राजनीति

चुनाव की पवित्रता और जहरीली वाणी

वाणी, भाषा, आचरण तथा व्यवहार की दृष्टि से सभी दलों के सम्माननीय नेताओं तथा उम्मीदवारों को भी संयमित, संवेदनशील तथा गरिमापूर्ण होना चाहिए। तभी देश व समाज में सामाजिक सौहार्द बना रह सकेगा…

लोकतंत्र तथा चुनाव में बहुत गहरा सम्बन्ध है। लोकतांत्रिक प्रणाली में चुनाव पंचवर्षीय पर्व है। भारतीय संविधान अपने नागरिकों को निष्पक्ष एवं निर्भय होकर अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार देता है। इसी चुनाव से लोकतन्त्र मजबूत होता है। यही संविधान अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है। यदि किसी नागरिक के अधिकारों का हनन हो रहा हो तो उसे सीमाओं में रहते हुए मर्यादित भाषा, वाणी एवं आचरण से अपने विचार रखने की स्वतन्त्रता है। ऐसा माना जाता है कि राजनीति में साम, दाम, दण्ड, भेद सब कुछ चलता है, लेकिन नागरिकता तथा न्याय की परिधि में ही सब कुछ शोभित होता है। जनता का प्रतिनिधित्व तथा देश को नेतृत्व प्रदान करने वाले नेताओं से आशा की जा सकती है कि उनका आचरण तथा व्यवहार अच्छा हो। उनका चरित्र अनुकरणीय एवं उदाहरणीय हो। वे कर्मठ, ईमानदार, चरित्रवान एवं सत्यनिष्ठ हों। उनकी भाषा सभ्य तथा वाणी मधुर हो। किसी भी कीमत पर चुनाव जीतना किसी भी व्यक्ति के लिए कोई अन्तिम उद्देश्य नहीं हो सकता। राजनीति साध्य है, साधन नहीं है। किसी भी राजनेता के लिए राजनीति अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने का साधन नहीं है, बल्कि यह गरीबों, दीन-दुखियों, पीडि़तों, वंचितों, शोषितों, उपेक्षितों तथा हाशिए पर रह रहे लोगों की सेवा का माध्यम है।

विचार किया जाए तो भारतीय लोकतंत्र में मतदाता का स्थान सर्वोच्च है। क्योंकि वह मत देने वाला ‘दाता’ है, जबकि नेता तो उसके वोट की उम्मीद कर जीतने की आशा रखता है। यहां पर मतदाता तथा उम्मीदवार को भी अपना स्थान पता होना चाहिए। नम्र और विनम्र होकर वोट मांगा जाता है, न कि दम्भ और घमंड में रौब दिखाने से समर्थन मिल सकता है। नेता को अनुकरणीय एवं उदाहरणीय होना चाहिए। जहां मतदाता अपने पसंदीदा उम्मीदवार से नम्र, विनम्र, सभ्य, सुशील, शिक्षित तथा व्यवहार कुशल होने की आशा रखता है, वहीं पर चुनावी मौसम में नेता कुछ भी बोलने तथा करने से परहेज नहीं करते। प्रतिद्वंद्वी लोग विपक्षी नेता की मानहानि, चरित्रहनन तथा उसके परिवार एवं पूर्वजों तक के चरित्र की भी चीरफाड़ कर देते हैं जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। मशहूर शायर बशीर बद्र का एक शे’र ऐसे मौके पर बहुत सटीक और शिक्षाप्रद है- ‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी दोस्त बन जाएं तो शर्मिन्दा न हों।’ यह भी सही है कि विभिन्न दलों के प्रत्याशी भी प्रतिष्ठित परिवारों से सम्बन्ध रखते हैं। पार्टियों द्वारा उम्मीदवारी के लिए चयन उनकी छवि एवं योग्यता के आधार पर ही होता है। सभी उम्मीदवारों को चाहिए कि वे अपने भाषणों में मुद्दों तथा देश के विकास की बात करें, न कि अपनी वाणी से एक दूसरे पर व्यक्तिगत छींटाकशी करके आग के गोले दागें। यह देश के भविष्य, सभ्य समाज तथा आपसी सौहार्द, भाईचारे तथा सामाजिक सम्बन्धों की दृष्टि से अच्छा नहीं है।

