भारत की कूटनीतिक चूक…

आगे के लिए सबक स्पष्ट हैं। पहला, भारत को संकटकालीन कूटनीति के लिए एक स्पष्ट और सक्रिय ढांचा विकसित करना होगा, जिसमें त्वरित निर्णय और पहल की क्षमता हो। दूसरा, बहुपक्षीय मंचों- जैसे ब्रिक्स, जी-20 और संयुक्त राष्ट्र- का उपयोग केवल बयान देने के लिए नहीं, बल्कि ठोस परिणाम हासिल करने के लिए करना होगा। तीसरा, नैरेटिव बिल्डिंग पर अधिक ध्यान देना होगा, ताकि वैश्विक मंच पर भारत की आवाज केवल सुनी ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली भी बने…
पश्चिम एशिया में ईरान बनाम इजराइल-अमरीका के बीच बढ़ते टकराव के बाद जब युद्धविराम की कोशिशें तेज हुईं, तब वैश्विक कूटनीति के मंच पर एक दिलचस्प, और भारत के लिए चिंताजनक, तस्वीर उभरी। एक ओर ब्रिक्स जैसे बहुध्रुवीय मंच से शांति, संतुलन और संवाद की अपील की जा रही थी, वहीं दूसरी ओर भारत, जो स्वयं को विकासशील दुनिया की आवाज और वैश्विक दक्षिण का नेता बताता है, निर्णायक पहल लेने में हिचकता दिखा। परिणाम यह हुआ कि अवसर की खिडक़ी खुली तो सही, पर भारत उसे पकड़ नहीं पाया, और पाकिस्तान ने उसी खाली जगह को भरकर अपनी कूटनीतिक उपस्थिति को अपेक्षा से कहीं अधिक प्रभावशाली बना लिया। भारत की विदेश नीति परंपरागत रूप से ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ पर आधारित रही है, न तो पूरी तरह किसी खेमे में, न ही पूरी तरह तटस्थ। लेकिन आज के जटिल और तेजी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में यही स्वायत्तता कई बार ‘दुविधा’ का रूप ले लेती है। ईरान बनाम इजराइल-अमरीका तनाव के दौरान भारत का रुख इसी दुविधा का उदाहरण बना।
भारत के सामने तीनों ही देशों के साथ गहरे और बहुआयामी संबंध हैं- इजराइल रक्षा सहयोग का अहम साझेदार, ईरान ऊर्जा और कनेक्टिविटी का द्वार, और अमरीका रणनीतिक व आर्थिक सहयोग का स्तंभ। ऐसे में संतुलन साधना कठिन था, लेकिन कूटनीति का मूल तत्व ही कठिन परिस्थितियों में पहल करना होता है, न कि केवल सावधानी से बयान देना। ब्रिक्स मंच से अपेक्षा थी कि भारत एक प्रमुख सदस्य के रूप में, युद्धविराम के लिए मध्यस्थता या कम से कम ‘फैसिलिटेटर’ की भूमिका निभाएगा। लेकिन भारत की ओर से न तो कोई ठोस पहल सामने आई, न ही कोई बहुपक्षीय संवाद की ठोस रूपरेखा। इसके विपरीत, चीन और रूस ने अपने-अपने स्तर पर सक्रियता दिखाई, भले ही उनके प्रयास पूरी तरह सफल न रहे हों, लेकिन उन्होंने यह संदेश जरूर दिया कि वे संकट के समय ‘एक्टर’ हैं, केवल ‘ऑब्जर्वर’ नहीं। यहीं पाकिस्तान ने एक चतुर चाल चली। उसने खुद को इस संकट में ‘मुस्लिम दुनिया की आवाज’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की, चाहे वह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर बयान हों या इस्लामिक सहयोग संगठन में सक्रियता। पाकिस्तान ने कूटनीतिक भाषा में नैतिकता, मानवीय संकट और अंतरराष्ट्रीय कानून की बात करते हुए अपनी स्थिति को उभारा। यह रणनीति नई नहीं है, लेकिन इस बार इसे जिस समय और संदर्भ में इस्तेमाल किया गया, उसने उसे अपेक्षा से अधिक दृश्यता दिलाई। