लेख

अमरीका के पाखंड की राजनीति

अमरीका को चिंता करने की जरूरत नहीं है, चिंतन और आस्था की स्वतंत्रता भारत के स्वभाव में है। उसके लिए अब्राहमी स्वभाव के अमरीका से शिक्षा लेने की जरूरत नहीं है…

अमरीका के राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 1998 में एक अधिनियम पारित किया था जिसे अमरीका अंतरराष्ट्रीय मजहबी स्वतंत्रता अधिनियम कहता है। इस अधिनियम के तहत अमरीका का कहना है कि उसके अतिरिक्त दुनिया भर में मजहबी स्वतंत्रता का रक्षक और कोई दूसरा देश नहीं है। इसके आधार पर मजहब को अमरीकी विदेश नीति का प्रमुख आधार बनाया गया है। इस अधिनियम के आधार पर ही वाशिंगटन ने ‘अंतरराष्ट्रीय मजहबी स्वतंत्रता अमरीकी आयोग’ का गठन किया हुआ है। यह आयोग एक प्रकार से दुनिया भर में फैले अमरीकी दूतावासों को वहां के देशों की आंतरिक स्थिति में दखलअंदाजी का अधिकार प्रदान करता है। यह आयोग दुनिया भर के देशों के बारे में, अमरीका की विदेश नीति के आधार पर हर साल अच्छे या बुरे होने के प्रमाणपत्र जारी करता है। इसके आधार पर वह कुछ देशों को ‘विशेष चिंता करने वाले देश’ घोषित करता है। पिछले दिनों अमरीका ने इस आयोग की सालाना रपट जारी की है जिसमें 2025 का लेखा जोखा देने का दावा किया गया है। इसमें भारत को लेकर बहुत ज्यादा चिंता जाहिर की गई है। भारतीय संसद द्वारा पारित अनेक अधिनियमों को मजहबी स्वतंत्रता में दखलअंदाजी बताया गया है। मसलन अनेक राज्यों के मतांतरण निषेध अधिनियम, गोवध निषेध अधिनियम, नागरिकता अधिनियम, यूनिफार्म सिविल अधिनियम इत्यादि। अमरीका का मानना है कि भारतीय संसद के ये अधिनियम अमरीका के आईआरएफ अधिनियम 1998 का उल्लंघन करते हैं।

इसके अतिरिक्त अमरीका को यह भी दुख है कि भारत सरकार अपने नागरिकों के लिए एक राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार कर रही है जिसमें भारत के सभी नागरिकों का इंदराज किया जाएगा। उसका मानना है कि इस रजिस्टर के बन जाने से मुसलमानों और ईसाइयों की मजहबी स्वतंत्रता के रास्ते में बहुत बड़ी रुकावट आ जाएगी। गोहत्या निषेध प्रावधानों को लेकर भी अमरीका की चिंता बढ़ी हुई दिखाई देती है। उसके लिहाज से इससे भी मुसलमानों और ईसाइयों को अपने मजहबी क्रियाकलाप करने में दिक्कत आती है। एक दूसरी मजेदार बात का भी जिक्र है। कहा गया है कि भारत में औरंगजेब की कब्र है। उसको लेकर विवाद बढ़ रहा है जिससे मुसलमानों के मजहबी कामों में रुकावट पैदा हो रही है। यानी अमरीका के लिहाज से 2024 से भारत में हालात बहुत बदल गए हैं। साफ तौर पर तो नहीं कहा गया है, लेकिन चिंता जाहिर करती है कि 2014 से पहले जब परोक्ष रूप से कमान सोनिया गांधी के हाथों में थी, तब देश ठीक-ठाक चल रहा था। जबसे भाजपा सरकार आई है, तब से देश में उथल पुथल मच गई है। मजहबी स्वतंत्रता को गहरा आघात लगा है। कब्र में औरंगजेब चिंतित है और कब्र के बाहर अमरीका चिंतित है। इस सारे हालात के लिए अमरीका ने तथाकथित दोषी भी ढूंढ लिए हैं। इसमें सबसे ऊपर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद हैं। इतना ही शायद काफी नहीं था। इसमें भारत सरकार की संस्था रॉ को भी शामिल किया गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का विशेष उल्लेख किया गया है। लेकिन हैरानी की बात है कि अमरीका की नजर में भारत की मौजूदा हालात के लिए जिम्मेदार तथाकथित दोषियों में, उसने एक प्रमुख घटक का नाम छोड़ दिया है। वह है भारत की जनता। अमरीका के इस तथाकथित मजहबी स्वतंत्रता के रक्षक आयोग ने यह नहीं कहा कि इस सारे कामों की जिम्मेदार भारत की जनता है, जिसने सोनिया गांधी की पार्टी को हटाकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता ही नहीं सौंप दी, बल्कि लगातार सौंपती जा रही है। हैरानी की एक दूसरी वजह भी है। इस रपट में अमरीका को केवल यही चिंता है कि भारत में मुसलमानों की मजहबी आजादी में बाधा डाली जा रही है। इसमें शिया पंथ के मानने वालों से किए जा रहे तथाकथित भेदभाव का उल्लेख नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि अमरीका ने बहुत अरसा पहले ही ईरान पर हमला करने का निर्णय कर लिया था। इसलिए शिया पंथ की चर्चा करना रणनीति के हिसाब से ठीक नहीं लगा होगा। अब इस रपट के दूसरे हिस्से की चर्चा जिसका जिक्र इस रपट में नहीं है और न ही होगा।