चुनावी मौसम में नेताओं की वाणी परस्पर आग के गोले बरसाती रहती है और जनता राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का आनन्द लेती रहती है। चुनावों के दौरान नेता किसी भी कीमत पर चुनाव जीतने के लिए किसी भी घटिया तथा निम्न स्तर पर चले जाते हैं तथा भाषा, वाणी, मर्यादा, व्यवहार तथा आचरण सब कुछ भूल जाते हैं। यह भी विडम्बना है कि चुनाव जीतने के बाद यही लोग जीत के परिणाम से शुद्ध होकर जनता के लिए फिर से माननीय तथा सम्माननीय हो जाते हैं तथा आवश्यकता पडऩे पर राजनीतिक दूरियां मिटाकर एक दूसरे से हाथ मिला लेते हैं। जनता फिर से बिना किसी शर्त इन्हें पूर्व रूप में स्वीकार कर लेती है। धन्य है भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था। प्रतिष्ठित नेताओं के लिए अपनी सुविधानुसार पार्टी बदलना एक आम बात हो गई है। कोई भी पार्टी एक विचारधारा होती है, उसके कुछ सिद्धांत होते हैं। पार्टी के कार्यकर्ता तथा पदाधिकारी निश्चित सिद्धान्तों का पालन करते हैं। अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की आड़ में जनता के हित तथा अपने चुनाव क्षेत्र एवं लोगों की उपेक्षा का बहाना लेकर अपनी मां रूपी पार्टी बदल लेते हैं। समझ नहीं आता कि वर्षों तक पार्टी विशेष में आस्था रखने, सेवा करने, पदाधिकारी रहने तथा सत्ता सुख भोगने के बाद एकदम से निष्ठुर होकर नेता ऐसा फैसला लेते हैं और नेताओं के समर्थक अवाक होकर मुंह ताकते रह जाते हैं। यह कैसा नैतिक आचरण है? यह कैसा चरित्र है? यह सही है कि सभी अपने आचार, व्यवहार, संस्कार तथा आचरण के लिए स्वतन्त्र हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में एक आम मतदाता तथा निष्ठावान कार्यकर्ता तो ठगे का ठगा ही रह जाता है। चुनाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें हम संवैधानिक मूल्यों, नियमों, सिद्धान्तों तथा प्रक्रियाओं में आस्था रखते हुए पांच वर्षों के उपरान्त चुनावी यज्ञ में प्राप्त अमृत से देश की सेवा करने के लिए राजा नहीं, बल्कि सेवक चुनते हैं। चुनाव कोई धींगामुश्ती का खेल नहीं है। यह समाज में कोई नफरत फैलाने का माध्यम नहीं है। जनता नेताओं की भाषा, वाणी, चरित्र तथा आचरण को बहुत बारीकी से जांचती है।

सामान्यत: सामाजिक तथा लोकाचार की व्यावहारिक दृष्टि से वाणी और भाषा ऐसी हो जिससे शीतलता मिले, व्यवहार ऐसा हो जिससे विनम्रता परिलक्षित हो तथा आचरण ऐसा हो जो सबके लिए उदाहरणीय हो। लेकिन चुनावी मौसम में नेताओं की वाणी नफरत के बोलों से आग उगल रही है, व्यवहार ऐसा जैसे कि घमंड और अहंकार की पराकाष्ठा हो तथा आचरण निकृष्ट हो रहा है। चुनाव लडऩा तथा जीतना जीवन का अन्तिम उद्देश्य नहीं है। चुनाव के बाद भी समाज, प्रदेश, देश तथा दुनिया रहेगी। चुनाव के बाद भी लोगों का आपसी सम्बन्ध, प्रेम तथा सौहार्द रहेगा। नेताओं को विपक्ष के नेताओं का सम्मान करते हुए राजनीतिक सम्बन्धों को निभाकर उदाहरण स्थापित करना चाहिए। नेताओं तथा राजनीतिक दलों को भी चाहिए कि लोकतन्त्रात्मक व्यवहार एवं सिद्धान्तों के अनुरूप विनम्रतापूर्वक जनता के जनादेश को जीत या हार के रूप में स्वीकार करें। वाणी, भाषा, आचरण तथा व्यवहार की दृष्टि से सभी दलों के सम्माननीय नेताओं तथा उम्मीदवारों को भी संयमित, संवेदनशील तथा गरिमापूर्ण होना चाहिए। तभी देश तथा समाज में सामाजिक सौहार्द, एकता और अखंडता की मौजूदगी रहेगी। प्रतिस्पर्धा में एक-दूसरे की आलोचना विनम्र भाव से भी की जा सकती है।

प्रो. सुरेश शर्मा

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