टूटेगा ट्रंप का दंभ…

कमोबेश अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप का गुरूर, उनका दंभ, अहंकार, उनकी सनक, सभी टूटने चाहिए। एक राष्ट्रपति की ‘कब्जेबाजी मानसिकता’ ने दुनिया को गरीबी, महंगाई, मंदी और अंतत: भुखमरी के कगार पर लाकर पटक दिया है। ईरान युद्ध में राष्ट्रपति टं्रप के मंसूबे और मकसद चकनाचूर हो चुके हैं। बेशक अमरीका-इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान की हजारों इमारतें, कल-कारखाने, सैन्य मुख्यालय, शस्त्रागार, 30 विश्वविद्यालय, शहर-दर-शहर मिट्टी-मलबा कर दिए हों, लेकिन ईरान अब भी युद्ध-मैदान में खड़ा है, लड़ रहा है। उसने होर्मुज जलडमरूमध्य मार्ग पर अपना पूरा कब्जा कर वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला दिया है और ऊर्जा-अकाल के हालात पैदा कर दिए हैं। अमरीका भी महंगाई से चिल्ला रहा है। जनता सडक़ों पर आंदोलित है। फिर भी राष्ट्रपति टं्रप चेतावनी दे रहे हैं कि यदि 6 अप्रैल तक होर्मुज नहीं खुला और ईरान ने डील नहीं की, तो ईरान पर कहर बरपेगा। ईरान इन धमकियों से नहीं डरता, बल्कि उसने अमरीका के एक ही दिन में 10 लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, ड्रोन आदि मार गिराए। एक अमरीकी पायलट लापता हो गया था, जो अब सुरक्षित मिल गया है। अब ईरान के आसमान पर ईरान का ही कब्जा है। अमरीकी लड़ाकू विमान ‘एफ’ श्रेणी के हैं, जिन्हें अमरीकी वायु-शक्ति की रीढ़ माना जाता रहा है। दुनिया अभी तक उन्हें ‘अजेय’ और संहारक मानती रही थी। उनमें परमाणु क्षमताएं भी हैं और वे दुश्मन के रडार को ‘चकमा’ देने में भी माहिर माने जाते रहे हैं। कहा जा रहा है कि ईरान ने अपनी वायु रक्षा प्रणाली की मिसाइलों से अमरीकी विमानों को धूल चटाई है। यह ईरान की वायु रक्षा प्रणाली है अथवा रूस की एस-400 को ‘ईरानी नाम’ दिया गया है? विमानों का तो अहंकार धराशायी हो चुका है, लेकिन अमरीका के पेंटागन ने भी स्वीकार किया है कि ईरान युद्ध में उसके 365 सैनिक घायल हुए हैं, जबकि 13 सैनिक मारे जा चुके हैं।
घायल सैनिकों में 247 तो थलसेना के हैं, जबकि अमरीका ने विधिवत रूप से जमीनी ऑपरेशन की शुरुआत अभी करनी है। बहरहाल राष्ट्रपति टं्रप को अपनी सुरक्षा-टीम के साथ न केवल आपात बैठक करनी पड़ी, बल्कि उसने बिचौलियों के जरिए 48 घंटे के युद्धविराम की पेशकश भी की, जिसे ईरान हुकूमत ने खारिज कर दिया। राष्ट्रपति टं्रप का यह ‘चरम दंभ’ ही है कि उन्होंने ईरान को ‘पाषाण-युग’ में धकेलने का बयान दिया है। शायद अमरीकी राष्ट्रपति यह नहीं जानते कि ईरान 5-6 हजार साल पुरानी सभ्यता है। अमरीका तो 1776 में पैदा हुआ है। सिकंदर और चंगेज खां जैसे आक्रांता भी ईरान को हासिल नहीं कर सके, तोड़ नहीं सके। इतिहास में दर्ज है कि ईरान कई बार बर्बाद हुआ है, मिट्टी-मलबा होता रहा है, लेकिन उसने पुनर्निर्माण किया है और आज वह परमाणु शक्ति बनने के बेहद करीब है। गुरूर टं्रप का टूटना चाहिए, जिसने 139.5 लाख करोड़ रुपए (1.5 ट्रिलियन डॉलर) का नया रक्षा बजट मांगा है और प्रस्ताव अमरीकी कांग्रेस (संसद) को भेजा है। यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा रक्षा बजट है। राष्ट्रपति टं्रप करीब 42 फीसदी की बढ़ोतरी करना चाहते हैं और शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, विदेशी सहायता आदि के बजट में करीब 73 अरब डॉलर की कटौती के पक्ष में हैं। नतीजतन अमरीका पर कर्ज का बोझ बढ़ेगा। पहले ही अमरीका 39 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज में है। अमरीका ईरान की नई युद्ध नीति से ‘अलर्ट’ हो गया है, लेकिन उसके लिए अब युद्ध में रखा क्या है? दुनिया में फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, इटली, स्पेन, ब्रिटेन समेत भारत सरीखे देश चौतरफा दबाव में हैं, क्योंकि होर्मुज बंद है और खाड़ी देशों के तेल-गैस ठिकाने ध्वस्त कर दिए गए हैं, लिहाजा विश्व ऊर्जा की बूंद-बूंद को तरस रहा है। भारत को ऑनस्पॉट कच्चे तेल के दाम 141.36 डॉलर प्रति बैरल देने पड़ रहे हैं, जबकि वायदा कीमत 109.03 डॉलर की है। बहरहाल, यह युद्ध जल्द खत्म होना चाहिए।