दरअसल बिल क्लिंटन के समय बनाया गया यह अधिनियम और आयोग अमरीका की विदेश नीति और भविष्य में की जाने वाली उसकी कार्यवाहियों का संकेत देता है। अमरीका को अपने राजनीतिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व सामरिक हितों के संवर्धन के लिए जो उचित लगता है, उसको प्राप्त करने के लिए वह इस आयोग के माध्यम से वर्षों पहले वातावरण तैयार करता है। यह आयोग इसी नीति के अनुकूल, उस देश को, उसके महत्वपूर्ण व्यक्तियों को नकारात्मक तरीके से पेश करने शुरू कर देता है और कई साल ऐसा करता रहता है। फिर अनुकूल समय देख कर वह स्वयं ही उस देश को मुक्त करवाने के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कार्यवाही शुरू कर देता है। 2014 से कुछ साल पहले मेरी एक पुस्तक ‘राष्ट्रीय चेतना को चुनौती’ प्रकाशित हुई थी। उसमें मैंने आशंका जाहिर की थी कि यदि भारत में भाजपा सत्ता में आ जाती है तो अमरीका धीरे-धीरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को उग्र संगठन के रूप में प्रचारित करना शुरू कर देगा। भारत के भीतर की ही कुछ ताकतें अमरीका के स्वर में स्वर मिलाना शुरू कर देंगी और फिर अमरीका भारत में दखलअंदाजी के रास्ते तलाश करेगा। मुझे लगता है अमरीका के इस तथाकथित मजहबी स्वतंत्रता आयोग की इस रपट को इस परिप्रेक्ष्य में भी देखना चाहिए। अमरीका को मजहबी आजादी की आड़ में भी दूसरे देशों की सरकारें उलटने में महारत हासिल है। ईरान की सरकार को पलटने की जो कोशिशें की जा रही हैं, उसके पीछे भी कहीं न कहीं इयातुल्ला खामेनेई, जिनकी हत्या कर दी गई है, की भी मजहबी नीति को ही आधार बनाया गया है। अमरीका का यह आयोग धमकी भी देता है कि भारत को हथियार देना बंद कर देना चाहिए। इस आयोग की रपट कई सवाल पैदा करती है। क्या अमरीका यह मान कर चलता है कि दुनिया के किस देश में व्यवस्था के लिए कैसा संविधान होना चाहिए, इसका फैसला वह देश नहीं करेगा बल्कि यह फैसला अमरीका करेगा। किसी देश में क्या कानून बनेगा, उसका फैसला भी अमरीका ही करेगा। लेकिन सबसे बड़ी हैरानी यह है कि अमरीका दुनिया भर में उन देशों के साथ खड़ा रहता है जो लोकतंत्र की जगह तानाशाही शासन व्यवस्था के हामी हैं। यहां तक कि अमरीका लोकतांत्रिक देशों की सरकारें उखाडऩे में भी सक्रिय रहता है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान तो खुले आम कहते थे कि अमरीका उनकी सरकार को गिराने के षड्यंत्र करता रहता है। बांग्लादेश में भी शेख हसीना की सरकार गिराने में अमरीका का ही हाथ था। इस काम के लिए वह इन देशों के शासनाध्यक्षों तक को लोभ लालच से काबू किए रहता है। जो देश अमरीका के हितों के प्रतिकूल होता है, उस वेनेजुएला के तो राष्ट्रपति तक को अपनी सेना भेज कर उठा लेता है। ईरान में शासन बदलना है, इसकी घोषणा अमरीका के राष्ट्रपति सार्वजनिक रूप से कर रहे हैं। अमरीका को मजहब की आजादी की चिंता नहीं है। अमरीका की चिंता केवल इतनी है कि कोई देश ईसाई मिशनरियों के गैर कानूनी कामों में बाधा न पहुंचाए। अमरीका अभी भी उसी युग में घूम रहा है, जिस युग में जापान का संविधान भी अमरीका ही बनाता था। उस संविधान का ही कारनामा है कि जापान में अमरीका की मिशनरियां वहां की संस्कृति को खा रही हैं। जापान में इसके विरोध में स्वर उठ रहे हैं। लेकिन अपने यहां अमरीका मजहब की स्वतंत्रता उतनी ही देता है जितनी उसे अपना मुखौटा बनाए रखने के लिए जरूरी है। बहरहाल, अमरीका को चिंता करने की जरूरत नहीं है, चिंतन और आस्था की स्वतंत्रता भारत के स्वभाव में है। उसके लिए अब्राहमी स्वभाव के अमरीका से शिक्षा लेने की जरूरत नहीं है।-कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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