआ के संरक्षण में मदद कर सकते हैं। उन क्षेत्रों में नियमित निरीक्षण, जहां यह प्रजाति आम है, साथ ही पेड़ों की आयु संरचना और बीजों की जीवित रहने की दर पर नजर रखना आवश्यक है। गांव के स्तर पर फूल बीनने के मौसम में जमीन पर आग लगाने पर नियंत्रण जरूरी है। इससे विशेष रूप से मानसून के शुरुआती महीनों में, जब नए पौधे निकलते हैं, तब इनके जीवित रहने की दर में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

सबसे अहम है सामुदायिक भागीदारी। जब लोगों को समझाया जाता है कि पौधों की रक्षा करना क्यों जरूरी है, तो वे इसे अपना लेते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से आज के पौधरोपण अभियानों में अक्सर तेजी से बढ़ने वाली या फल देने वाली प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाती है। महुआ के पौधे शायद ही मांगे जाते हैं, जिससे स्थानीय नर्सरियों में इनकी उपलब्धता न के बराबर हो जाती है। दो मत नहीं कि सरकारी नर्सरियों में महुआ को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

महुआ के क्षरण के पीछे कोई एक कारण जिम्मेदार नहीं है। जलवायु परिवर्तन से फूल आने के समय में बदलाव, अत्यधिक चराई, अनियंत्रित मौसमी आग, भूमि-विघटन, सड़क चौड़ीकरण, कृषि पद्धतियों में परिवर्तन तथा महुआ पौधों के सीमित रोपण जैसे अनेक कारक मिलकर इसकी नई पीढ़ी को कमजोर कर रहे हैं। सहायक प्राकृतिक पुनरुद्धार, क्षीण हिस्सों में संवर्धन रोपण और कृषि-वानिकी प्रणालियों में महुआ को शामिल करने से मौजूदा पेड़ों पर दबाव कम किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश में सौ वर्ष से अधिक पुराने विरासत वृक्षों के रखरखाव की जो पहल शुरू हुई है, वह वास्तव में महुआ संरक्षण के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है।

पारिस्थितिकीय गिरावट कभी नाटकीय रूप से नहीं होती। पेड़ अचानक नहीं मिटते। वे धीरे-धीरे ढल जाते हैं, जब उनकी अगली पीढ़ी लड़खड़ाने लगती है। इसलिए महुआ के भविष्य की सुरक्षा न केवल एक पारिस्थितिकीय चुनौती है, बल्कि आजीविका का सवाल भी है। यदि समय रहते निगरानी, सामुदायिक सहयोग और संस्थागत समर्थन मिल जाए, तो यह अनमोल वृक्ष भारत के सूखे जंगलों में फिर से पनप सकता है।

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