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए अधिक असहज है क्योंकि वह खुद को एक उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है। जी-20 की मेजबानी, ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश, और वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का दावा। लेकिन जब वास्तविक संकट आता है, तो केवल नैतिक अपील या संतुलित बयान पर्याप्त नहीं होते, ठोस पहल, मध्यस्थता की पेशकश और बहुपक्षीय संवाद की संरचना जरूरी होती है।
यहां प्रश्न यह नहीं है कि भारत को किसी एक पक्ष का समर्थन करना चाहिए था। बल्कि प्रश्न यह है कि क्या भारत ने अपने कूटनीतिक संसाधनों- जैसे उसकी विश्वसनीयता, उसके बहुपक्षीय संबंध और उसकी ‘नॉन-थ्रेटनिंग’ छवि- का पूरा उपयोग किया? उत्तर नकारात्मक प्रतीत होता है। भारत के पास एक अनूठी स्थिति थी। वह अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदार है, इजराइल के साथ गहरे रक्षा संबंध हैं, और ईरान के साथ ऐतिहासिक-सांस्कृतिक जुड़ाव। यह त्रिकोण उसे एक स्वाभाविक ‘ब्रिज बिल्डर’ बना सकता था। लेकिन इस अवसर पर वह भूमिका निभाने से चूक गया। ‘दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम’, यह कहावत इस संदर्भ में सटीक बैठती है। भारत ने संतुलन साधने की कोशिश में न तो निर्णायक नेतृत्व दिखाया, न ही पूरी तरह तटस्थ रहकर कोई अलग पहचान बनाई। इसके विपरीत, पाकिस्तान ने सीमित संसाधनों के बावजूद ‘नैरेटिव’ पर कब्जा करने की कोशिश की और कुछ हद तक सफल भी रहा। हालांकि, इस पूरे परिदृश्य को केवल विफलता के रूप में देखना भी अधूरा विश्लेषण होगा। भारत की सावधानी के पीछे वास्तविक चिंताएं हैं- ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा, और बड़े शक्ति-संतुलन की राजनीति। लेकिन समस्या तब होती है जब सावधानी, निष्क्रियता में बदल जाती है। एक उभरती शक्ति के लिए ‘रिस्क मैनेजमेंट’ और ‘रिस्क अवर्शन’ के बीच का अंतर समझना आवश्यक है।
आगे के लिए सबक स्पष्ट हैं। पहला, भारत को संकटकालीन कूटनीति के लिए एक स्पष्ट और सक्रिय ढांचा विकसित करना होगा, जिसमें त्वरित निर्णय और पहल की क्षमता हो। दूसरा, बहुपक्षीय मंचों- जैसे ब्रिक्स, जी-20 और संयुक्त राष्ट्र- का उपयोग केवल बयान देने के लिए नहीं, बल्कि ठोस परिणाम हासिल करने के लिए करना होगा। तीसरा, नैरेटिव बिल्डिंग पर अधिक ध्यान देना होगा, ताकि वैश्विक मंच पर भारत की आवाज केवल सुनी ही नहीं, बल्कि प्रभावशाली भी बने। अंतत:, कूटनीति अवसरों का खेल है, और अवसर हमेशा लंबे समय तक नहीं रहते। ईरान बनाम इजराइल-अमरीका युद्धविराम के इस प्रकरण ने यह दिखा दिया कि वैश्विक राजनीति में ‘स्पेस’ खाली नहीं रहता। अगर आप उसे नहीं भरेंगे, तो कोई और भर देगा। इस बार वह ‘कोई और’ पाकिस्तान था। अगली बार भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह केवल दर्शक नहीं, बल्कि निर्णायक भूमिका निभाने वाला खिलाड़ी बने।-डा. राकेश कपूर



