वैकल्पिक ऊर्जा है कहां ?
ईरान युद्ध के कारण परिस्थितियां ऐसी बनी हैं कि पहली बार जीवाश्म (फॉसिल, कोयला-तेल आदि) ईंधन पर बहस छिड़ी है। यह जलवायु-परिवर्तन के कारण नहीं है, बल्कि तेल-गैस को बाधित करना और उनकी उपलब्धता सीमित होने के मद्देनजर यह बहस छिड़ी है। दुनिया आनन-फानन में वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर केंद्रित नहीं कर सकती, क्योंकि वे बेहद सीमित हैं और कई देशों में उपलब्ध ही नहीं हैं। भारत ऐसा देश है, जहां सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, पनबिजली और परमाणु ऊर्जा का लगातार उत्पादन किया जा रहा है, लिहाजा लोग उनका प्रयोग भी कर रहे हैं। तेल-गैस संकट के इस दौर में सरकार ने मार्च में ही पीएनजी (रसोई में पाइपलाइन गैस) के 3.5 लाख से अधिक कनेक्शन दिलाए हैं। अब देश में इस गैस के मात्र 1.65 करोड़ से अधिक उपभोक्ता हैं। देश की आबादी 147 करोड़ से अधिक है। उसमें 33 करोड़ एलपीजी (रसोई गैस) के उपभोक्ता हैं। दरअसल पीएनजी का तो बुनियादी ढांचा ही बेहद सीमित है। पाइपलाइन की सुविधा कुछ बड़े शहरों की गिनी-चुनी कॉलोनियों में ही मौजूद है। तो देश का आम उपभोक्ता वैकल्पिक ऊर्जा की कल्पना भी कैसे कर सकता है, प्रयोग करना तो दूर की कौड़ी है? ईरान युद्ध के कारण तेल-गैस का संकट इतना व्यापक हो गया है कि लोग और व्यावसायिक ठिकाने लकड़ी और कोयले का चूल्हा जलाने पर विचार कर रहे हैं अथवा शुरू कर दिया है। धुआं और प्रदूषण काल की ओर वापसी…! जीवाश्म ईंधनों पर भारत की निर्भरता जलवायु-पर्यावरण का ही मुद्दा नहीं है, बल्कि सुरक्षा-संकट का सरोकार भी है। इस ऊर्जा-संकट से खाद्य-संकट भी जुड़ा है, यह चेतावनी विशेषज्ञ लगातार दे रहे हैं। भारत का आयात-बिल अपने आप में संकटपूर्ण बोझ है। उसमें मध्य-पूर्व देशों की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी है। ईरान युद्ध शुरू होने से पहले भारत का तेल-गैस आयात का बिल उस स्तर तक पहुंच चुका था, जहां एक साल में ही 180 अरब डॉलर तक उछल सकता था।
कतर ने 2024-25 में भारत को 1.10 करोड़ टन एलएनजी की आपूर्ति की थी। वह करीब 41 फीसदी थी। तेल-गैस आयात करने के मद्देनजर हमारी अर्थव्यवस्था उन क्षेत्रों और समुद्री मार्गों पर आश्रित हो गई, जहां हमारी या आपूर्ति करने वाले देशों की भूमिका या दखल सीमित है। प्रधानमंत्री मोदी और अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप के बीच मंगलवार को फोन पर बातचीत हुई। उसमें प्रधानमंत्री ने शिपिंग मार्ग के खुले और सुरक्षित होने का मुद्दा भी उठाया था। जिस तरह होर्मुज समुद्री मार्ग में ईरान ने बारूदी सुरंगें बिछा रखी हैं और मार्ग अवरुद्ध है, उसे प्रधानमंत्री ने स्वीकार्य नहीं माना। राष्ट्रपति टं्रप ने भी सहमति जताई। भारत के अभी तक 6 जहाज होर्मुज को पार कर चुके हैं, लेकिन अब भी 20 जहाज समुद्र में ही फंसे हैं। मौजूदा संकट के कारण भारतीय जीडीपी की विकास दर 4 फीसदी तक गिर सकती है, यह आकलन ‘मूडीज’ का है, जबकि गोल्डमैन सैश का आकलन है कि भारत की विकास दर 7 फीसदी से घट कर 5.9 फीसदी तक आ सकती है। महंगाई भी बढ़ सकती है। हम रूस, अमरीका, अफ्रीका, ओमान और लाल सागर के रास्ते हररोज कच्चा तेल आयात कर रहे हैं। युद्ध के बाद भी 18 लाख बैरल तेल हररोज आ रहा है, जबकि युद्ध से पहले 30-35 लाख बैरल तेल आता था। यह सुखद है कि भारत में पेट्रोल-डीजल पर कोई राशनिंग नहीं है, लेकिन गैस को लेकर है, क्योंकि गैस का अधिकतम भंडारण मात्र पौने दो दिन का ही कर सकते हैं। ओडिशा और कर्नाटक में तेल के भंडारण बनाने की बात करीब 5 साल पहले उठी थी, लेकिन आज भी ‘शून्य’ स्थिति है। हमें खाद भी मोरक्को जैसे देश से मंगवानी पड़ रही है। यदि अब भी युद्ध लंबा खिंचा, तो हमारा चालू खाता घाटा 2.2 फीसदी तक हो सकता है। बहरहाल स्थितियां अच्छी नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने भी संसद में अपने वक्तव्य में कहा है कि युद्ध के बाद भी, युद्ध के असर, लंबे वक्त तक हो सकते हैं, इसकी प्रबल आशंका है।



